अजय भट्टाचार्य
मीडिया जगत में संघ के सबसे पुराने मित्र के अखबार ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के जमीन घोटालों का खुलासा किया है। अखबार इंदिरा गांधी के खिलाफ काफी मुखर था, क्योंकि अखबार के मालिक जन संघ के सांसद भी रहे थे। इंदिरा गांधी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बनाने में बड़ा हाथ था। आज उनका वारिस केंद्रीय सत्ता की भक्ति में आकंठ डूबा हुआ है। वैसे तो मोहन, भजन, नायब, पुष्कर जैसे सब प्यादे हैं क्योंकि इनकी अपनी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं है। इनके कार्यालय दिल्ली से चलते हैं। यह बात बिलकुल गले नहीं उतरती कि इस अखबार ने सत्ताधीश दल के किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ इतनी बड़ी कहानी छाप दी। इस जमीन घोटाले की कहानी में संघ/भाजपा के अंदर का ही कोई आदमी मोहन की बंशी बजाने की कथा लिख रहा है। देश का मीडिया ऐसे दर्जनों घोटालों पर कुंडली मार कर बैठा है, खबर बाहर तभी आएगी जब ऊपर बैठे किसी बड़े आदमी को अपना गणित सुधारना होगा।
विकास की कीमत?
लगभग चार साल पहले जिस परियोजना का ढोल पीटकर प्रचार किया गया, आज वह बर्बादी का स्मारक बन चुका है। नोएडा का भव्य बस टर्मिनल आज सरकारी उदासीनता और खोखली पीआर राजनीति का शिकार है। जनता के टैक्स के १५८ करोड़ रुपए इस टर्मिनल को बनाने में झोंक दिए गए। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका उद्घाटन किया था। अब इसके प्रवेश द्वारों पर जंजीरें और ताले लटके हैं। नोएडा के बाद अब वाराणसी में भी एक परियोजना का ढोल पीटा जा जरहा है। गंजारी, हरसोस, सूईचक और टेकीकहार गांवों में किसान अपनी जमीन बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम और स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर हो रहे भूमि अधिग्रहण को लेकर ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। एक तरफ विकास के बड़े दावे हैं, दूसरी तरफ खेत और घर उजड़ने का डर। सवाल यही है, क्या हर विकास की कीमत किसान ही चुकाएगा?
तुषार मेहता का कार्यकाल बढ़ा
भारत के महा न्यायभिकर्ता तुषार मेहता का कार्यकाल एक जुलाई से तीन साल और बढ़ा दिया गया है। वे अक्टूबर २०१८ से इस पद पर हैं और इस साल उनके कार्यकाल के आठ साल पूरे हो जाएंगे। इसके साथ ही वे सीनियर एडवोकेट सीके दफ्तरी के बाद सबसे लंबे समय तक महा न्यायभिकर्ता रहने वाले दूसरे व्यक्ति बन गए हैं; दफ्तरी भारत के पहले महा न्यायभिकर्ता थे और १३ साल तक इस पद पर रहे थे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)
