सना खान
एक लड़का हमेशा सोचता था कि उसके पिता उससे बहुत कम प्यार करते हैं। पिता कभी उसे गले नहीं लगाते थे। न उसकी तारीफ करते थे और न ही यह कहते थे कि उन्हें उस पर गर्व है। जब भी लड़का कोई उपलब्धि हासिल करता, पिता बस इतना कहते, ‘अच्छा है, आगे और मेहनत करो।’ लड़के को कई बार लगता कि शायद उसके पिता कभी खुश ही नहीं होते। समय बीतता गया। पढ़ाई पूरी हुई, नौकरी मिली और वह दूसरे शहर में रहने लगा। कई वर्षों बाद जब वह अपने गांव लौटा, तो चौपाल पर बैठे कुछ बुजुर्ग उससे मिलने आए। एक ने मुस्कुराकर कहा, ‘तुम्हारे पिता तुम्हारी हर उपलब्धि का जिक्र करते थे।’ दूसरे ने कहा, ‘जब तुम्हें नौकरी मिली थी, उन्होंने पूरे गांव को मिठाई खिलाई थी।’ तीसरे ने हंसते हुए कहा, ‘और तुम्हारे बचपन के क्रिकेट मैचों की कहानियां तो हमें आज भी याद हैं। तुम्हारे पिता हर नए मिलने वाले को सुनाते थे।’ लड़का चुप हो गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसके पिता ने जो कभी उससे नहीं कहा, उसे वे दुनिया से कहते फिरते थे। उस दिन उसे समझ आया कि उसके पिता प्यार जताना नहीं जानते थे, लेकिन प्यार करना जरूर जानते थे। उसे अपने बचपन की कई बातें याद आने लगीं। जब वह बीमार पड़ता था, तो पिता पूरी रात उसके सिरहाने बैठे रहते थे। जब उसे किसी चीज की जरूरत होती, तो पिता अपनी इच्छाएं पीछे रख देते थे। उस समय उसे ये बातें सामान्य लगती थीं, लेकिन आज उसे समझ आया कि प्रेम हमेशा शब्दों में नहीं दिखता। कई बार वह त्याग, चिंता और छोटी-छोटी बातों में छिपा होता है। उसकी आंखें नम हो गईं। उसे महसूस हुआ कि कुछ रिश्ते अपने जज्बात शब्दों से नहीं, बल्कि खामोशी, फिक्र और अनगिनत छोटे-छोटे कर्मों से निभाते हैं। बात यही है कि जो नहीं कहा गया, उसका भी वजन होता है। हर प्रेम शब्दों में व्यक्त नहीं होता। कुछ रिश्ते बोलते कम हैं, लेकिन महसूस बहुत होते हैं।
हर एहसास को लफ्जों में कहना जरूरी नहीं होता,
हर प्यार का इजहार करना जरूरी नहीं होता।
कुछ रिश्ते खामोशी में भी उम्र भर साथ रहते हैं,
हर जज्बात को आवाज देना जरूरी नहीं होता।
