मुख्यपृष्ठस्तंभनिवेश गुरु : अंगूठे से हस्ताक्षर तक असली निवेश यात्रा

निवेश गुरु : अंगूठे से हस्ताक्षर तक असली निवेश यात्रा

भरतकुमार सोलंकी
मुंबई

आज भी क्या हमारे गांवों में हर व्यक्ति अपना नाम खुद लिख सकता है? क्या हर किसान, हर मजदूर, हर गृहिणी बैंक में जाकर आत्मविश्वास से अपने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर पाते हैं या फिर आज भी कई हाथ केवल अंगूठा लगाने तक सीमित हैं?
यह सवाल जितना सरल लगता है, उतना ही गहरा है क्योंकि यही सवाल तय करता है कि भारत में विकास कितनी गहराई तक पहुंचा है। सड़कें, बिजली, मोबाइल नेटवर्क – ये सब विकास के प्रतीक हैं, लेकिन क्या असली विकास उस दिन नहीं होगा जब हर व्यक्ति अपनी पहचान खुद लिख सकेगा?
कहा गया है- ‘अंगूठा लगाने वालों को अपना नाम लिखना सिखाओ और पढ़े-लिखों को पत्र लिखना सिखाओ।’ यही असली जनजागरण है। यही भारत की आत्मनिर्भरता की जड़ है।
क्या आपने कभी सोचा है कि बैंक में खुला खाता सिर्फ एक नंबर नहीं होता? वह व्यक्ति के आत्मसम्मान का प्रतीक होता है। जब कोई व्यक्ति फॉर्म पर अपना हस्ताक्षर करता है, तो वह सिर्फ कागज पर स्याही नहीं लगाता – वह अपनी पहचान दर्ज करता है।
वह यह कहता है, ‘मैं जिम्मेदार हूं, मैं जागरूक हूं।’ लेकिन जब कोई अंगूठा लगाता है, तो क्या वह अपने निर्णयों पर पूर्ण अधिकार रख पाता है? क्या उसे समझ होती है कि उसने किस दस्तावेज पर हस्ताक्षर (या निशान) किया है?
शायद नहीं। यही अंतर है – साक्षरता और जागरूकता के बीच। आज भी हजारों गांवों में शिकायतें नहीं लिखी जातीं, फॉर्म अधूरे रहते हैं, योजनाओं का लाभ बीच रास्ते में रुक जाता है। क्यों? क्योंकि हममें से कई लोग ‘बोलना’ तो जानते हैं, लेकिन ‘लिखना’ नहीं। जब तक बात लिखी नहीं जाती, वह शासन-प्रशासन तक पहुंचती नहीं और जो पहुंचती नहीं, वह बदलती नहीं।
क्या हम जानते हैं कि निवेश की असली शुरुआत पैसे से नहीं, बल्कि कलम से होती है? जब गांव का हर व्यक्ति अपना नाम लिखना सीख जाएगा, जब शिक्षित लोग अपनी बात सही विभाग तक पत्र लिखकर पहुंचाएंगे, तब ही यह देश निवेश और विकास की असली दिशा में आगे बढ़ेगा।
आज सवाल यह नहीं कि हमारे पास पैसा कितना है- सवाल यह है कि हमें अपनी मेहनत की कमाई की समझ कितनी है। क्या हम बैंक खाते, बीमा या पेंशन योजनाओं का उपयोग आत्मविश्वास से कर सकते हैं? क्या हमारे हस्ताक्षर हमारे भविष्य के प्रति विश्वास का प्रतीक हैं?
अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो हमें फिर से शुरुआत करनी होगी- गांव से, परिवार से, स्कूल से। क्योंकि विकास वहीं से शुरू होता है, जहां लोग बोलना नहीं, लिखना सीखते हैं।
अंगूठे से हस्ताक्षर तक की यह यात्रा सिर्फ शिक्षा की नहीं, बल्कि स्वाभिमान की यात्रा है जो भविष्य के भारत को आत्मनिर्भर बनाएगी और हर नागरिक को कहने की ताकत देगी – ‘मैं जागरूक हूं और अब मैं खुद अपने भविष्य पर हस्ताक्षर कर सकता हूं।’
‘हस्ताक्षर ही भविष्य है क्योंकि कलम से ही कल बदलता है।’
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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