अरुण कुमार गुप्ता
देश की अर्थव्यवस्था को दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनाने का दावा करने वाली मोदी सरकार के सामने अब कर्ज का बड़ा सवाल खड़ा है। क्या देश पर वास्तव में २७० लाख करोड़ रुपए का कर्ज है? केंद्र सरकार के बजट अनुमानों के अनुसार, ३१ मार्च २०२६ तक केंद्र सरकार की कुल बकाया देनदारियां करीब १९७ लाख करोड़ रुपए के स्तर पर थीं और ३१ मार्च २०२७ तक इनके लगभग २१५ लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। यानी सवाल केवल आंकड़े का नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती सरकारी उधारी का है। सरकार का कहना है कि कर्ज का पैसा सड़क, रेल, बंदरगाह, रक्षा, बिजली और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर खर्च किया जा रहा है। २०२६-२७ में पूंजीगत खर्च पर भी लाखों करोड़ रुपए खर्च करने की योजना है, लेकिन आम जनता का सवाल है कि इतना कर्ज लेकर मिला क्या। क्या युवाओं को उनकी डिग्री के अनुसार रोजगार मिला? क्या किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई? क्या महंगाई से जूझते मध्यमवर्ग की बचत बढ़ी? क्या छोटे उद्योगों और कारोबारियों को पर्याप्त राहत मिली? असली सवाल है कि उस कर्ज से भविष्य की आय, रोजगार और उत्पादन कितना बढ़ा। सरकार विकास परियोजनाओं और चमचमाते एक्सप्रेसवे की तस्वीर दिखा सकती है, लेकिन जनता अब हिसाब मांग रही है, लाखों करोड़ की उधारी के बावजूद बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असुरक्षा क्यों बनी हुई है? आखिर जनता के नाम पर लिया गया हर लाख करोड़ रुपया जनता की जिंदगी में कितना बदलाव लेकर आया। यही सबसे बड़ा सवाल है।
संघ के दरबार में नए चेहरे की तलाश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी सत्ता के केंद्र में हैं और भाजपा का सबसे बड़ा चुनावी चेहरा भी, लेकिन राजनीतिक गलियारों में एक सवाल लगातार जोर पकड़ रहा है। क्या २०२९ के लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भाजपा के भविष्य के नेतृत्व पर गंभीर मंथन कर रहा है? क्या ‘मोदी के बाद कौन?’ का सवाल अब बंद कमरों से निकलकर सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुका है? विपक्ष लंबे समय से सवाल उठाता रहा है कि भाजपा ने कभी ७५ वर्ष की उम्र के बाद वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय सत्ता की राजनीति से किनारे करने की परंपरा दिखाई। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे भाजपा के दिग्गज नेताओं को धीरे-धीरे सत्ता के केंद्र से बाहर किया गया। संघ सीधे चुनाव नहीं लड़ता, लेकिन भाजपा की वैचारिक दिशा और संगठनात्मक ढांचे में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में भविष्य के प्रधानमंत्री चेहरे को लेकर संघ की राय निर्णायक नहीं तो बेहद प्रभावशाली जरूर होगी।
