कविता श्रीवास्तव
ओडिशा के भुवनेश्वर में आयोजित राष्ट्रीय अंतर-राज्य एथलेटिक्स चैंपियनशिप में जो हुआ, उसने भारतीय खेल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। ४०० मीटर बाधा दौड़ में तमिलनाडु की धाविका हर्षिता की लेन में नियमों के अनुसार दस की जगह केवल नौ हर्डल लगाए गए। यह गलती आयोजन और तकनीकी अधिकारियों की थी। जब विरोध हुआ तो पूरी हीट दोबारा कराने के बजाय केवल हर्षिता को अकेले दौड़ने का मौका दिया गया। बिना प्रतिस्पर्धा के दौड़ते हुए वह आवश्यक समय नहीं निकाल सकीं और फाइनल में जगह बनाने से चूक गर्इं। एक अधिकारी की चूक ने वर्षों की मेहनत पर पानी फेर दिया।
यह घटना केवल एक तकनीकी भूल नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है, जिसमें गलती व्यवस्था करती है और कीमत खिलाड़ी चुकाता है। किसी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में ट्रैक, उपकरण और नियमों की अंतिम जांच अनिवार्य होती है। यदि इतनी बुनियादी व्यवस्था भी सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, तो खिलाड़ियों से उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा वैâसे की जा सकती है? हाल ही में भारतीय महिला पहलवान विनेश फोगाट को भारतीय कुश्ती महासंघ ने ट्रायल में भाग लेने नहीं दिया था। उन्हें तमाम तरह की तकनीकी अड़चनों में लटकाया गया। कोर्ट जाने पर ही उन्हें ट्रायल की अनुमति मिली। लेकिन तब तक वह इतना परेशान हो गर्इं कि अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पार्इं। वर्ष २०२३ में देश के कई शीर्ष पहलवानों ने कुश्ती महासंघ के तत्कालीन नेतृत्व के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए और न्याय की मांग को लेकर महीनों तक आंदोलन किया।
ऐसे अनेक उदाहरण बताते हैं कि भारत में खिलाड़ी अक्सर दो मोर्चों पर लड़ता है। पहला मुकाबला मैदान में अपने प्रतिद्वंद्वी से होता है और दूसरा व्यवस्था की कमियों, लापरवाही और प्रशासनिक अव्यवस्था से।
हर्षिता का मामला उन हजारों खिलाड़ियों की आवाज है, जो वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं और फिर किसी अधिकारी की एक गलती से उनका भविष्य प्रभावित हो जाता है। इसीलिए जरूरी है कि हर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में तकनीकी अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, लापरवाही पर कार्रवाई हो और खिलाड़ियों न्याय मिले। यदि खिलाड़ी देश के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं, तो खेल प्रशासन भी उन्हें निष्पक्ष, सुरक्षित और त्रुटिरहित वातावरण उपलब्ध कराए। क्योंकि जब व्यवस्था हारती है, तो केवल एक खिलाड़ी नहीं, पूरे देश का खेल हारता है।
