-ट्रिलियन डॉलर के आंकड़ों ने खोल दी विकास के दावे की पोल
अरुण कुमार गुप्ता / मुंबई
भारत की अर्थव्यवस्था पर सत्ता पक्ष जब उपलब्धियों का ढोल पीटता है तो अक्सर एक बड़ा सवाल पीछे छूट जाता है, जिस अर्थव्यवस्था की विरासत मिली थी, उसके मुकाबले वास्तव में कितनी रफ्तार दिखाई गई? आंकड़ों की एक सरल तुलना इस बहस को नया मोड़ देती है।
२००४ में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बाद जब डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद संभाला, भारत की नॉमिनल जीडीपी लगभग ०.७ ट्रिलियन डॉलर के आसपास थी। २०१४ में नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के समय यह बढ़कर लगभग २.० ट्रिलियन डॉलर हो चुकी थी। विश्व बैंक का जीडीपी डेटाबेस इसी करंट युएस डॉलर आधार पर ऐतिहासिक आंकड़े उपलब्ध कराता है। अर्थात २००४ से २०१४ के बीच भारत की डॉलर में मापी गई अर्थव्यवस्था लगभग तीन गुना हुई। यही वह आंकड़ा है जिसे राजनीतिक बहस में सामने रखना जरूरी है।
अब दूसरी तरफ २०१४ से मोदी सरकार के १२ वर्षों की तस्वीर देखिए। विश्व बैंक के नवीनतम उपलब्ध आंकड़े के अनुसार, २०२५ में भारत की नॉमिनल जीडीपी लगभग ३.९६ ट्रिलियन डॉलर थी। आईएमएफ के अप्रैल २०२६ वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक में २०२६ के लिए भारत की अर्थव्यवस्था करीब ४.१-४.२ ट्रिलियन डॉलर के स्तर पर आंकी गई है। यानी २०१४ के लगभग २.० ट्रिलियन डॉलर से २०२६ के करीब ४.१ ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अर्थ है कि अर्थव्यवस्था लगभग दोगुने के आसपास पहुंची है, लेकिन तीन गुना नहीं। यहीं से राजनीतिक सवाल पैदा होता है-दस साल में लगभग तीन गुना बढ़ी अर्थव्यवस्था को अगले बारह साल में तीन गुना तो दूर, क्या वास्तव में दोगुने से भी ज्यादा किया जा सका? लेकिन इस तुलना को ईमानदारी से पेश करने के लिए एक और बात जरूरी है। डॉलर में जीडीपी केवल देश के वास्तविक उत्पादन की कहानी नहीं बताता। रुपए-डॉलर विनिमय दर में बदलाव भी इस आंकड़े को प्रभावित करता है इसलिए केवल नॉमिनल जीडीपी के आधार पर किसी सरकार की पूरी आर्थिक सफलता या असफलता का पैâसला करना उचित नहीं होगा। वास्तविक जीडीपी वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय, रोजगार, महंगाई, निवेश और उत्पादकता को भी साथ देखना होगा? फिर भी राजनीतिक दावों के बीच यह तुलना महत्वपूर्ण है।
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का खोखला सपना
सत्ता के मंच से जब भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के सपने दिखाए जाते हैं, तब जनता को यह भी पूछना चाहिए- विरासत में मिली अर्थव्यवस्था कितनी थी और बारह साल बाद वास्तविक बढ़ोतरी कितनी हुई? ट्रिलियन डॉलर के पोस्टर लगाने से अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती। असली कसौटी यह है कि जीडीपी के बढ़ते आंकड़े आम आदमी की आय, रोजगार और जीवन स्तर में कितनी बढ़ोतरी करते हैं। मनमोहन बनाम मोदी की बहस इसलिए केवल दो प्रधानमंत्रियों की तुलना नहीं, बल्कि आर्थिक रफ्तार के दावे और आंकड़ों के बीच का अंतर समझने की बहस है।
