सना खान
एक छोटे से कस्बे में एक बुजुर्ग शिक्षक रहते थे। उन्होंने अपने जीवन के चालीस वर्ष बच्चों को पढ़ाने में बिताए थे। सैकड़ों विद्यार्थी उनके पास से पढ़कर निकले थे। कोई डॉक्टर बना, कोई इंजीनियर, तो कोई अधिकारी। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद उनका अधिकांश समय घर में ही बीतने लगा। पत्नी का देहांत हो चुका था और बच्चे नौकरी के कारण दूसरे शहरों में रहते थे। हर शाम वे अपने घर के बाहर एक कुर्सी लगाकर बैठ जाते और सड़क पर आते-जाते लोगों को देखते रहते। मोहल्ले के लोग अक्सर सोचते थे कि शायद उन्हें कोई काम नहीं है, इसलिए वे यूं ही बैठे रहते हैं। एक दिन पास रहने वाले एक युवक ने उनसे पूछ लिया, ‘दादा, आप रोज यहां बैठकर क्या देखते रहते हैं?’ बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, ‘मैं लोगों को नहीं देखता बेटा, मैं इंतजार करता हूं।’ ‘किसका?’ युवक ने हैरानी से पूछा। ‘किसी ऐसे व्यक्ति का, जिसे मेरी जरूरत हो।’ युवक को यह बात समझ नहीं आई। कुछ दिनों बाद उसने देखा कि एक स्कूली बच्चा रोज शाम को उस बुजुर्ग के पास बैठने लगा। कभी पढ़ाई पूछता, कभी अपनी परेशानियां बताता। एक दिन बच्चे ने धीमे से कहा, ‘दादा, घर में मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं है, इसलिए मैं यहां आ जाता हूं।’ बुजुर्ग ने उसके सिर पर हाथ रखा और मुस्कुरा दिए। धीरे-धीरे मोहल्ले के और बच्चे भी वहां आने लगे। कोई गणित सीखने आता, कोई करियर की सलाह लेने, तो कोई सिर्फ अपने मन की बात कहने। वह खाली कुर्सी अब कभी खाली नहीं रहती थी। बच्चों को वहां सिर्फ पढ़ाई नहीं मिलती थी, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति मिलता था जो बिना टोके उनकी बातें सुनता था। कई बार एक अच्छा श्रोता, एक अच्छे शिक्षक से भी ज्यादा जरूरी होता है। वर्षों बाद उन बच्चों में से कई बड़े अधिकारी, शिक्षक और डॉक्टर बने। एक समारोह में जब उनसे पूछा गया कि उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या है, तो कई लोगों का जवाब एक ही था- ‘हमारे मोहल्ले की वह खाली कुर्सी, जहां हमेशा कोई हमें सुनने वाला बैठा रहता था।’ ‘उन्होंने हमें जवाब कम दिए, लेकिन हमारी बातें पूरी सुनीं।’ उस दिन लोगों को समझ आया कि बुजुर्ग शिक्षक किसी का इंतजार नहीं कर रहे थे, बल्कि किसी के काम आने का अवसर तलाश रहे थे। कुछ लोग अपनी मौजूदगी से नहीं, अपनी उपलब्धता से लोगों की जिंदगी बदल देते हैं।
खाली थी कुर्सी, मगर दिल भरा हुआ था,
वहां बैठा इंसान सबसे जुड़ा हुआ था।
कुछ लोग बोलकर नहीं, सुनकर बदल देते हैं,
उसका यही हुनर सबसे बड़ा हुआ था।
