श्रीकिशोर शाही
क्या आप जानते हैं कि मुंबई में रहनेवाले लोगों को कौन-सा रंग सबसे ज्यादा पसंद है? तो इसका जवाब है लाल रंग। इसमें हल्का-फुल्का फर्क हो सकता है। किसी को हल्का लाल, गुलाबी या कत्था चूना का परफेक्ट कॉम्बिनेशन बैठ जाए तो चटक या गहरा लाल रंग भी पसंद आ सकता है। कहने का मतलब ये है की पनवाड़ी ने वैâसी और कितने कारीगरी की है, ये उस पर भी निर्भर है। जी हां, बिलकुल सही समझे, यहां हम बात पान की कर रहे हैं। पान खाइये और फिर यहां-वहां पुच्च से पिचकारी मार देना यह तो मानो पान खवैयों का प्रिय शगल है। इन पान शौकीनों से सबसे ज्यादा रेलवे परेशान है। हाल ही में एक खबर आई कि मुंबई के उपनगरीय रेलवे में करीब ७ हजार यात्रियों को पकड़कर कार्रवाई की गई और उनसे जुर्माना वसूला गया।
मुंबई में हर गली कूचे में पान की दुकान मिल जाती है। हर ५-१० लोगों में २-४ लोगों के मुंह तो लाल-पीले मिल ही जाते हैं। सड़क, फुटपाथ और रेलवे प्लेटफॉर्म के साथ ही बस स्टैंड पर इनकी कारीगरी देखने को मिलती ही रहती है। चलो गंदी जगह मसलन कूड़े के ढेर पर थूका तो ठीक है, पर कुछ कलाकार तो थूकने के लिए साफ-सुथरी जगह की तलाश में रहते हैं। शायद वहां उनकी कला खिलकर उभरती है इसलिए। मीरा रोड के रेलवे स्टेशन पर नई चमचमाती लिफ्ट लगी है, किसी ने वहां अपनी कला के दर्शन करा दिए। इतना ही नहीं, बंदे ने वहां गुटके की पुड़िया भी छोड़ दी ताकि लोग समझ सकें कि ये उत्पाद किस ब्रांड का है। वाकई लोगों ने हद कर रखी है। अब तो खैर मल्टीप्लेक्स का जमाना है पर याद आता है वो जमाना जब सिंगल स्क्रीन हुआ करते थे। वॉशरूम वगैरह के तो कहने ही क्या थे, थिएटर के भीतर भी लोग गंदगी करने से नहीं चूकते थे। वहां कोई रोक-टोक चेकिंग वगैरह नहीं होती थी और लोग जमकर अपनी सड़ांध मारती कला का प्रदर्शन करते थे। शुक्र है रेलवे स्टेशन से होता हुआ यह मामला एयरपोर्ट तक नहीं पंहुचा है। वैसे कुछ साल पहले मोदी जी ने चप्पल पहननेवालों के लिए विमान यात्रा सुगम और सस्ता बनाने की बात कही थी। पता नहीं उस स्कीम का क्या हुआ? वरना लाल पिचकारी वाले प्लेन और मुंबई की लोकल ट्रेन के बीच में `नोबेल’ पाने का कंपटीशन वाकई मजेदार होगा…!
