भारतीय जनता पार्टी आग लगानेवाली पार्टी है। किसी विषय पर आग लगाकर भाग जानेवाली पार्टी के इन बंदरों की ही पूंछ में हिंदी अनिवार्यता के मामले में आग लग गई है। गृह मंत्री अमित शाह और अन्य लोगों ने नई शिक्षा नीति में हिंदी भाषा की अनिवार्यता को लेकर बहुत भाषण झाड़े। उसका महाराष्ट्र सहित पूरे देश में विरोध हुआ। मुद्दा एक भाषा के रूप में हिंदी का विरोध करने का नहीं है, बल्कि स्कूली छात्रों पर भाषा थोपने का तरीका गलत है इसलिए भाजपा ने ‘हिंदी बनाम अन्य’ की बहस को सुलगाने की चाल चली। तमिलनाडु सहित दक्षिणी राज्यों में अभी भी इसका कड़ा विरोध हो रहा है। तमिलनाडु में, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) पार्टी मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के नेतृत्व में सत्ता में है। स्टालिन ने विधानसभा में अनुमोदन के लिए तमिलनाडु में हिंदी के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लाने की तैयारी की थी। हिंदी भाषा के प्रयोग के विरुद्ध जिस विधेयक को विधानसभा में पेश करने की बात कही गई थी, उसमें हिंदी गीतों, फिल्मों, विज्ञापनों, हिंदी भाषा में पोस्टर्स और होर्डिंग्स पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव था। स्टालिन ने कहा था, ‘नया कानून संविधान की सीमाओं के भीतर तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा करेगा।’ स्टालिन के इस रुख ने एक तरह से मोदी और शाह की भाषाई राजनीति को चुनौती दी। तमिलनाडु में हिंदी का विरोध पुराना है। एक समय यहां के राजनीतिक दल आकाशवाणी पर हिंदी समाचारों के खिलाफ हिंसक आंदोलन की हद तक की मानसिकता रखते थे। तमिलनाडु आज अमित शाह द्वारा थोपे गए हिंदी आक्रमण को पूरी तरह से रोकना चाहता है और द्रमुक सरकार ने इसके लिए केंद्र से दो-दो हाथ करने का साहस दिखाया। राज्यों की राजभाषा और
मातृभाषा की रक्षा करने
के कानून हैं। होने ही चाहिए। जरूर होंगे। इसके लिए संविधान के अनुसार भाषानुरूप प्रांतीय संरचना बनाई गई, लेकिन अपने राज्य में किसी भाषा पर प्रतिबंध लगाना कितना सही है? सरकारी दफ्तरों और अदालतों में मातृभाषा और राज्य की भाषा का इस्तेमाल अनिवार्य होना चाहिए, लेकिन हिंदी पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना किस हद तक उचित है? अगर कल को अमित शाह या नरेंद्र मोदी तमिलनाडु आकर हिंदी में भाषण दें, तो स्टालिन का संभावित हिंदी विरोधी कानून क्या कार्रवाई करेगा? क्या मोदी-शाह पर कानून तोड़ने के आरोप में केस दर्ज होंगे? यह स्पष्ट होना चाहिए। स्टालिन के कानून का मकसद तमिलनाडु में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार पर रोक लगाना है। यह कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३४३ से ३५१ के प्रावधानों के अनुरूप होगा। द्रमुक सरकार ने दावा किया है कि उसमें अंग्रेजी को सह-आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी गई है। बेशक, तमिलनाडु में हिंदी गानों और फिल्मों पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं है। हिंदी फिल्मों और हिंदी गानों पर ऐसा प्रतिबंध पाकिस्तान में भी है। भारत के किसी राज्य में ऐसा नहीं हो सकता। दक्षिण के कई कलाकार हिंदी सिनेमा में काम करते हैं। हिंदी फिल्मी पर्दे पर अपनी भूमिकाओं के कारण वे पूरे भारत में लोकप्रिय हैं। संगीत जगत में एस. पी. बालासुब्रमण्यम, ए. आर. रहमान आदि जैसे तमिल कलाकारों ने हिंदी सिनेमा को समृद्ध किया है। अब वे इसके आगे हिंदी फिल्म संगीत के क्षेत्र में प्रवेश न करें ऐसा कानून राष्ट्र की एकता और संस्कृति के लिए घातक है। इसी साल मार्च में, स्टालिन सरकार ने २०२५ के राज्य बजट में राष्ट्रीय रुपये पर से ‘`’ चिह्न हटा दिया था और तमिल अक्षर का इस्तेमाल किया था। इस पर भी विवाद हुआ था। हमने भारतीय मुद्रा से ‘`’ हटा कर हमने तमिल संस्कृति का
सम्मान किया
अगर डीएमके ऐसा खुलासा करती भी है तो यह स्वीकार्य नहीं है। अगर हर राज्य अपनी मर्जी से नोट छापेगा तो देश में एक अलग तरह की अराजकता पैâल जाएगी। बेशक, इस अराजकता की चिंगारी भाजपा सरकार ने ही लगाई है। स्टालिन के हिंदी विरोध को तोड़ने के लिए भाजपा ने तमिलनाडु के ही सी. पी. राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति बनाया। कम से कम इस संघ प्रचारक उपराष्ट्रपति को हिंदी का सम्मान तो करना चाहिए, लेकिन वह भी नहीं। उपराष्ट्रपति ने अंग्रेजी भाषा में शपथ ली इसलिए तमिलनाडु के उपराष्ट्रपति ने अमित शाह की हिंदी अनिवार्यता नीति को अनदेखा कर दिया। मोदी सरकार, जो अपने द्वारा नियुक्त उपराष्ट्रपति को ‘हिंदी के प्रयोग’ के लिए बाध्य नहीं कर सकी, अब देश के कई राज्यों में हिंदी की झंडा बरदार बन रही है। स्टालिन केंद्र की हिंदी अनिवार्यता के बारे में जो कहते हैं, उसका तार्किक आधार है। हिंदी को जबरन थोपने की भूमिका के कारण ही उत्तर भारत में सौ वर्षों में २५ भाषाएं विलुप्त हो गईं। कई भाषाओं की बली चढ़ गई। भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगधी, मारवाड़ी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, संथाली, अंगिका, हो, खड़िया, खोरठा, कुरमाली, कुरुख, मुंडारी जैसी कई भाषाएं अपने अस्तित्व के लिए सांस लेते तड़फड़ा रही हैं। स्टालिन का दावा है कि हिंदी की अनिवार्यता के कारण कई प्राचीन भाषाएं नष्ट हो गई हैं। अगर स्टालिन यह मान भी ल्ों कि उत्तर प्रदेश और बिहार की मूल भाषा हिंदी नहीं है तो भी देशभर में संवाद संपर्क की मुख्य भाषा बन चुकी हिंदी पर अपने ही राज्य में प्रतिबंध लादना ठीक नहीं है। अब खबर आई है कि स्टालिन सरकार ने इस पैâसले को टाल दिया है। अगर ऐसा है तो अच्छा ही है। क्योंकि इस कानून के कारण तमिलनाडु के लोग भारत से कट जाएंगे, संवाद संपर्क खत्म हो जाएगा और एक राज्य के रूप में तमिलनाडु देश से कटा हुआ एक टापू बन जाएगा। स्टालिन का झगड़ा मोदी-शाह से है, भाषा से नहीं।
