मुख्यपृष्ठस्तंभगजबे है : आए थे `बाबू' बनने बन गए चपरासी!

गजबे है : आए थे `बाबू’ बनने बन गए चपरासी!

-उमा सिंह
सरकारी नौकरी मिल जाए तो जिंदगी सेट..! आप सब भी ऐसा ही सोचते हैं ना..? ऐसा ही कुछ सोचकर २०२१ में रेहान खान ने भी सरकारी नौकरी ज्वाइन की होगी। मृतक आश्रित कोटे से नौकरी मिली, पद मिला, कनिष्ठ सहायक यानी सरकारी भाषा में ‘बाबू’। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब बाबू बनने के लिए जरूरी टाइपिंग टेस्ट ने ही बाबू साहब की टाइपिंग की पोल खोल दी।
एक बार फेल हुए, फिर मौका मिला। दूसरी बार भी टाइपिंग ने साथ नहीं दिया। तीसरी बार भी की-बोर्ड पर उंगलियां दौड़ीं, लेकिन नतीजा वही, फेल, फेल और फेल..! यानी तीन मौके मिले और तीनों बार टाइपिंग टेस्ट ने साफ कह दिया कि बाबू की कुर्सी अभी दूर है। बस फिर क्या था। बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने ऐसा पैâसला सुनाया कि सरकारी नौकरी तो बची, लेकिन ‘बाबूगीरी’ चली गई। रेहान खान को कनिष्ठ सहायक के पद से डिमोट कर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यानी चपरासी बना दिया गया। अब इसे सरकारी नौकरी का कमाल कहें या टाइपिंग टेस्ट का जलवा? यहां नौकरी नहीं गई, बस कुर्सी बदल गई। कल तक फाइलों पर दस्तखत और टाइपिंग का काम करने की उम्मीद थी, अब फाइलें पहुंचाने और चाय-पानी की जिम्मेदारी आ सकती है।
सरकारी दफ्तर में शायद यही नया मंत्र है, टाइपिंग नहीं आती तो कोई बात नहीं, नौकरी रहेगी… बस पद छोटा हो जाएगा..! ई तो गजबे है रे भैया..!

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