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’रामराज’ में राम से छलावा! भरत को मौत और मयंक रूपी चंद्रमा पर ग्रहण

अनिल तिवारी

सत्ता जिस व्यवस्था को रामराज कहकर गौरवान्वित होती है, उसी व्यवस्था के सामने आज तीन प्रतीकात्मक प्रश्न खड़े हैं, राम के नाम पर चढ़ावे में कथित गड़बड़ी, भरत तिवारी की एनकाउंटर में मौत और मयंक लोहार की मामूली विवाद में हत्या। राम मर्यादा और न्याय के प्रतीक हैं, भरत त्याग और निष्ठा के, जबकि मयंक का अर्थ चंद्रमा है, शीतलता और प्रकाश। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में राम से छलावा हो रहा है, भरत को न्याय मिलने से पहले मौत मिल रही है और मयंक रूपी चंद्रमा पर हिंसा का ग्रहण लग रहा है।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के मंदिर की देखरेख ऐसे व्यक्तियों के हाथों में होनी चाहिए, जिनकी सत्यनिष्ठा और नैतिकता संदेह से परे हो। मगर चढ़ावे और दान में कथित अनियमितताओं के आरोपों के बाद भी जिम्मेदार पदाधिकारियों पर त्वरित कार्रवाई दिखाई नहीं देती। न इस्तीफा, न पद से हटाने की पहल और न ही प्रभावशाली लोगों के विरुद्ध तत्काल एफआईआर। जांच चल रही है, लेकिन श्रद्धालुओं को यह जानने का भी अधिकार है कि ट्रस्ट की बैठकों में शामिल पदाधिकारी, वित्तीय व्यवस्था संभालने वाले लोग और चार्टर्ड अकाउंटेंट जवाबदेही से बाहर कैसे रह सकते हैं? क्या यही रामराज है, जहां राम के नाम पर चढ़ावा भी सुरक्षित नहीं?
कुर्सी का मोह और भ्रष्टाचार
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के मंदिर की देखरेख ऐसे लोगों के हाथों में होनी चाहिए, जिनका आचरण मर्यादा, सत्यनिष्ठा, पवित्रता, पारदर्शिता और निष्कपटता का उदाहरण हो, लेकिन अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान के कथित गबन की जांच ने श्रद्धालुओं के सामने बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एसआईटी ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा और अन्य जिम्मेदार लोगों से पूछताछ कर चुकी है तथा अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी है। इसके बावजूद अभी तक सार्वजनिक रूप से न किसी बड़े पदाधिकारी के इस्तीफे की जानकारी है, न उनके हटाए जाने की और न ही किसी प्रभावशाली व्यक्ति के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होने की।
क्या यही हिंदुत्व है?
क्या यही हिंदुत्व है? क्या यही रामराज है, जहां सामान्य नागरिक पर तत्काल गोली चल सकती है, लेकिन भगवान राम की आस्था से धोखा करने के आरोपों पर प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलता रहे? रामराज का अर्थ केवल मंदिर निर्माण नहीं, बल्कि निष्पक्ष न्याय, नैतिक शासन और बिना भेदभाव के दंड है। यदि राम के मंदिर में भी जवाबदेही नहीं होगी, तो मर्यादा की बात केवल भाषणों तक सीमित रह जाएगी। बिहार में भरत तिवारी मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पुलिस ने न्यायालय तक मामला पहुंचने से पहले ही एनकाउंटर के जरिए फैसला कर दिया। कानून कहता है कि अपराधी को भी न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार है, लेकिन जब वर्दी ही जांचकर्ता, न्यायाधीश और दंडाधिकारी बन जाए तो संविधान का अर्थ कमजोर पड़ने लगता है।

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