मुख्यपृष्ठस्तंभकांव-कांव : सवाल का जवाब न देने का हुनर.

कांव-कांव : सवाल का जवाब न देने का हुनर.

-हरिगोविंद विश्वकर्मा

कुछ लोग सवालजीवी होते हैं। हरदम सवाल पूछते रहते हैं। उन्हें सवाल पूछने की आदत होती है। खोद-खोदकर सवाल पूछते हैं। याद कर-करके सवाल पूछते हैं। कैसे हुआ? कब हुआ? क्यों हुआ? कहां हुआ? किसलिए हुआ? सच पूछें तो सवाल पूछना अच्छी आदत है ही नहीं। सवाल पूछने से कई दिक्कतें पैदा हो जाती हैं। यह तथ्य सवालजीवी लोग समझते नहीं। उन्हें देश की कोई चिंता नहीं है। पता ही नहीं कि सवाल से देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रीयता के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
सवाल पूछने से व्यक्ति असहज हो जाता है। आत्मविश्वास डगमगा जाता है। जवाब नहीं सूझता। हकलाना पड़ता है। कुछ ऐसी बातें मुंह से निकल जाती हैं, जो अमूमन नहीं बताई जातीं। इसीलिए आजकल जवाब देना बड़ा जोखिम भरा काम हो गया है। लोग जवाब में से सवाल निकालने लगते हैं। सवालों की बौछार करने लगते हैं। इससे ऐसी सूचनाएं बाहर आ जाती हैं, जो बाहर नहीं आनी चाहिए। इसलिए सच्चा नागरिक सवाल नहीं पूछता। बिना पूछे सरकार जो सूचना देती है, उसे अंगीकार कर लेता है।
सवाल पूछने से कोई भी समस्या हल तो होनी नहीं है। कुछ होता ही नहीं। यानी सवाल पूछना ऊर्जा की बर्बादी है। सच्चा देशभक्त सवाल पूछना तो दूर, सवाल पूछने के बारे में सोचता भी नहीं। जो देश में हो रहा है, उसे जस का तस होने देता है। जो कहा जा रहा है, उसे सुनता है। जो बताया जाता है, उसे मानता है। जानता है, सवाल पूछेगा तो समस्या तो हल होगी नहीं, उलटे दूसरी समस्या पैदा हो सकती है। परेशानी भी बढ़ सकती है।
पहले की बात और थी। सतयुग, त्रेता और द्वापर में सवाल ज्ञान बढ़ाने का माध्यम थे। सवाल पूछने से ज्ञान बढ़ता था। सूचना मिलती थी, लेकिन अब माहौल एकदम बदल गया है। माहौल देश की गुलामी के कारण बदला है। कई सौ साल की गुलामी ने माहौल का भट्ठा ही बैठा दिया। अब माहौल जहरीला हो गया है। सवाल भी जहरीले माहौल से जहर लेकर जहरीला हो जाता है। जहरीला सवाल पूछने पर ज्ञान नहीं बढ़ता, दुश्मनी बढ़ती हैं। सवाल ज्ञान से ज्यादा दुश्मन बढ़ता है।
जहरीले माहौल में सांस लेने से लोगों की सोच जहरीली हो गई है। ऐसी सोच खतरनाक होती है। आदमी चैन से नहीं बैठने देती। सवाल पूछने के लिए उकसाती है। व्यक्ति को हर बात जानने की सनक हो जाती है। किसी प्रोजेक्ट की सूचना मिलते ही सवालों की झड़ी लग जाती है। इस पर कितना खर्च हुआ? फायदा किसे हुआ? कहीं भ्रष्टाचार तो नहीं हुआ? इतने सवाल! आखिर किस-किस का जवाब दिया जाए?
इस स्थित को भांपकर देशभक्त और शरीफ लोग सवाल नहीं पूछते। इस प्रजाति के लोग चेहरा देखकर समझ जाते हैं, सवाल पूछना उचित नहीं। लिहाजा, चुप रहते हैं। केवल सिर हिलाते हैं। जरूरत पड़ती है तो खीस भी निपोर देते हैं। समाज में ऐसे लोगों की बड़ी इज्जत होती है, क्योंकि ये लोग बिना सवाल किए हर बात स्वीकार कर लेते हैं। इसीलिए इन्हें समझदार भी कहा जाता है। समझदारी का नया अर्थ यही है, जो बताया जाए, उसे मान लें और जो न बताया जाए, उसके बारे में पूछें मत। समझ लें कि नहीं बताया जा रहा है तो उसके पीछे देशभक्ति या देशहित होगा।
दूसरी ओर सवाल पूछने वाले पढ़े-लिखे लफंगे होते हैं। काफी पढ़ने-लिखने से उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। पढ़ाई-लिखाई व्यर्थ चली जाती है। सवाल पूछने लगते हैं। इसीलिए इन दिनों शिक्षा पर अधिक जोर नहीं दिया जा रहा है, बल्कि शिक्षा बजट कम कर दिया जा रहा है। लोग पढ़-लिख लेंगे तो सवालजीवी कीड़ा कुलबुलाएगा। सवाल पूछने लगेंगे। इसीलिए इन छिछोरों को देशभक्त और शरीफ लोग इन्हें संदेह की नजर से देखते हैं।
सवाल पूछना एक तरह की जिद है। जवाब मिल भी जाए तो अगला सवाल। एक सवाल के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा। यह सिलसिला चलता रहा तो सामने वाले को जवाब देते-देते उम्र निकल जाएगी। इसलिए सवाल की आरंभ में ही रोकथाम जरूरी है।
सवाल पूछने वाले से ही पूछ लिया जाता है, ‘भाई, आप सवाल क्यों पूछ रहे हैं? आपको क्या प्रॉब्लम है? आपको भरोसा नहीं है, जो सवाल पूछ रहे हैं? आप इतने नकारात्मक क्यों हैं? आप देश के इतने विरोधी क्यों हैं? आप अपनी संस्कृति पर गर्व क्यों नहीं करते? आप पाकिस्तान की कठपुतली क्यों बने हुए हैं? आपका चरित्र इतना संदिग्ध क्यों है? आप देश का माहौल क्यों खराब कर रहे हैं?’
अगर सवालजीवी कहे कि भाई, मैंने तो सिर्फ परियोजना पर कितना खर्च हुआ, ये पूछा था, तो कह दीजिए, ‘आपको खर्चे से क्या लेना-देना? आपको तरक्की दिखाई नहीं देती? आपको तरक्की पर भी शक है? आपको आंकड़े पर भरोसा नहीं है? आप आम खाइए, गुठली क्यों गिन रहे हैं? सवाल क्यों पूछ रहे हैं?’ बस, यहीं सवाल खत्म। वह स्वेच्छा से तो नहीं, हां मजबूरी में जरूर चुप हो जाएगा। यह बहुत ही उपयोगी कला है। जवाब से ज्यादा जरूरी है कि जवाब न देने की कला। जवाब दे दिया तो अगला सवाल आएगा। इसलिए समझदार लोग कह देते हैं, ‘अब सवाल मत पूछना। सवाल पूछना देशहित के खिलाफ है।’

(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)

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