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महंगाई पर इतना सन्नाटा क्यों?

महंगाई की मार से समूचा देश बिलबिला रहा है। बावजूद इसके कहीं विरोध नहीं हो रहा जबकि ये जबर्दस्त तरीके से होना चाहिए। विरोध सिर्फ सोशल मीडिया पर है और थोड़ा बहुत न्यूज चैनलों की विंडो में झांकते उन गेस्टों का दिखता है, जो न्यूज डिबेट में चिल्ल-पों करते हैं। इसके अलावा सड़कों पर महंगाई का विरोध कहीं नहीं दिखाई पड़ता। दिल्ली में हमने प्याज के दामों पर तांडव भी देखा था। जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन शीला सरकार की नाक में दम कर दिया था। नतीजा उनकी सरकार गिर गई थी। इसके अलावा जब केंद्र में मनमोहन सरकार थी, तब पेट्रोल-डीजल पर एकाध रुपए की बढ़ोतरी की घोषणा से भाजपा कार्यकर्ता सड़कों पर चक्काजाम करते थे। पार्टी की महिला नेत्रियां प्रधानमंत्री को लाली-बिंदी और चूड़ियां भेजा करती थीं।

तथ्यात्मक रूप से यह बात सच है कि भाजपा कार्यकर्ताओं जैसा हंगामा कांग्रेसी या दूसरे दलों के लोग नहीं कर पाते। भाजपा कार्यकर्ता शायद इस वक्त मन मसोसकर बैठे हों और सोचते हों, काश ऐसे मौके पर उन्हें बखेड़ा खड़ा करने का मौका मिलता। लेकिन क्या करें, सरकार उनकी ही है। भाजपा इस समय सत्ता में है इसलिए वैसे दृश्य देखने को आंखें तरस गर्इं हैं। किसी ने शायद ही कभी सोचा होगा कि पेट्रोल का भाव सेंचुरी पार करेगा और उस समय ज्यादा विरोध नहीं होगा? महंगाई का समुद्र पूरे देश में उफान मार रहा है। उस उफान को केंद्र की हुकूमत चुपचाप बैठे देख भी रही है लेकिन शांत है। दिल्ली में जारी किसान आंदोलन से लगी आग बुझी भी नहीं थी कि पेट्रोल के दामों ने चिंगारी भड़का दी।

शायद आंदोलन से एक संदेश ये भी गया है कि इतने बड़े आंदोलन से सरकार झुक नहीं रही तो दूसरों मुद्दों पर भला क्या मानेगी? आंदोलन को करीब तीन माह होने को हैं, दो सौ से ज्यादा किसान आंदोलन स्थल पर जान दे चुके हैं। किसी को कोई परवाह नहीं। हरियाणा के एक मंत्री ने कह भी दिया है कि किसान आंदोलन स्थल पर नहीं मरते तो घरों पर मर जाते हैं, उन्हें तो मरना ही है? सोचनेवाली बात है, जब देश के रखवालों की ऐसी सोच हो तो उनसे फिर ज्यादा उम्मीदें करना बेमानी हो जाता है। युद्धस्तर पर रोजाना बढ़ते पेट्रोल-डीजल के भाव पर दिल्ली की सड़कें बिना हंगामे की सूनी पड़ी हैं। राजधानी सियासत की मंडी कही जाती है। दिल्ली के सियासी गलियारों में सफेदपोशों का जमावड़ा और हर तरफ चहलकदमी बनी रहती है, पर मजाल क्या कोई कुछ बोले, चारों ओर सन्नाटा ही सन्नाटा छाया हुआ है।

वृद्धि का गणित शायद हम समझ नहीं रहे, कीमतें पहले जैसी ही यथावत हैं। कीमतें बेहताशा टैक्स से हाई हुई हैं। इंटरनेशनल स्तर पर चीजें पहले जैसी हैं। पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों पर सरकार का कोई मंत्री बोलने तक को भी राजी नहीं है। सवाल पूछने पर खीसें निकालने लगते हैं और चलते बनते हैं। सवाल उठता है कि तेल के दाम में तेजी की वजह है क्या? आखिर तेल के इस खेल के पीछे माजरा है क्या? बीती ९ तारीख से लेकर २० फरवरी तक लगातार १२वें दिन पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े, जिसके बाद दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत नब्बे पार हुई और वहीं डीजल भी ८० रुपया को पार कर गया। क्या दिल्ली, क्या मुंबई, क्या केरल और क्या कोलकाता, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक इस वक्त तेल ही टॉक ऑफ द टाउन बन चुका है। एकाध मीडिया घरानों को छोड़कर बाकी सब इन खबरों को नजरदांज कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर हंगामा जबर्दस्त है। वहां लोग उन सेलिब्रिटी को बहुत याद कर रहे हैं, जो हर मुद्दों पर बेबाक बोलते आए हैं लेकिन महंगाई और किसान आंदोलन पर चुप हैं। कभी कभार ऐसा लगता है कि फिल्म जगत से जुड़े लोगों पर टिप्पणियां करनी ज्यादा ठीक नहीं? दरअसल उनसे भावनात्मक लगाव हमारे वैचारिक पतन की निशानी होती है। सही मायनों में वे बेचारे कठपुतलियों जैसे होते हैं। जो किरदार उन्हें दिया जाता है, उसे वह पैसा लेकर निभा देते हैं। हमारे वैचारिक पतन और उन कलाकारों से हमारे भावनात्मक लगाव का लाभ उठाने के लिए राजनीतिक दल सामाजिक आधार बनाने के लिए अपना पूरा जीवन झोंक देनेवाले अपने ही प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं का पत्ता काट कर इन कलाकारों को प्रतिष्ठापित कर दिया करते हैं। यह अभिनेता-अभिनेत्रियां भी अपने बुरे वक्त को सार्थक बनाने के लिए राजनीतिक मौकापरस्ती करना शुरू कर देते हैं। ये क्या जानें कि डीजल-पेट्रोल की कीमतों के बढ़ने का आम आदमी के जीवन पर वास्तव में क्या असर पड़ता है? इसलिए इन बेचारों को निशाना क्यों बनाया जाए? इन्हें तो नाचने, मटकने दीजिए, तभी ठीक रहेगा। दिल्ली के पीएमओ से जब इनको कोई टास्क दिया जाएगा, बोलने लगेंगे। अन्यथा खुद से नहीं क्योंकि तब तक इनके गले में दही जमा दी जाती है।

वैसे केंद्र सरकार बेशक अपना दर्द न झलकाए, लेकिन उसके दर्द के अंकुर फूटने लगे हैं। आंदोलन और महंगाई से होनेवाले नुकसान की पहली तस्वीर देश के सीमांत राज्य पंजाब में संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनाव परिणाम से दिख चुकी है। भाजपा का निकाय चुनाव में तकरीबन पत्ता साफ हो गया। ठीक से विश्लेषण करें तो पता चलता है कि पंजाब में विपक्ष विकल्पहीन है। बावजूद इसके जनता ने कांग्रेस को जिताया। आंदोलन का सीधा लाभ कांग्रेस को मिला। खुदा-न-खास्ता अगर पश्चिम बंगाल में भी ऐसा हुआ तो मोदी-शाह की प्रतिष्ठिा धूमिल हो जाएगी क्योंकि बंगाल जीतना इस जोड़ी के लिए नाक का सवाल बन चुका है। अगर भाजपा वहां परास्त होती है तो सीधे तौर पर उनके नेतृत्व पर उंगली उठनी शुरू हो जाएगी। किसान आंदोलन का प्रभाव इस वक्त जबर्दस्त है। जनता खुलकर भाजपा के विरोध में खड़ी हो गई है। किसानों को खालिस्तानी आतंकवादी कहने से देशभर के लोग लामबंद हो गए हैं। मोदी-शाह भी मौजूदा बिगड़ती स्थिति से वाकिफ हैं। लेकिन अपना दुख जाहिर नहीं करते। दोनों फिर से कोई राष्ट्रभक्ति का शिगूफा छोड़ने की प्लानिंग में हैं। उन्हें पता है कि भारतीयों पर भावुकता और राष्ट्रभक्त की सुरसुरी छोड़कर क्या कुछ हासिल होता है?

(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)