सना खान
ऑफिस में सब उसे बहुत शांत लड़की कहते थे। वो सबसे मुस्कुराकर मिलती, अपना काम समय पर करती, कभी किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं करती। लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब-सी थकान थी, जैसे वो बहुत लंबे समय से अपने अंदर कुछ दबाकर जी रही हो। लोगों को लगता था उसे अकेले रहना पसंद है। लेकिन सच यह था कि उसे बचपन से ही अपनी भावनाएं छुपाना सिखा दिया गया था। रिया जब छोटी थी, तब उसके घर में हर रात लड़ाइयां होती थीं। वो अक्सर अपने कमरे के कोने में बैठकर तकिये से कान ढक लिया करती थी, ताकि बाहर की चीखें उसके दिल तक न पहुंचे। उस उम्र में जब बच्चों को मां की गोद में सुकून मिलना चाहिए, रिया डर के साथ सोना सीख रही थी। धीरे-धीरे उसने रोना बंद कर दिया। क्योंकि हर बार रोने पर उसे यही सुनने को मिलता, `इतना भी क्या रोना’ ‘मजबूत बनो’ और फिर वो सच में मजबूत बन गई। इतनी मजबूत कि उसने अपना दर्द बताना ही छोड़ दिया। समय बीता। रिया बड़ी हो गई। नौकरी करने लगी। लोगों के बीच रहने लगी। लेकिन उसके अंदर वो छोटी-सी डरी हुई बच्ची आज भी जिंदा थी। उसे आज भी तेज आवाजों से डर लगता था। लोगों के अचानक बदल जाने से डर लगता था। और सबसे ज्यादा डर किसी अपने को खो देने का था। इसीलिए वो हर रिश्ते में जरूरत से ज्यादा कोशिश करती थी। हर किसी को खुश रखने की आदत थी उसे। क्योंकि उसने बचपन में सिर्फ रिश्तों को टूटते देखा था।
एक दिन ऑफिस में उससे एक छोटी-सी गलती हो गई। बाकी लोगों के लिए वो बस एक गलती थी, लेकिन रिया पूरी रात सो नहीं पाई। उसकी आंखों से आंसू बहते रहे। क्योंकि कुछ लोग गलतियों से नहीं डरते, वो उस दर्द से डरते हैं जो उन्हें बचपन में हर गलती पर मिला था। अगले दिन ऑफिस में उसका सहकर्मी अक्षय चुपचाप उसके पास आकर बैठ गया। उसने रिया से सिर्फ इतना पूछा, `तुम हर बात पर खुद को इतना दोष क्यों देती हो?’ रिया पहले मुस्कुरा दी। जैसे हमेशा मुस्कुरा कर बात टाल देती थी।
लेकिन उस दिन उसकी आंखें भर आर्इं। शायद बहुत समय बाद किसी ने उसके व्यवहार के पीछे छुपा दर्द देखा था। रिया पहली बार किसी के सामने टूटकर रोई। उसने अक्षय को बताया कि वैâसे बचपन में उसे हर बात पर चुप करा दिया जाता था। वैâसे उसने हमेशा डर के साथ जीना सीखा। वैâसे आज भी उसे हर रिश्ते के टूट जाने का डर सताता है। अक्षय बस उसे सुनता रहा। बिना टोके, बिना समझाए, बिना यह कहे कि ‘सब भूल जाओ’ क्योंकि कुछ दर्द भुलाए नहीं जा सकते। उन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है। उस दिन रिया ने पहली बार महसूस किया कि हर इंसान दर्द देने के लिए नहीं आता। कुछ लोग जिंदगी में इसलिए भी आते हैं ताकि सालों से चुप बैठे दर्द को धीरे-धीरे सुन सकें। अक्षय ने उसका हाथ पकड़कर धीरे से कहा, ‘हर बार अकेले मजबूत बनना जरूरी नहीं होता’ इतना सुनते ही रिया टूटकर रो पड़ी। शायद वो सिर्फ उस दिन नहीं रो रही थी, वो उन सभी रातों के लिए रो रही थी जब बचपन में उसे चुप करा दिया गया था।
