कविता श्रीवास्तव
महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों के चुनाव को लेकर प्रशासनिक व राजनीतिक सरगर्मियां और हलचलें तेज हुई हैं। दरअसल, ओबीसी आरक्षण को लेकर चल रहे आंदोलन और विवाद के कारण २०२२ से ही बृहन्नमुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (बीएमसी) समेत कई स्थानीय निकायों के चुनाव टलते रहे हैं। इस पर दखल देते हुए कोर्ट ने ३१ जनवरी, २०२६ तक चुनाव कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि फिलहाल २०१७ की आरक्षण व्यवस्था के अनुसार ही चुनाव संपन्न कराएं। इसीलिए निर्वाचन आयोग की सक्रियता तेज हुई है। वॉर्डों के परिसीमन और एवीएम मशीनों की व्यवस्था के लिए ३१ अक्टूबर तक की तारीख कोर्ट ने तय की है। इसी बीच विपक्ष ने पुरजोर तरीके से यह मांग उठाई है कि जब तक मतदाता सूची दुरुस्त नहीं होती है तब तक चुनाव न कराया जाए। यह बात बिल्कुल तार्किक है और जरूरी भी है क्योंकि मतदाता सूचियों में अनेक प्रकार की गड़बड़ियों की शिकायतें उठ रही हैं। कहीं लोगों की आयु गलत है तो कहीं नाम। कहीं नाम है तो फोटो नहीं है। किसी के नाम दो बार हैं तो किसी के गायब हैं। कुछ लोग स्वर्गलोक पहुंच गए हैं, पर उनके नाम मतदाता सूची में चल रहे हैं। इसीलिए वोटर लिस्ट को अपडेट करना वाकई जरूरी है। आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तमाम आधुनिक संसाधनों के जमाने में हैं। ऐसे में मतदाता सूची को अपडेट करना कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है। बिहार के चुनाव में जिस तरह से विशेष ऑपरेशन चलाकर मतदाता सूची को दुरुस्त किया गया वैसा ही महाराष्ट्र में होना चाहिए। जब तक यह नहीं होता है तब तक चुनाव को रोकना जरूरी है। यह आवश्यक है कि सभी मतदाताओं के वेरिफिकेशन के बाद पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप सही मतदान हो। कोई मतदाता मतदान करने से न चूके। साथ ही मतदाता सूची में कोई फर्जी या गलत नाम भी शामिल न हो। महाराष्ट्र में महानगरपालिकाओं, नगरपरिषदों व स्थानीय निकायों के चुनाव वैसे भी सालों से रुके हुए हैं। खुद मुंबई महानगरपालिका का पिछला चुनाव २०१७ में हुआ था। मुंबई में कुल २२७ वॉर्ड हैं। २०१७ के चुनाव में लगभग ९१ लाख ८० हजार से अधिक मतदाता थे। वर्तमान में यह संख्या निश्चित ही बढ़ी होगी। वैसे राज्य निर्वाचन आयोग ने केंद्रीय निर्वाचन आयोग को लिखकर कहा है कि महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों के चुनाव के बाद ही मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराया जाए। नहीं तो निर्वाचन आयोग के कर्मचारी उसी में व्यस्त रहेंगे और चुनाव कराने में परेशानी होगी। लेकिन यह तो अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की बात हुई। विपक्ष ने इसी बात को पकड़ा है और मांग उठाई है कि पहले मतदाता सूची सही करो, उसके बाद ही चुनाव कराओ। जनहित में यही तो पते की बात लग रही है न!
