प्रो. दयानंद तिवारी
दीपावली भारतीय संस्कृति का वह आलोक पर्व है, जिसमें आस्था, उत्सव और आत्मचिंतन तीनों का संगम दिखाई देता है। यह केवल मिट्टी के दीपों का पर्व नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर जलने वाले प्रकाश का उत्सव है। साहित्यकारों ने सदियों से दीपावली को ‘अंधकार से प्रकाश की यात्रा’ का प्रतीक माना है-पर आज के दौर में जब चमक और उपभोग की अधिकता ने आत्मिक उजाले को ढंक दिया है, तब इस पर्व की साहित्यिक दृष्टि और भी प्रासंगिक हो उठती है।
कवियों की दृष्टि : आत्मदीप और चेतना का उजास
परंपरागत कवियों ने दीपावली को अंधकार पर विजय का प्रतीक माना-जयशंकर प्रसाद ने लिखा,
‘दीप जले तो दिखे अंधियारा, दीप बुझे तो दिखे उजियारा।’
यह पंक्ति आज भी उतनी ही सार्थक है क्योंकि आज का अंधकार केवल रात का नहीं, संवेदनाओं और मूल्यों के क्षरण का है।
सुमित्रानंदन पंत ने कहा-
‘दीप जले घर-घर में, पर मन का दीप कहां जलता है।’
आज जब हम मोबाइल की रोशनी में डूबे हैं और रिश्तों के दीप बुझते जा रहे हैं, यह पंक्ति हमें आत्मदीप जलाने का संदेश देती है। महादेवी वर्मा ने अपने काव्य में दीप को करुणा और करुणोद्रेक का प्रतीक माना, जो समाज की पीड़ा को प्रकाशित करता है। आधुनिक कवि गुलजार ने इसी भावना को तकनीकी युग में रूपांतरित करते हुए कहा-
‘हर चेहरा अगर दीप बने, तो वैâसी जगमग होगी दुनिया।’
यह पंक्ति आज के सोशल मीडिया युग में भी सटीक बैठती है, जहां एक साझा मुस्कान या प्रेरक शब्द किसी के जीवन में दीपक बन सकता है।
कहानीकारों की दृष्टि : यथार्थ का उजाला और सामाजिक द्वंद्व
प्रेमचंद ने ‘दिवाली की रात’ में अमीरी-गरीबी के द्वंद्व को रेखांकित किया था। आज यह द्वंद्व डिजिटल रूप ले चुका है-कुछ घरों में एलईडी लाइटों की जगमग है, तो कहीं बिजली तक नहीं पहुंचती। आधुनिक कहानीकारों ने इसी विषमता को उपभोक्तावाद और संवेदनहीनता के रूप में देखा। मन्नू भंडारी की दृष्टि में दीपावली एक आत्ममंथन का अवसर है, जहां मनुष्य को सोचना चाहिए कि उसके भीतर कितना उजाला है। आज जब समाज दिखावे, फायरवर्क्स और ऑनलाइन शॉपिंग तक सीमित हो गया है, तब यह प्रश्न पहले से अधिक गहरा लगता है।
फणीश्वरनाथ रेणु की लोक चेतना वाली कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि दीपावली तभी सार्थक है जब गांव के हर झोपड़े में भी दीप जल सके-न कि केवल शहरों के मॉलों और ऊंची इमारतों में।
निबंधकारों की दृष्टि : दीपावली-आत्मसुधार का प्रतीक
दिनकर ने कहा था-
‘दीपक जलाना आत्मा की साधना है, यह केवल बाहर का नहीं भीतर का उजाला है।’
आज जब व्यक्ति अपने ‘ऑनलाइन’ व्यक्तित्व को चमकदार दिखाने में लगा है, दिनकर की यह बात आत्मा की सच्चाई को याद दिलाती है। अज्ञेय और हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे निबंधकारों ने दीपावली को आडंबर-मुक्त आत्मावलोकन का पर्व कहा। आधुनिक युग में जब ‘फेस्टिव सीजन सेल’ और ‘सोशल मीडिया पोस्ट’ ने त्योहार को प्रदर्शन बना दिया है, तब साहित्य हमें ‘कम दिखाओ, अधिक जियो’ की शिक्षा देता है।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य : पर्यावरण, तकनीक और सामाजिक जागरूकता
आज की दीपावली केवल पूजा या रोशनी का नहीं, पर्यावरणीय जिम्मेदारी का भी पर्व बन चुकी है। समकालीन साहित्यकार और कवि अब ‘ग्रीन दीपावली’ की वकालत करते हैं, जहां दीप जलें, पर हवा न जले; उत्सव हो, पर पृथ्वी न रोए।
सोशल मीडिया के युग में दीपावली एक सांस्कृतिक संवाद बन गई है, जहां हर पोस्ट, हर स्टेटस एक दीपक है। साहित्यकार अब इस डिजिटल दीपावली को ‘अभिव्यक्ति का उत्सव’ मानते हैं, बशर्ते वह केवल दिखावे नहीं, बल्कि प्रेरणा के शब्दों से भरी हो।
डॉ. हरिवंश राय बच्चन की अमर पंक्ति-
‘अंधेरे को अंधेरा कर नहीं सकते, दीप ही जलाना होगा’,
अब ‘डिजिटल युग’ में नया अर्थ लेती है-ट्रोलिंग और नफरत के अंधकार में शब्दों का दीप ही नई रोशनी पैâला सकता है।
सांस्कृतिक समरसता और वैश्विक दृष्टि
दीपावली अब सीमाओं से परे जा चुकी है-यह भारत का नहीं, मानवता का उत्सव बन गई है। प्रवासी भारतीयों के साहित्य में दीपावली एक स्मृति और पहचान का प्रतीक है। न्यूयॉर्क, लंदन या दुबई में जब भारतीय दीप जलाते हैं, तो वे केवल परंपरा नहीं निभाते-वे अपने मूल से जुड़ने का दीप जलाते हैं।
आधुनिक हिंदी साहित्य में भी प्रवासी लेखन इस भाव को गहराई से अभिव्यक्त करता है कि दीपावली सिर्फ घर की नहीं, हृदय की वापसी का पर्व है।
अत: भीतर के अंधकार को जलाना ही सच्ची दीपावली का प्रतीक है।
साहित्य हमें सिखाता है कि दीप जलाना बाहरी क्रिया नहीं, भीतर की साधना है। आज के युग में जब चमक के नीचे थकान, उपभोग के नीचे असंतोष और डिजिटल संवादों के बीच अकेलापन बढ़ा है, तब दीपावली का सच्चा अर्थ वही है जो संत कवि तुलसीदास ने कहा था-
‘जग मग दीप जले जग माहीं, हर मन में राम बसें तब पावन होई रात सुहानी।’
दीपावली हमें यह सिखाती है कि उजाला केवल बिजली से नहीं, विचार से पैâलाता है।
और इस दृष्टि से देखा जाए तो हर साहित्यकार-हर कवि, हर कहानीकार, हर निबंधकार-स्वयं एक दीप है, जो समाज के अंधकार को शब्दों की लौ से प्रकाशित करता है।
‘दीप जलाओ, पर मन में भी उजाला करो;
सजाओ घर, पर हृदय भी संवारों,
त्योहार मनाओ, पर संवेदनाओं को न भूलो-
यही है आधुनिक युग में साहित्यिक दीपावली का सच्चा संदेश।’
