हिमांशु राज
ऋषभ ने अपनी हाल में हुई आध्यात्मिक यात्रा से सभी का ध्यान आकर्षित किया। ‘कांतारा चैप्टर 1’ की अभूतपूर्व सफलता के बाद, शिवभक्ति से ओत-प्रोत यह अभिनेता-निर्देशक बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने काशी पहुंचे। उन्होंने वाराणसी पहुंचकर विश्वनाथ मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना की और अपनी सफलता का श्रेय भगवान शंकर के आशीर्वाद को दिया। केवल काशी ही नहीं, ऋषभ आगे जाकर बिहार स्थित विश्व के सबसे प्राचीन मंदिर मां मुंडेश्वरी देवी धाम में भी मत्था टेकने वाले हैं। यह यात्रा उनके गहन श्रद्धाभाव और भारतीय परंपराओं के प्रति जुड़ाव को स्पष्ट करती है।ऋषभ का जीवन किसी प्रेरक कथा से कम नहीं। एक सामान्य परिवार से निकलकर सिनेमा की ऊंचाइयों तक पहुंचने वाले इस कलाकार ने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया। फिल्मों में क्लैपर बॉय से शुरुआत करने वाले ऋषभ आज कन्नड़ सिनेमा के चर्चित अभिनेता और निर्देशक हैं। वे मानते हैं कि “कला को आप नहीं चुनते, कला खुद आपको चुनती है।” संघर्ष के शुरुआती दिनों में उन्होंने जीवन यापन के लिए हर संभव काम किया-कभी पानी की बोतलें बेचीं, कभी रियल एस्टेट में हाथ आजमाया, तो कहीं होटल में काम किया। उनकी पहली कमाई मात्र 25 रुपए थी, पर मेहनत ने उन्हें सिखाया कि कोई काम छोटा नहीं होता।उनकी सफलता के पीछे एक मजबूत पारिवारिक सहारा है। पत्नी प्रगति, जो ‘कांतारा’ फिल्मों की कॉस्ट्यूम डिजाइनर भी हैं, हर परिस्थिति में ऋषभ की सबसे बड़ी ताकत बनीं। घर, बच्चे और काम-तीनों मोर्चों पर उन्होंने ऋषभ का साथ दिया। ऋषभ मानते हैं कि परिवार के बिना सफलता अधूरी है।भाषा और संस्कृति को लेकर ऋषभ का दृष्टिकोण समावेशी है। वे कहते हैं कि भारत की विविधता उसकी आत्मा है, और भाषा को विवाद नहीं, एकता का पुल बनना चाहिए।“ जो दूसरों की भाषा का सम्मान करता है, वह अपनी भाषा को भी प्रतिष्ठा दिलाता है।”‘कांतारा चैप्टर 1’ ने ऋषभ को न सिर्फ स्टारडम दिया, बल्कि आत्मविश्वास और जिम्मेदारी का भी बोध कराया। यह फिल्म उनके अपने गांव की लोककथाओं से प्रेरित है और मानव-प्रकृति के संतुलन की कहानी कहती है। ऋषभ का मानना है कि कोई भी सफलता अकेले की नहीं होती-यह टीम की सामूहिक लगन और विश्वास का नतीजा होती है। आस्था, संघर्ष और कर्म-इन तीन सूत्रों से बुनी ऋषभ की यात्रा भारतीय सिनेमा और संस्कृति दोनों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है।
