-चंपत राय के कथित ९ पन्नों के पत्र ने नृपेंद्र मिश्र की भूमिका पर डाली रोशनी; मिश्र बोले, पत्र ही मनगढ़ंत, मंदिर ट्रस्ट के पैसे से बना
-एक कहता है, हर बड़ा फैसला निर्माण समिति ने लिया, दूसरा कहता है, ट्रस्ट का भी योगदान; सवाल, फिर गड़बड़ी की जवाबदेही किसकी?
अयोध्या। राम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित अनियमितताओं के बीच पूर्व ट्रस्ट महासचिव चंपत राय और निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र के बयानों ने मंदिर निर्माण की अंदरूनी व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों के बयानों से यह स्पष्ट करने की जरूरत महसूस होती है कि निर्णय लेने, एजेंसियों के चयन और निर्माण की अंतिम जिम्मेदारी किसकी थी। विवाद की शुरुआत १८ अगस्त से जुड़े उस नौ पन्नों के कथित पत्र से होती है, जिसे चंपत राय का बताया जा रहा है। राय ने इसकी सार्वजनिक पुष्टि या खंडन नहीं किया है, हालांकि उनके करीबी इसे उनका पत्र बता रहे हैं। पत्र में दावा किया गया है कि मंदिर निर्माण से जुड़े महत्वपूर्ण पैâसले नृपेंद्र मिश्र की अध्यक्षता वाली निर्माण समिति में लिए जाते थे और बड़े निर्णय उनकी मंजूरी के बिना नहीं होते थे। यदि पत्र वास्तविक है, तो यह मिश्र की भूमिका को निर्णायक बताता है और जवाबदेही को लेकर बहस तेज करता है। राम मंदिर चंदा विवाद की सबसे बड़ी परत यही है, पैसा जनता का, आस्था करोड़ों की, लेकिन जवाबदेही किसकी? चंपत राय और नृपेंद्र मिश्र के ताजा बयानों ने कम-से-कम यह तो साफ कर दिया है कि मंदिर निर्माण की निर्णय-व्यवस्था उतनी सीधी नहीं थी, जितनी बाहर से दिखाई जाती रही।
एजेंसियां किसकी पसंद पर आईं?
कथित पत्र एजेंसियों के चयन और निर्माण समिति की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाता है। इसमें दावा किया गया है कि मंदिर निर्माण के लिए लार्सन एंड टुब्रो का चयन नृपेंद्र मिश्र के सुझाव पर हुआ, जबकि परिसर की अन्य इमारतों के लिए नोएडा की एक फर्म चुनी गई। पत्र में यह भी उल्लेख है कि मिश्र ने अपनी पसंद के कुछ लोगों को निर्माण समिति में शामिल किया। यदि पत्र वास्तविक है, तो इसका संकेत है कि निर्माण संबंधी निर्णायक अधिकार केवल ट्रस्ट सचिवालय तक सीमित नहीं थे, बल्कि निर्माण समिति और उसके अध्यक्ष की भी अहम भूमिका थी।
नृपेंद्र मिश्र का जवाब, पत्र ही नहीं देखा
नृपेंद्र मिश्र ने पूरे विवाद को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने चंपत राय का कथित नौ पन्नों का पत्र देखा ही नहीं। उनके अनुसार, पत्र में उनकी आलोचना की बात एक ‘मनगढ़ंत कहानी’ है और ट्रस्ट के भीतर मतभेद की खबरें भी निराधार हैं। हालांकि, मिश्र ने मंदिर निर्माण से जुड़ी वित्तीय व्यवस्था पर महत्वपूर्ण जानकारी दी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि राम मंदिर और परिसर के निर्माण में केंद्र या उत्तर प्रदेश सरकार का एक भी पैसा नहीं लगा, बल्कि खर्च ट्रस्ट द्वारा जुटाए गए धन से हुआ है।
यही बयान जवाबदेही का दूसरा सिरा खोलता है।
यदि पैसा ट्रस्ट का था, लेकिन निर्माण से जुड़े बड़े निर्णय निर्माण समिति ले रही थी तो किसी वित्तीय या प्रशासनिक गड़बड़ी की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी, पैसा देने वाले ट्रस्ट की, फैसले लेने वाली समिति की, चयनित एजेंसियों की या इन सभी की साझा?
असली सवाल चंदा नहीं, चंदे पर नियंत्रण का है
राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं के दान से बना है, इसलिए विवाद केवल दो पदाधिकारियों के बीच टकराव नहीं है। असली सवाल है कि जनधन के उपयोग में कितनी पारदर्शिता रही। ठेके किस प्रक्रिया से मिले, लागत की समीक्षा और भुगतान की अंतिम मंजूरी किसने दी? ट्रस्ट और निर्माण समिति के बीच वित्तीय नियंत्रण व स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था क्या थी?
सवाल जो अब पूछे जाने चाहिए
-जब नृपेंद्र मिश्र की सहमति के बिना निर्माण पैâसला नहीं होता था तो वित्तीय जवाबदेही कहां तय थी?
-ट्रस्ट का पैसा था तो ठेका और भुगतान व्यवस्था पर ट्रस्ट की निगरानी कितनी थी?
-निर्माण समिति में ‘पसंद के लोगों’ को शामिल करने का आधार क्या था?
-चंपत राय का पत्र असली है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
और यदि पत्र फर्जी है तो उसके स्रोत की जांच क्यों नहीं?
चंपत का पत्र ‘बचाव’ है या ‘पोल खोल’?
चंपत राय का कथित पत्र सिर्फ नृपेंद्र मिश्र की प्रशंसा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की सीमाएं स्पष्ट करने वाला दस्तावेज भी माना जा सकता है। चढ़ावा विवाद के बाद महासचिव पद छोड़ने के बाद, विशेष जांच दल की रिपोर्ट में उनके खिलाफ सीधी जिम्मेदारी न मिलने की खबरों के बीच यह पत्र सामने आया है। ३ सितंबर की ट्रस्ट बैठक में नए सीईओ के चयन और राय की संभावित वापसी की चर्चाओं ने इसकी अहमियत बढ़ा दी है। पत्र में एजेंसी चयन, समिति गठन और अंतिम पैâसलों में किसकी क्या भूमिका थी, इसका उल्लेख है। इसलिए इसे बचाव के साथ-साथ जिम्मेदारी तय करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा सकता है।
