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रुख-ए-सियासत : ₹२,००० का यूपीआई और ₹२ लाख करोड़ का सवाल… जेब जनता की चिंता सत्ता की!

-तौसीफ कुरैशी

भारत की अर्थव्यवस्था का हाल पूछिए तो सत्ता कहेगी सब चंगा सी। जेब में पैसे नहीं हैं तो क्या हुआ, मोबाइल में यूपीआई तो है! अभी २,००० रुपए से ऊपर हर यूपीआई भुगतान पर २५ रुपए का शुल्क तय नहीं हुआ है, लेकिन ऐसा ही होगा, यही अमेरिका के सामने गुटने टेक चुकी सरकार ने योजना बनाई है। जनता को लूटो यही गुजरात मॉडल है। १४ सितंबर २०२६ की अधिसूचना ने २,००० रुपए तक के यूपीआई भुगतान को शुल्क-मुक्त रखा है और उससे ऊपर के चुनिंदा ट्रांजेक्शन पर एमडीआर लगाने की कानूनी गुंजाइश बनाई है। आदमी उधार लेकर भी डिजिटल हो गया है और सरकार अब उस डिजिटल जेब में भी हाथ डालने की तैयारी में है। देश ने यूपीआई को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी बना लिया या बनने के लिए मजबूर किया गया ताकि बाद में लूटा जा सके। चाय से लेकर किराने तक, रिक्शे से लेकर अस्पताल तक नोट जेब से निकले बिना भुगतान हो रहा है।

लेकिन अब सरकार ने २,००० रुपए तक के यूपीआई भुगतान को शुल्क-मुक्त रखने की व्यवस्था करते हुए २,००० रुपए से ऊपर के चुनिंदा व्यापारी भुगतान पर शुल्क यानी एमडीआर लगाने का रास्ता खोल दिया है। सरकार कहती है कि उपभोक्ता से सीधे शुल्क नहीं लिया जाएगा और पी२पी भुगतान मुफ्त रहेगा। मगर सवाल यह है कि व्यापारी पर पड़ा खर्च आखिरकार जाएगा कहां?
यहीं से असली तमाशा शुरू होता है। आज सरकार कहती है यह टैक्स नहीं, एमडीआर है। ठीक है साहब, नाम बदल देने से जेब पर पड़ने वाला बोझ बदल जाता है क्या? पेट्रोल पर टैक्स हो तो टैक्स, डिजिटल भुगतान पर शुल्क हो तो एमडीआर! जनता तो बस इतना जानती है कि जिस चीज के लिए कल पैसे नहीं लगते थे, कल उसके लिए पैसे लगाए जा रहे हैं या लगाए सकते हैं। अशनीर ग्रोवर ने भी इसी सवाल को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उनका तर्क है कि यूपीआई जैसी व्यवस्था खड़ी करने के बाद अब उसके इस्तेमाल पर शुल्क लगाने की बहस क्यों हो रही है, जबकि बैंक और भुगतान कंपनियां पहले से मुनाफा कमा रही हैं। सरकार का अपना तर्क भी है। यूपीआई का संचालन महंगा है।
संसदीय समिति के अनुसार, इसकी सालाना लागत करीब २०,७०० करोड़ रुपए तक पहुंच गई है, जबकि २०२६-२७ के बजट में यूपीआई के लिए २,००० करोड़ रुपए का प्रावधान है। लेकिन सवाल यह है कि इस लागत का मॉडल कौन तय करेगा।
जिस देश में छोटे दुकानदार को हर रुपए का हिसाब देना पड़ता है, वहां डिजिटल भुगतान की लागत का बोझ भी आखिरकार बाजार के रास्ते ग्राहक तक ही पहुंचेगा। दुकानदार शुल्क देगा तो वह अपनी कीमत में जोड़ेगा। यानी सरकार कहेगी हमने आपसे पैसा नहीं लिया, बाजार कहेगा हमने मजबूरी में लिया।
वाह रे गुजरात मॉडल के अर्थशास्त्र! और ऊपर से अमेरिका का दबाव भी इस कहानी में एक अलग अध्याय है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि भारत की डिजिटल भुगतान नीतियों को पहले ही अपने व्यापारिक हितों के संदर्भ में सवालों के घेरे में रख चुका है। तो सवाल यह नहीं कि यूपीआई पर शुल्क क्यों सोचा जा रहा है। सवाल यह है कि जनता को सुविधा देने वाली व्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता जनता की जेब से ही क्यों निकले? बड़े कॉर्पोरेट को राहत देने के रास्ते खोजने वाली सरकार छोटे दुकानदार की डिजिटल रसीद पर कितनी देर तक अर्थव्यवस्था बचाएगी। जिस जनता को हिंदू -मुसलमान के झगड़े में उलझाकर यह समझाया जाता है कि देश विश्वगुरु बन रहा है, उसे समय रहते कभी अपनी जेब का हिसाब भी देख लेना चाहिए। क्योंकि महंगाई भाषण नहीं सुनती, बेरोजगारी धर्म नहीं पूछती और बैंक खाते में आया शुल्क जाति देखकर नहीं कटता। भारत की जनता की समस्या यह है कि उसे चोट लगने तक दर्द का पता नहीं चलता। जब तक बांस सिर्फ सामने खड़ा हो, तमाशा लगता है, जब वही पीछे से लगे, तब अर्थशास्त्र समझ में आता है। यूपीआई पर शुल्क की बहस शायद वही बांस लेकर आ रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बांस हिंदू-मुसलमान नहीं पूछेगा। सीधा जेब में जाएगा। हर हर…घर-घर..

.सत्यमेव जयते..!

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