हनीफ जवेरी
कला की देवी और अद्वितीय प्रतिभा की धनी संध्या वी. शांताराम ने गत ४ अक्टूबर, २०२५ को ९४ वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा कह दिया। २२ सितंबर, १९३१ को कोच्चि में रंगमंच से जुड़े अजीत देशमुख और माया के मध्यमवर्गीय परिवार में उनका जन्म हुआ। उनका वास्तविक नाम विजया था। परिवार में माता-पिता के अतिरिक्त उनकी एक बहन वत्सला भी थीं। दोनों बहनों ने अपने पिता की नाट्य मंडली से जुड़कर अत्यंत कम आयु में ही अभिनय आरंभ कर दिया था।
विजया को फिल्मों में काम करने का शौक था, लिहाजा १९५१ में जब उन्होंने वी. शांताराम द्वारा दिया गया इश्तिहार देखा, तो तुरंत आवेदन कर दिया। उनका ऑडिशन लेते समय शांताराम उनसे काफी प्रभावित हुए और उन्हें पहला ब्रेक १९५२ में आई फिल्म ‘अमर भूपाली’ में दिया। साथ ही उनका स्क्रीन नाम ‘विजया’ से बदलकर ‘संध्या’ रख दिया।
शांताराम ने संध्या को अपनी अगली फिल्मों ‘परछाईं’, ‘तीन बत्ती चार रास्ता’ और ‘झनक झनक पायल बाजे’ में भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया। धीरे-धीरे दोनों में प्यार हो गया और २२ दिसंबर १९५६ को वी. शांताराम और संध्या ने विवाह कर लिया। वी. शांताराम जहां सफेद पोशाक और गांधी टोपी को अपना स्थायी पहनावा बनाए हुए थे, वहीं संध्या ने भी अपना स्थायी परिधान निश्चित कर लिया था- सफेद साड़ी, कलाई में हरी कांच की चूड़ियां, माथे पर बड़ी लाल बिंदी और गले में मंगलसूत्र। शांताराम के होम-प्रोडक्शन की फिल्मों में ही काम करनेवाली संध्या के समक्ष जब प्रसिद्ध फिल्मकार महबूब खान ने उन्हें एक फिल्म का प्रस्ताव अत्यधिक मेहनताना देते हुए कहा कि यह भूमिका केवल आप ही निभा सकती हैं क्योंकि इसमें आरंभ से अंत तक एक शास्त्रीय नर्तकी की आवश्यकता है। इसके बावजूद संध्या ने उनके प्रस्ताव को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि वे राजकमल कला मंदिर की फिल्मों के अलावा किसी अन्य फिल्म में काम नहीं करना चाहतीं।
वी. शांताराम के यहां काम पूरे अनुशासन के साथ होता। उनके भतीजे और स्व. अभिनेत्री नंदा के भाई जयप्रकाश कर्नाटकी के अलावा उनकी पत्नी संध्या और पुत्री राजश्री को भी स्टाफ के तौर पर ही ट्रीट किया जाता था। परिवार के सदस्य भी मासिक वेतन पर ही काम करते थे और स्वयं वी. शांताराम भी अपने स्टाफ की तरह सैलरी लेते थे। संध्या ने पूरी तरह अपने आपको ‘राजकमल’ के लिए समर्पित कर दिया था। उन्होंने कभी समय देखकर काम नहीं किया। शादी से पहले भी वे फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के लिए रोजाना दस घंटे डांस मास्टर गोपीकृष्ण जी के साथ रियाज करती थीं और यही हाल शादी के बाद फिल्म ‘नवरंग’ के दौरान भी रहा। फिल्म ‘नवरंग’ के उस गीत ‘तुम सैंया गुलाब के फूल’ के लिए उन्होंने खूब मेहनत की, जिसमें उन्हें घोड़े के साथ नृत्य करना था। इसी फिल्म के गीत ‘आधा है चंद्रमा रात आधी’ के लिए उन्होंने आठ घड़ों का सेट सिर पर उठाकर नृत्य किया, बेहद कठिन था। और उस गीत का तो क्या कहना, जिसमें वे गाती हैं- ‘अरे जा रे हट नटखट, न छू रे मेरा घूंघट…।’
‘दो आंखें बारह हाथ’, ‘नवरंग’, ‘सेहरा’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘अमर भोपाली’, ‘लड़की सह्याद्रि की’, ‘जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली’, ‘तीन बत्ती चार रास्ता’, ‘पिंजरा’ जैसी फिल्मों में एक से बढ़कर एक अहम भूमिका निभानेवाली संध्या पिछले चार-पांच वर्षों से बीमार चल रही थीं। हाल ही में बुखार और खांसी से जूझ रहीं संध्या ने बीते ३ अक्टूबर की रात १० बजे अंतिम सांस ली। आज संध्या भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपने बेतहरीन अभिनय और नृत्य के जरिए फिल्मों में अपनी अलग छाप छोड़नेवाली संध्या दर्शकों के दिलों में हमेशा मौजूद रहेंगी।
