पंकज तिवारी
पिछले कई दिनों से लगातार बखरी में लिपाई-पोताई का काम चालू था, मजे की बात ये कि पूरा गांव ही साफ-सफाई में लगा हुआ था। दुकान-दउरी वाले सब सामान बाहर निकालकर अंदर रंगाई-पुताई में लग गए थे तो चाय-पान, गुमटी वाले नीला-पीला, सफेद रंग लिए ही जुट गए थे। गांव के हर घर का बच्चा दरवाजे पर एक छोटा सा ही सही पर मंदिर जरूर बनाया था। कहीं-कहीं तो बड़े भी लग गए थे। बाबू-माई भी साथ लगकर बखरी को एकदम चकाचक कर चुके थे। धूप सोख लेने के बाद बखराr एकदम से चमक उठी थी, टक्क से ताक दी हो जैसे। शुद्ध सफेद पावडर में डूबी कोई सुंदरी की भांति चमक उठी थी बखरी। माई, गांव के सभी लोगों से अलग दो-तीन तल्ले का छोटा सा इतना बढ़िया मंदिर बनाई थी कि देखने के लिए लोग जुटने लगे थे। गांव के कई बच्चे और लोग नकल करके हू-बहू बनाना भी चाहे थे पर हुनर सब में बराबर नहीं न होता, भरभरा कर गिर ही गया था। पूरा अंगना, दुआर गोबर से लीप कर फगुना भी अब अन्य कामों में लग गई थी कि टन-टन-टन-टन घंटी की आवाज गांव में गूंजने लगी। गांव भर के बच्चे जोर लगाए उधर ही भागने लगे थे। मितई काका दियली, तराजू, जांत-जंतोला लिए आ गए थे। माई झट से घर के अंदर गई और खूब भरकर सिधा-पिसान लिए बाहर आ गईं और पीछे-पीछे दउरा लिए फगुना भी आ गई।
‘काकी पाऽ लागी…’
‘निके रहऽ भैया, मजा करऽ’- माई बोली।
‘बाह रे काकी… एक ओरीऽ कहत हऊ की निके रहऽ, मजा करऽ अउर एक ओरी चीखि के पिसान देत हऊ। एतने में काउ उपरे रे काकी। का हमार गदेलेऽ तोर गदेलेऽ नाइ हयेन रेऽ… ओन्हन क पेट न भरेऽ त का तोका निक लागे रे काकी… आखिर तहिन बताउ का हम झूठ कहथई रेऽ…’
‘बाह रे बेटवना… बहुत कुड़ीच हये रे तंइ, बोलइ में तोंका के पाइ सकथऽ रेऽ…, ई न कहबे कि बुढ़िया काकी हउ, कमाई-धमाई त बा नाइ भला चार दियली फालतुअइ देइ देई।’
मितई बेचारे शरमाकर मुंह बिचकाने लगे- ‘काऽ रे काकी…।’
‘खैर साल भरे क त्योहार अहइ, हम तोहंइ नराज न करब। हे फगुनी… बिट्टी… जे लियाइ के देइ देऽ अउर रेऽ…। ओइसइ देखे उहीं मिठइया के डिब्बवा में से चार-छ ठे मिठइयउ लियाइ के देइ दिहेऽ।’
‘बेटवा मितई जे लेइ जे, भगवान करंइ खोब बढ़िया से मनइ तोर देवाली’- फगुना के घर में जाने के बाद मितई से माई ने कहा।
गांव भर में घूमकर मितई सभी के घरों में दीपावली का पूरा सामान पहुंचा लेने के बाद अब अपने घर वापस चले गए थे।
बाबू-माई, फगुना और भैया सब मिलकर अब संझा के तैयारी में लग गए थे। शाम ढलते ही आसमान से लेकर धरती तक जगमगाहट पैâल गई। चमक सभी की आंखों में देखा जा सकता है। फगुना अंगना में लीप कर चौक पुरना बना दी और माई बड़का परात लिए वहीं बैठ गई। धूप-दीप जलाकर पूजा करने के बाद बड़े कोसा में दीया जला दी। अंधेरा आंगन रोशनी से नहा उठा। बाबू, फगुना और भैया सभी बारी-बारी थाली में दीया लिए जगह-जगह धरने लगे। फगुना का भी घर अब जगमगाने लगा था। लाल साड़ी में फगुना बहुत ही सुशील और सुंदर दिख रही है, ‘नजर न लगइ हो हमरे फगुनी के, बड़ी सुघ्घर लागत बाऽ आज’- बाबू से हंसते हुए माई ने कहा। हंसते हुए बाबू भी हां में सिर हिला दिए। शरमा कर फगुना अपनी सहेली के साथ अब मंदिर की ओर बढ़ गई जहां पहले से ही भीड़ थी। जगमगाते रास्ते, जगमगाते घर-द्वार और जगमगाते सभी के चेहरे को देखकर गजब की खुशी छलक आई है। चमक सभी के आंखों में झलक रही है। बच्चे-बड़े सभी आज नए कपड़े पहनकर खूब-खूब इतरा रहे हैं तो कुछ पटाखे फोड़ने में लग गए हैं। माई तो खूब डरती है पटाखे से। बेचारी अब कान में रुई ठूसे मां लक्ष्मी की पूजा करने लगी थीं। बाबू भी साथ में बैठ गए थे। कुछ देर और बीता होगा कि माई अब नजर झाड़ने वाले मंत्र को जगाने लगी थीं। सभी मंत्र जिससे किसी को झारा जाता है उनको दीपावली के दिन जरूर जगाया जाता है। फगुना और भैया साथ बैठ अपने किताब, कलम, कापी की पूजा करने लगे हैं। उधर माई मंत्र जगाने के बाद सभी के आंखों में काजल लगाने को तैयार बैठी हैं।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
