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रोखठोक : महाराष्ट्र की नई पहचान!..‘‘हम सत्ता में बैठे लोग हैं, पैसे तो खाएंगे ही!’’

संजय राऊत

`महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार का ‘जामनेर पैटर्न’ चल रहा है। इसके उदाहरण रोज सामने आ रहे हैं। नासिक जैसे शहर में दस-बारह बेगुनाह लोगों की जान सड़क के गड्ढों ने ले ली। पूरे राज्य में सड़कों और यातायात की स्थिति खराब हुई है तो वह सिर्फ भ्रष्टाचार के कारण। शिक्षा, कृषि, नगर विकास, राजस्व, जलापूर्ति जैसे हर विभाग में लूट मची हुई है। ‘‘हम सत्ता में बैठे लोग हैं, पैसे तो खाएंगे ही’’ इस बेशर्म सोच से यह सब चल रहा है।’

देवेंद्र फडणवीस ने हंसते हुए घोषणा की कि, ‘महाराष्ट्र दुनिया की तीसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।’ यह तीसवां स्थान महाराष्ट्र को आखिर कैसे मिला है, यह उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। क्योंकि महाराष्ट्र की आज की स्थिति ठीक इसके उलट है। महाराष्ट्र का ट्रांसपोर्ट, सड़कें और यातायात व्यवस्था चरमरा गई है। सत्तर प्रतिशत प्रमुख सड़कें भ्रष्टाचार के गड्ढों में चली गई हैं। सड़क निर्माण में हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार हुआ है, जिसका खामियाजा जनता भुगत रही है। १६ और १७ अगस्त को दो दिन मैं नासिक में था। सड़कों के भयानक गड्ढों के विरोध में नासिक की जनता सड़क पर उतर आई और मोर्चा लेकर महानगरपालिका के दरवाजे पर पहुंच गई। तब आयुक्त श्रीमती मनीषा खत्री अपने दफ्तर में थीं। मोर्चे का ज्ञापन लेकर प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने गया तो वे लाचारी से बोलीं, ‘‘मेरे घर के सामने भी बड़े गड्ढे खोदकर रखे हैं। वे भरे नहीं जा रहे हैं।’’ नासिक में कम से कम पंद्रह लोग सड़कों के गड्ढों में गिरकर मर गए हैं। पांच सौ से ज्यादा लोग हमेशा के लिए अपाहिज हो गए। इन नागरिकों का कसूर क्या है? वे महाराष्ट्र में रहते हैं और एक निकम्मी, भ्रष्ट सरकार महाराष्ट्र में सत्ता भोग रही है। वह लोगों की जान ले रही है। नासिक में कुंभ मेला होने वाला है। उस कुंभ मेले के लिए खोदकर रखी गई सड़कें मौत के दरवाजे बन गई हैं। ३५ हजार करोड़ रुपए कुंभ मेले का बजट है। वह पहले १५ हजार करोड़ रुपए का था। यह ३५ हजार करोड़ चहेते ठेकेदार, ठेकेदारों के जरिए मंत्रियों के दामादों और रिश्तेदारों की जेब में जा रहा है। कुंभ मेले के लिए पहले १५ हजार टॉयलेट बनाने का तय हुआ था। बाद में टॉयलेट का आंकड़ा ५६ हजार तक बढ़ गया। उसमें भी अब दस हजार से ज्यादा वीआईपी टॉयलेट बनेंगे। यह हैरान करने वाला है। वी.आई.पी. टॉयलेट में पैसा खाने वाले लोग सत्ता में हैं और प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री स्वच्छ कामकाज का पंख फड़फड़ाते हुए घूम रहे हैं। महाराष्ट्र की ८० प्रतिशत सड़कों की अवस्था पंख कटे बाज जैसी हो गई है। यह भ्रष्टाचार है।
ऐसे होता है भ्रष्टाचार
फडणवीस के अनुसार दुनिया में तीसवें नंबर की अर्थव्यवस्था वाले ‘महाराष्ट्र राज्य’ में भ्रष्टाचार वैâसे होता है, उसका नमूना मैंने नासिक शहर में देखा। भ्रष्टाचार का यह ‘जामनेर पैटर्न’ है। छुप-छुपाकर नहीं, बल्कि सरकारी काम में खुलेआम पैसा खाने का यह ‘जामनेर पैटर्न’ मुख्यमंत्री के आशीर्वाद से ही फल-फूल रहा है। चार जागरूक नागरिक मिलने आए, वे नासिक ‘स्मार्ट सिटी’ में हुए भ्रष्टाचार का मामला लेकर आए थे। ‘स्मार्ट सिटी’ अभी गड्ढों की सिटी बन गई है, फिर भी नासिक को ‘स्मार्ट’ बनाने के लिए करोड़ों रुपए का खर्च जारी है।
‘स्मार्ट सिटी’ का एक टेंडर ‘रेल टेल’ कंपनी ने ७१ करोड़ में हासिल किया। उसी टेंडर को इस कंपनी ने पुणे की एक कंपनी ‘नेस्टर’ को ५४ करोड़ में दे दिया। ‘नेस्टर’ ने वही काम श्री कम्बाइन नामक ठेकेदार कंपनी को ४४ करोड़ में दे दिया। मतलब मूल ७१ करोड़ का काम अब ४४ करोड़ में होगा। इस बीच के लेन-देन में २७-२८ करोड़ संबंधित मंत्रियों के दामादों को एक ही दिन में कमीशन के तौर पर मिले। भ्रष्टाचार का यह ‘जामनेर पैटर्न’ नासिक समेत महाराष्ट्र को लूट रहा है। इन सभी लेन-देन में नासिक महानगरपालिका के साथ बड़ा धोखा हो रहा है। एक ही काम के बिल नासिक महानगरपालिका और स्मार्ट सिटी दोनों से वसूले जा रहे हैं। इन सभी कारनामों का ब्योरा कागजों समेत मेरे सामने रखा गया तो मैं बेचैन हो गया।
शहर अभियंता, सार्वजनिक निर्माण विभाग की मिलीभगत से यह डकैती चल रही है। ऐसे कम से कम ६४ मामले मेरे पास आए हैं। मुख्यमंत्री को एक बार वे देख लेने चाहिए और उसके बाद ही महाराष्ट्र का विश्व-स्तर का नंबर घोषित करना चाहिए।
सभी विभाग डूब गए
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले कार्यकर्ता श्री. शरद अण्णा पवार मिले। नासिक जिलाधिकारी कार्यालय के सामने वे स्वतंत्रता दिवस पर भूख हड़ताल पर बैठे थे। भ्रष्टाचार और घोटालों के कई मामले दबाए जा रहे हैं और भ्रष्टाचार का पैसा सब मिलकर खा रहे हैं, यह उनका गुस्सा है।
उनके मुद्दे क्या हैं?
– महाराष्ट्र का शिक्षा विभाग भ्रष्टाचार से पूरी तरह खोखला हो चुका है। वहां दलालों का राज चल रहा है। फर्जी शिक्षक भर्ती, फर्जी रोस्टर, फर्जी वेतन, फर्जी शिक्षकों का वेतन, फर्जी टीएटी के माध्यम से शिक्षा विभाग में ९० हजार करोड़ का भ्रष्टाचार हुआ है। इसके सबूत लेकर ही वे भूख हड़ताल पर बैठे थे।
-महाराष्ट्र का दूसरा बड़ा भ्रष्टाचार कृषि विभाग में है। पवार के पास मौजूद सबूतों के अनुसार कृषि विभाग में नानाजी देशमुख कृषि संजीवनी योजना भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। खेती के औजारों की खरीद, ड्रिप सिंचाई योजना, फर्जी रासायनिक खाद की दुकानें, फर्जी दवा छिड़काव की दुकानें, फर्जी बीजों के लेन-देन जैसे माध्यमों से महीने में डेढ़ सौ-दो सौ करोड़ दलालों के जरिए जमा होते हैं और उसमें ऊपर से नीचे तक सभी अपना-अपना हिस्सा लेते हैं। इसमें संबंधित मंत्रियों का हिस्सा बड़ा है!
– महाराष्ट्र समेत पूरे देश के ‘जल जीवन मिशन’ में भी भ्रष्टाचार का पानी ‘धो-धो’ बह रहा है। महाराष्ट्र के जलापूर्ति विभाग में भ्रष्टाचार का मिशन जोरों पर है। अधूरी बनी हुई पानी की टंकियां, पाइपलाइन के झूठे बिल, अस्तित्व में ही न होने वाले झूठे कुओं के झूठे बिल, काम पूरा न होने पर भी एनओसी देकर पैसे निकालना जैसे अवैध लेन-देन से जल जीवन मिशन ‘प्रदूषित’ हो गया है। इसके सारे सबूत पवार ने मुझे दिखाए।
गंभीर बात यह है कि जल जीवन मिशन योजना जहां मंजूर है, उस गांव में आज भी ‘टैंकर’ से जलापूर्ति हो रही है।
न घरों में नल, न नलों में पानी। फिर भी इस ‘मिशन’ से महीने में ३०० करोड़ से ज्यादा की रकम दलालों के जरिए इकट्ठा होती है और उस भ्रष्ट गंगा में मंत्रियों से लेकर सभी नहाते हैं। अकेले नासिक से ही २९ करोड़ रुपए जमा होते हैं।
– राजस्व, नगर विकास जैसे विभागों में भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है।
– स्थानीय स्वराज संस्थाएं लूट का मुख्य केंद्र बन गई हैं और जनता के टैक्स का पैसा गड्ढों में डाला जा रहा है। फिर उन्हीं गड्ढों में बेगुनाहों की जान जा रही है। जान लेने वालों को ही नासिक का पालकत्व दिया, यह क्रूर बात है।
एमआईडीसी किसके लिए?
राज्य की एमआईडीसी के प्लॉट बिक्री में भ्रष्टाचार की अति शुरू है। महाराष्ट्र की औद्योगिक वसाहतों के प्लॉट मराठी उद्यमियों को दरकिनार कर नियमों के बाहर जाकर बेचे जा रहे हैं। शिर्डी एमआईडीसी में एक प्लॉट पाने के लिए अर्जी करने वाले एक मराठी उद्यमी को नियमों में बैठने के बावजूद नजरअंदाज कर दिया गया। यह उद्यमी मुझे नासिक में ही मिला। एमआईडीसी मराठी लोगों के लिए नहीं है, यह इससे स्पष्ट हो गया। उसने कहा कि, ‘‘मैं सभी कागजात लेकर एक्सप्रेस टॉवर्स में उद्योग मंत्री के ओएसडी से मिला। उन्होंने अपने एजेंट से मिलने को कहा। एजेंट से मिला तो उसने जगह की कीमत के बराबर ही रिश्वत मांगी। पूरे महाराष्ट्र की एमआईडीसी में इसी तरह प्लॉट बिक्री के घृणास्पद कारोबार चल रहे हैं,’’ ऐसा उस नौजवान उद्यमी ने मुझे बताया।
ठेकेदारों का आंदोलन
सरकारी काम करने वाले ठेकेदारों के ९० हजार करोड़ रुपए बकाया हैं। इन सभी ठेकेदारों से २५-३० प्रतिशत कमीशन विधानसभा चुनाव से पहले ही वसूल लिया गया है। काम करने के वर्क ऑर्डर निकाले गए, काम भी हुए, लेकिन बिल मंजूर नहीं हो रहे हैं। वो बिल निकलवाने में भी रिश्वतखोरी चल रही है।
चार ठेकेदारों ने अब तक आत्महत्या कर ली है। १८ अगस्त को सैकड़ों ठेकेदार मुंबई के आजाद मैदान में जमा हुए। उन्होंने धरना दिया, लेकिन सरकार उन्हीं का कमीशन खाकर डकार ले रही है। ठेकेदारों को आश्वासन देने भी कोई मंत्री नहीं गया। राज्य ठेकेदार चला रहे हैं, ऐसा आरोप विपक्ष लगाता है। उन ठेकेदारों का भी शोषण फडणवीस के राज में शुरू है, यह विशेष बात है।
निर्लज्जपना!
महाराष्ट्र के मंत्रियों को, सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को जैसे सोने की खान ही लूटने के लिए मिल गई है। इस लूट में उन्होंने चौकीदारों को भी शामिल कर लिया है। अदालतों को भी उनका हिस्सा मिल रहा है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र में सड़कों की जो भयंकर दुर्दशा हुई है, उसकी वजह से रोज लोगों की जान जा रही है। लेकिन इस पर सभी चुप हैं। अंग्रेजों के जमाने में हेनरी वैनसिटार्ट (१७६१) बंगाल का गवर्नर था। रिश्वत, नजराना, दलाली वगैरह लेने में उसे कोई शर्म नहीं आती थी। इंग्लैंड में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में वह कहता है,
‘‘हम सत्ता पर बैठे लोग हैं। हम सत्ता का फायदा उठाते हैं, ऐसा तू कहता है। पर मित्र, अगर फायदा उठाना ही नहीं है तो सत्ता में रहना ही क्यों?’’
वही अंग्रेजों वाली बेशर्मी महाराष्ट्र के सत्ताधारियों में गहराई तक घुस गई है। राज्य में सड़कें नहीं हैं। जो सड़कें हैं, उन पर गड्ढे ही गड्ढे हैं। उन पर ठीक से वाहन भी नहीं चल पाता। युवाओं को नौकरियां नहीं हैं। हर जगह बेईमानी का बाजार लगा है। जैसे स्वाभिमान और ईमानदारी के पंख टूटकर महाराष्ट्र गड्ढों में गिर गया हो।
ऐसे महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था दुनिया में तीसवें स्थान पर है, ऐसा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बता रहे हैं। यह आश्चर्यजनक ही है!
उन्हें एक बार आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखना चाहिए। बगल में दो उप-मुख्यमंत्रियों को खड़ा करना चाहिए।
तब महाराष्ट्र का मौजूदा डरावना रूप उन्हें दिखाई देगा।

 

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