मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका :अमित शाह का यूसीसी की आड़ में २०२९ का सियासी पैंतरा?

पॉलिटिका :अमित शाह का यूसीसी की आड़ में २०२९ का सियासी पैंतरा?

-के.पी. मलिक

सियासत में कोई मुद्दा अचानक पैदा नहीं होता और सत्ता की ओर से किसी मुद्दे की टाइमिंग भी कभी मासूम नहीं होती। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का २०२९ तक २१ एनडीए-शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू करने का एलान इसलिए सिर्फ एक कानूनी घोषणा मानकर आगे बढ़ जाना ठीक नहीं होगा। यूसीसी भाजपा के वैचारिक एजेंडे का पुराना हिस्सा है, संविधान के अनुच्छेद ४४ में इसकी दिशा का उल्लेख भी है, लेकिन असली सवाल यह है कि आज इसकी जरूरत इतनी अचानक क्यों महसूस हुई और २०२९ की डेडलाइन ही क्यों चुनी गई? क्योंकि २०२९ सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह अगला लोकसभा चुनाव वर्ष है। इसलिए सवाल कानून से पहले उसकी राजनीति का है। क्या अगले तीन वर्षों में यूसीसी को धीरे-धीरे राष्ट्रीय चुनावी नैरेटिव का केंद्रीय मुद्दा बनाया जाएगा? क्या भाजपा अपने पारंपरिक वैचारिक मुद्दों के जरिए उस राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करना चाहती है, जिस पर पिछले कुछ समय से रोजगार, महंगाई, किसान, शिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय और जातीय समीकरण जैसे सवाल हावी होते दिखाई दे रहे हैं? इन सवालों का अंतिम जवाब अभी किसी के पास नहीं है, लेकिन सत्ता की राजनीति को समझने के लिए सवाल पूछना ही पर्याप्त है।
दरअसल, यूसीसी अपने आप में असंवैधानिक या अवांछित विचार नहीं है। समान नागरिक कानून की बहस दशकों पुरानी है। महिलाओं को समान अधिकार मिलें, विवाह और उत्तराधिकार से जुड़े कानूनों में भेदभाव कम हो और नागरिकों के अधिकारों में समानता हो इन उद्देश्यों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब सामाजिक सुधार और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच की सीमा धुंधली होने लगे। भारत में कानून केवल संसद की किताबों में नहीं रहता; वह समाज की नसों में उतरता है। विवाह, परिवार, उत्तराधिकार और धार्मिक परंपराएं करोड़ों लोगों की निजी और सामुदायिक पहचान से जुड़ी हैं। इसलिए यूसीसी को लागू करना केवल कानून बदलने का काम नहीं होगा, बल्कि सामाजिक विश्वास की भी परीक्षा होगी।
सरकार को बताना होगा कि प्रस्तावित कानून में आखिर क्या बदलेगा, किसके अधिकार बढ़ेंगे, किन प्रथाओं में बदलाव होगा और अलग-अलग समुदायों की वैध चिंताओं का कैसे समाधान किया जाएगा। सिर्फ ‘एक देश, एक कानून’ का राजनीतिक नारा काफी नहीं है। एक कानून तभी न्यायपूर्ण माना जाएगा, जब उसके पीछे समानता के साथ समान भरोसा भी हो। लेकिन राजनीति का दूसरा पहलू इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है। पिछले कुछ वर्षों में देश में जाति और सामाजिक न्याय की राजनीति ने नई ऊर्जा हासिल की है। आरक्षण, जातीय जनगणना, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे विपक्ष के राजनीतिक अभियान का हिस्सा बने हैं। ऐसे समय में भाजपा के सामने सिर्फ विपक्षी दलों की चुनौती नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक समीकरणों को साधने की चुनौती भी है। यहीं यूसीसी भाजपा के लिए एक शक्तिशाली राजनीतिक हथियार बन सकता है। क्योंकि यह मुद्दा उसके वैचारिक समर्थक वर्ग को जोड़ सकता है, संगठन को सक्रिय कर सकता है और राजनीतिक बहस को आर्थिक प्रदर्शन से हटाकर पहचान और अधिकारों के सवाल की ओर ले जा सकता है।
यही संभावना इस घोषणा को महज कानून की बहस से बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाती है, लेकिन क्या जनता इतनी आसानी से अपना एजेंडा बदल देगी? और यही सत्ता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
अगर कोई युवा नौकरी मांग रहा है तो यूसीसी उसके रोजगार का जवाब नहीं है। अगर किसान लागत और फसल के दाम पर सवाल पूछ रहा है तो यूसीसी उसका आर्थिक संकट हल नहीं करता। अगर मध्यम वर्ग महंगाई से परेशान है तो व्यक्तिगत कानून में बदलाव उसकी रसोई का बजट नहीं बदलता और अगर शिक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं तो कोई सांस्कृतिक मुद्दा उन सवालों का विकल्प नहीं हो सकता। फिर भी राजनीति में नैरेटिव बदलने की कला पुरानी है। जब जनता के सवाल सत्ता से जवाब मांगते हैं, तब सत्ता अक्सर ऐसे सवाल तलाशती है जिन पर जनता आपस में बहस करने लगे।
यही वह जगह है, जहां यूसीसी की घोषणा को लेकर राजनीतिक संदेह पैदा होता है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि यूसीसी का उद्देश्य ही ध्रुवीकरण है। लेकिन यह भी भोलेपन की बात होगी कि इसके संभावित राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज कर दिया जाए। भारत की चुनावी राजनीति में धर्म, पहचान और सामाजिक कानूनों के मुद्दे कितनी तेजी से राजनीतिक लामबंदी में बदल सकते हैं, इसका अनुभव देश पहले भी कर चुका है और २०२९ की डेडलाइन इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना देती है।
क्या अगले तीन वर्षों में यूसीसी पर राज्यों में कानून बनेंगे, फिर उस पर राजनीतिक टकराव होगा, फिर विरोध और समर्थन की राजनीति तेज होगी और अंतत: २०२९ के चुनाव में इसे एक बड़े वैचारिक सवाल के रूप में पेश किया जाएगा? यह अभी एक संभावना है, निष्कर्ष नहीं। लेकिन अगर घटनाक्रम इसी दिशा में बढ़ता है तो तब सवाल उठना स्वाभाविक होगा कि २०२९ की तैयारी कानून से शुरू हुई थी या चुनावी नैरेटिव से?
इसके अलावा एनडीए के २१ राज्यों की बात भी अपने भीतर एक राजनीतिक संदेश रखती है। यूसीसी को केवल भाजपा के राज्यों तक सीमित न रखकर एनडीए के व्यापक शासन मॉडल का हिस्सा बनाने की कोशिश दिखाई दे सकती है। लेकिन यहां भी असली परीक्षा होगी कि क्या सहयोगी दल इस मुद्दे पर उतने ही सहज होंगे? क्या सभी राज्यों की सामाजिक संरचना और स्थानीय परंपराएं एक जैसी हैं? क्या आदिवासी और प्रथागत कानून को लेकर उठने वाली आपत्तियों का समाधान होगा?
यानी घोषणा आसान है, क्रियान्वयन कठिन और राजनीति में अक्सर घोषणा ही असली राजनीतिक पूंजी बन जाती है। यही कारण है कि सरकार को यूसीसी पर सिर्फ नारा नहीं, पूरा नक्शा सामने रखना चाहिए। देश को यह जानने का अधिकार है कि प्रस्तावित कानून वास्तव में क्या बदलेगा। संसद में बहस हो, राज्यों से राय ली जाए, कानून विशेषज्ञों और प्रभावित समुदायों से संवाद हो और महिलाओं के अधिकारों को केंद्र में रखकर इसकी कसौटी तय की जाए। वरना एक गंभीर संवैधानिक सुधार भी चुनावी हथियार के रूप में देखा जाने लगेगा और यही सबसे बड़ा खतरा है।
बहरहाल, भारत को समान कानून चाहिए या नहीं इस पर लोकतांत्रिक बहस हो सकती है। लेकिन भारत को ऐसे राजनीतिक खेल से सावधान रहना होगा जिसमें जनता की आर्थिक और सामाजिक परेशानियों के ऊपर पहचान की राजनीति का नया पर्दा डाल दिया जाए। लेकिन आज असली सवाल यह नहीं है कि यूसीसी आएगा या नहीं। असली सवाल यह है कि यूसीसी आने वाले तीन वर्षों में कानून बनेगा, सामाजिक सुधार बनेगा या २०२९ का चुनावी नैरेटिव? क्योंकि सत्ता के गलियारों में तारीखें कभी सिर्फ तारीखें नहीं होतीं। २०२९ की डेडलाइन इसलिए सिर्फ यूसीसी की डेडलाइन नहीं है, बल्कि यह इस बात की भी परीक्षा होगी कि सत्ता जनता के सवालों का सामना करती है या राष्ट्रीय विमर्श की दिशा बदल देती है और लोकतंत्र में सबसे असहज सवाल अक्सर यही होता है जब जनता जवाब मांग रही हो, तब सत्ता नया सवाल क्यों खड़ा कर रही है?
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)

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