एक बेड पर दो मरीज, गलियारों में तंग जगहों में इलाज जारी
एमआरआई के लिए सात महीने की लंबी प्रतीक्षा
धीरेंद्र उपाध्याय
मुंबई स्थित केईएम अस्पताल जो कभी लाखों मरीजों के लिए जीवनरेखा माना जाता था, आज खुद वेंटिलेटर पर दिखाई दे रहा है। अस्पताल के भीतर हर वॉर्ड में चीखती मरीजों की भीड़, टूटी छतें और थके कर्मचारियों की हांफती आवाजें एक ही बात कहती हैं कि शहर का यह सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल अपनी क्षमता से कहीं आगे लड़ रहा है, जो दर्दनाक हकीकत को बयां कर रहा है। दूसरी तरफ एक बेड पर दो मरीजों का इलाज करना स्टॉफ की मजबूरी बनती जा रही है। अस्पताल में मौजूद एमआरआई के लिए भी मरीजों को छह महीने, जबकि सीटी स्वैâन के लिए एक सप्ताह का डेट दिया जा रहा है। रत्नागिरी से आई शुभांगी खोत जैसी सैकड़ों महिलाएं गलियारों में तंग जगहों में बेड तलाशती घूमती दिखाई देती हैं, जबकि डॉक्टर और नर्सें सीमित संसाधनों के साथ दिन-रात संघर्ष में जुटे हैं। यह नजारा केवल चिकित्सा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि उस तंत्र का भी आईना है जो गरीबों के स्वास्थ्य को कभी अपनी प्राथमिकता नहीं बनाता।
मरीजों की संख्या से बेहाल अस्पताल
केईएम अस्पताल हर साल लगभग १८.७४ लाख ओपीडी सेवाएं, ६५,००० से अधिक भर्ती और ७०,००० से अधिक चिकित्सीय प्रक्रियाएं संभालता है। अस्पताल में फिलहाल २,२५० बेड हैं, जिन्हें बढ़ाकर २,५०० करने की योजना है। इसके बावजूद मांग इतनी बढ़ गई है कि सिस्टम कमजोर पड़ चुका है। स्टाफ की कमी, संसाधनों का अभाव और ढांचागत समस्याएं सामने आ रही हैं।
ढांचागत जर्जरता और सुरक्षा खतरे में
मई २०२५ में भारी बारिश के कारण अस्पताल के कई अहम हिस्से जैसे बाल चिकित्सा आईसीयू और डायग्नोस्टिक यूनिट पानी में डूब गए। एक सदी पुराने इस अस्पताल में कई वॉर्डों की छतें दरकी हुई हैं और लोहे की छड़ें खुली दिखाई देती हैं। कई हिस्सों में चलती-फिरती मचानें लगी हुई हैं, जो अस्पताल की खतरनाक स्थिति को दर्शाती हैं।
जांच सुविधाओं पर बोझ
सीटी स्कैन मशीन खराब होने से मरीजों को एक हफ्ते तक इंतजार करना पड़ रहा है। कई लोग बाहरी केंद्रों पर जाकर लगभग २,००० रुपए खर्च करके जांच करवा रहे हैं। एमआरआई मशीन भी ओवरलोड है। सामान्य मामलों में मरीजों को छह महीने तक प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। मनपा की योजना है कि पीपीपी के तहत नई मशीनें खरीदी जाएं, लेकिन प्रक्रिया अभी अधूरी है।
जरूरी दवाओं और सामग्री की कमी
बुखार, एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक, रैबिज इंजेक्शन, सलाइन और अन्य जरूरी दवाओं के साथ ग्लव्स, कॉटन जैसी सामग्री की भी कमी है। गरीब मरीजों को दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। अस्पताल परिसर में एक केमिस्ट शॉप तो है, लेकिन वहां लंबी कतारें लगी रहती हैं। मुफ्त दवा वितरण काउंटरों का सदुपयोग नहीं हो रहा। इसी तरह हर दिन अस्पताल में करीब ६,००० मरीज ओपीडी में आते हैं, जबकि १८० भर्ती होते हैं। विभागों के बीच दिशा-निर्देश का अभाव होने से मरीजों को भटकना पड़ता है।
हकीकत देख लगा झटका
अपने बीमार भाई को लेकर मुंबई के परेल स्थित केईएम अस्पताल में भर्ती कराने आईं, लेकिन वहां की हकीकत देखकर झटका लगा। सभी बेड मरीजों से भरे हुए थे, जिस कारण किसी विभाग में भी जगह नहीं थी। कड़ी मशक्कत के बाद किसी तरह से बेड मिला।
– शुभांगी खोत, रत्नागिरी
महाराष्ट्र के कोने-कोने से आते हैं मरीज
रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, पालघर और अन्य राज्यों से भी मरीज इस अस्पताल में इलाज कराने के लिए आते हैं। यहां के विभाग इतने बड़े और उलझे हुए हैं कि एक बेड मिलना युद्ध जीतने जैसा है। मेडिसिन वॉर्ड में करीब ७०० बेड हैं, लेकिन अक्सर दो मरीजों को एक ही बेड साझा करना पड़ता है। कहीं-कहीं गलियारों में अतिरिक्त बेड लगाकर मरीजों को ठहराया जाता है, जिससे सुरक्षा और सुविधा दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।
– सचिन पाडवाल, पूर्व नगरसेवक, मुंबई
शताब्दी महोत्सव पर खर्च हुए आठ करोड़, पर दवाओं के लिए नहीं है ८०० रुपए
हाल ही में केईएम अस्पताल का शताब्दी महोत्सव मनाया गया, जिस पर करीब आठ करोड़ रुपए खर्च किए गए। लेकिन अस्पताल में आनेवाले मरीजों के लिए जरूरी दवाओं के लिए ८०० रुपए नहीं है। डीन डॉ. संगीता रावत को इसकी रंच मात्र भी चिंता नहीं है। इनके कार्यकाल में अस्पताल वेंटिलेटर पर पहुंच चुका है, जो गरीब मरीजों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
दिलीप दलवी, समाजसेवी, मुंबई
