मुख्यपृष्ठस्तंभजुमला अर्थव्यवस्था जमीन पर धराशायी

जुमला अर्थव्यवस्था जमीन पर धराशायी

आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार फेल

नई दिल्ली। भारत के निजी क्षेत्र की वृद्धि जून में तीन महीने के निचले स्तर पर पहुंचना केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों के लिए चेतावनी है। एचएसबीसी के प्रारंभिक पीएमआई सर्वेक्षण के अनुसार, समग्र सूचकांक मई के ५९.३ से घटकर जून में ५७.४ रह गया। सूचकांक अभी ५० से ऊपर है, इसलिए अर्थव्यवस्था में विस्तार जारी है, लेकिन विनिर्माण और सेवा-दोनों क्षेत्रों की रफ्तार कमजोर होना चिंता का विषय है।
सेवा क्षेत्र की वृद्धि १७ महीने के निचले स्तर पर और विनिर्माण की रफ्तार तीन महीने के न्यूनतम स्तर पर आ गई। नए ऑर्डर की वृद्धि धीमी हुई, विदेशी मांग २१ महीने की सबसे कमजोर गति से बढ़ी और रोजगार सृजन भी छह महीने में सबसे धीमा रहा। कारोबारी भरोसा जनवरी के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंचना बताता है कि उद्योग भविष्य को लेकर उतना आश्वस्त नहीं है, जितना सरकारी दावों से दिखाई देता है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और मोदी सरकार लगातार ऊंची विकास दर, निवेश और आर्थिक मजबूती का दावा करती रही हैं। लेकिन निजी क्षेत्र की गति में गिरावट सवाल उठाती है कि क्या नीतियों का लाभ वास्तविक मांग, छोटे उद्योगों और रोजगार तक पहुंच रहा है। लोगों की आय अपेक्षित गति से न बढ़े, घरेलू खर्च दबाव में हो और उत्पादन लागत बढ़ती रहे तो कर रियायतों तथा बड़े निवेश घोषणाओं से बाजार में स्थायी मांग पैदा नहीं होती।
सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी आर्थिक सफलता को केवल जीडीपी, शेयर बाजार और कर संग्रह से मापना है। छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए सस्ता कर्ज, स्थिर नीतियां, समय पर भुगतान और उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति अधिक महत्वपूर्ण हैं। कमजोर मानसून की चिंता और कारोबारी आंकड़ों ने शेयर बाजार को भी प्रभावित किया, जहां प्रमुख सूचकांक गिर गए और १६ में से १४ क्षेत्र नुकसान में रहे।
एक महीने का पीएमआई सर्वेक्षण वित्त मंत्री को हर मोर्चे पर असफल सिद्ध नहीं करता, लेकिन लगातार कमजोर होती मांग और भरोसा सरकार से जवाब अवश्य मांगते हैं। यदि रोजगार, आय और खपत को प्राथमिकता नहीं दी गई तो कागजों पर विकास जारी रहते हुए भी कारोबार और आम नागरिक आर्थिक दबाव झेलते रहेंगे।

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