हनीफ जवेरी
जिंदगी की गाड़ी चल रही थी और सब कुछ सामान्य था कि इसी बीच एक ऐसी खबर आई जिसे सुनकर आंखें खुद-ब-खुद नम हो उठीं। पिछले हफ्ते मेरे पास अभिनेत्री प्रीति सप्रू का फोन आया। उन्होंने कहा, ‘अभिनेत्री और नर्तकी मधुमती अब हमारे बीच नहीं रहीं।’ इस खबर को सुन मैं एक पल के लिए सन्न रह गया, क्योंकि मधुमती से मेरा संबंध केवल पेशेवर नहीं, बल्कि आत्मीय था। हर सुबह ‘सुप्रभात’ संदेश भेजनेवाली मधुमती का १५ अक्टूबर की सुबह संदेश नहीं आया… और आता भी वैâसे? उस दिन तो मधुमती की सुबह ही नहीं हुई थी। वे नींद में ही इस दुनिया को चुपचाप छोड़कर चली गई थीं।
३० मई, १९४१ को ठाणे (महाराष्ट्र) में मधुमती का जन्म एक पारसी परिवार में न्यायाधीश दारा बेहरामजी रिपोर्टर के घर हुआ था। माता-पिता ने उनका नाम हुतोक्षी रखा। उनके भाई पिल्लो रिपोर्टर प्रसिद्ध क्रिकेट अंपायर थे। गुरु श्रीवत्सव दुलारी से उन्होंने कथक और मणिपुरी नृत्य सीखा, जो लखनऊ घराने से थे तथा मास्टर शिव से भरतनाट्यम की शिक्षा प्राप्त की। वैजयंतीमाला की प्रशंसक हुतोक्षी ने मंच पर नृत्य करना आरंभ किया। इस कारण उन्हें फिल्मों के प्रस्ताव मिलने लगे। किंतु उनके पिता फिल्मों में काम करने के सख्त विरोधी थे। बाद में उन्होंने बेटी को फिल्मों में नृत्य करने की अनुमति दी, लेकिन तब तक बेटी के हाथ से देव आनंद के साथ बननेवाली फिल्म ‘एक के बाद एक’ में नायिका बनने का अवसर निकल चुका था।
१९५९ की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से बतौर नर्तकी हुतोक्षी ने अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत की। बाद में निर्देशक चंदूलाल शाह ने उनके पिता को अपनी फिल्म ‘जमीन के तारे’ में हुतोक्षी को अभिनय करने की अनुमति देने के लिए मना लिया। इसी दौरान शाह ने बिमल रॉय की प्रसिद्ध फिल्म ‘मधुमती’ के शीर्षक से प्रेरित होकर हुतोक्षी का फिल्मी नाम मधुमती रख दिया।
फिल्म ‘जागते रहो’ के लिए राज कपूर पंजाब से मनोहर दीपक नामक कलाकार को खोजकर लाए, जिन्होंने पहली बार पर्दे पर भांगड़ा नृत्य प्रस्तुत किया। विवाहित और चार बच्चों के पिता मनोहर दीपक आगे चलकर पंजाबी फिल्म ‘खेलण दे दिन चार’ के निर्माण के दौरान मधुमती के संपर्क में आए। चूंकि दोनों की नृत्य में रुचि थी इसलिए उन्होंने ‘मधुमती-मनोहर दीपक सांस्कृतिक मंडली’ की स्थापना की और सुनील दत्त के साथ मिलकर ‘अजंता आर्ट्स’ के बैनर तले भारतीय सैनिकों का मनोरंजन करने लगे।
देश-विदेश में कार्यक्रम करनेवाली यह मंडली एक बार ब्रिटेन में प्रस्तुति दे रही थी, तभी मनोहर दीपक की पत्नी को भारत में दिल का दौरा पड़ा। इस खबर को सुन मनोहर तत्काल अपने दल के साथ लौट आए, पर अफसोस कि छह दिन बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया। अब मनोहर के सामने बच्चों की देखभाल की चुनौती खड़ी हो गई। उन्होंने बच्चों के भविष्य के लिए पंजाब में बसने का निश्चय किया, किंतु उनकी राखी बहन नरगिस दत्त ने उन्हें ऐसा करने से रोका। उन्होंने सुनील दत्त से अनुरोध कर मनोहर को फिल्म ‘आम्रपाली’ में एक भूमिका दिलवाई। बच्चों के पालन-पोषण और जीवन में स्थिरता लाने के उद्देश्य से नरगिस ने मधुमती को मनोहर से विवाह करने के लिए तैयार कर लिया, क्योंकि दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। इस प्रकार मात्र १९ वर्ष की आयु में मधुमती विवाह करके चार बच्चों की मां बन गईं। मधुमती ने एक आदर्श गृहिणी का किरदार बड़ी खूबसूरती से निभाया।
पति के साथ मिलकर उन्होंने पंजाबी फिल्मों के अतिरिक्त मराठी में ‘सावली प्रेमाची’ नामक फिल्म बनाई। अपने लंबे और सक्रिय करियर में उन्होंने तीन हजार से अधिक मंच प्रस्तुतियां कीं। अनेक भाषाओं की फिल्मों में अभिनय किया और चालीस वर्षों तक मधुमती नृत्य अकादमी का संचालन किया।
