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किस बात का जश्न है?.. रोटी-रोजी छीनने का, यूपीआई लूटने का, जमीन हथियाने का?

१७ सितंबर को पूरा मंत्रिमंडल दिया जला रहा है। प्रधानमंत्री को भगवान बनाने की होड़ लगी है। सेवा पखवाड़ा, पोस्टर, केक, फूल सब है। सवाल एक ही है जश्न किस बात का?
रोटी-रोजी छीनने का जश्न?
मनरेगा पर कानून १ जुलाई २०२६ से लागू। नाम बदल दिया, गांधी हटाया, १२५ दिन का वादा किया। केंद्र की १५ सितंबर की अपनी रिपोर्ट कहती है कि बंगाल में ८५ प्रतिशत ग्राम पंचायतों में दो महीने में एक रुपया खर्च नहीं हुआ। मंत्रालय खुद मान रहा है। एक महीने में सिर्फ ९.६९ करोड़ श्रम-दिवस और पुरानी मनरेगा की मजदूरी आज भी अटकी है। गांव में कुदाल नहीं चली, दिल्ली में दिया जल रहा है।
यूपीआई लूट का जश्न?
१५ अक्टूबर से २,००० रुपये से ऊपर यूपीआई पर ०.४ प्रतिशत एमडीआर। सरकार कहती है, ग्राहक पर नहीं। पुणे मार्केट यार्ड, देहरादून, जयपुर, दिल्ली के खान मार्केट के व्यापारी कह रहे हैं ‘हमें ‘कैश ओनली’ बोर्ड लगाना पड़ेगा।’ भारत उद्योग व्यापार मंडल का दावा ५ करोड़ छोटे दुकानदार बर्बाद होंगे। राजस्थान पेट्रोलियम डीलर अदालत जा रहे हैं। दुकानदार देगा तो दाम में जोड़ेगा, जेब किसकी कटेगी? उसी मध्यमवर्ग की। राहुल गांधी ने इसे ‘मोदी टैक्स’ कहा तो सरकार ने कहा, ‘रोलबैक का सवाल ही नहीं।’ लूट पक्की, जश्न जारी।
गरीबों की जमीन हथियाने का जश्न?
गुजरात के मोरबी में १ जून से किसान भूख हड़ताल पर हैं। अदानी एनर्जी सॉल्यूशंस की कंपनी हलवद ट्रांसमिशन लिमिटेड खेत के बीच में हाई-टेंशन टावर गाड़ रही है। किसान कह रहे हैं जमीन बंजर हो रही है, ४ गुना मुआवजा दो। १८ दिन तक अनशन चला, गांव-गांव में ‘अदानी के खिलाफ’ चौपाल लगी। सरकार ने माना सर्कल रेट नहीं, बाजार भाव से दोगुना देंगे। पर किसान पूछता है जब जमीन ही नहीं बचेगी तो मुआवजे का क्या? यही तो आरोप है ‘देश बेचा, जमीन छीनी।’
जीएसटी से गर्दन काटने और इंस्पेक्टर राज थोपने का जश्न?
२०१७ में कहा था कि जीएसटी से इंस्पेक्टर राज खत्म होगा। २०२६ में ट्रिब्यून लिख रहा है जीएसटी संग्रह २०२६-२७ में ३ प्रतिशत गिरेगा, जबकि आयकर बढ़ने का दावा है। मतलब सरकार के आंकड़े ही एक-दूसरे को झूठा बता रहे हैं। व्यापारी कहता है ‘प्रक्रिया ही सजा है।’ दिल्ली के नेहरू प्लेस का व्यापारी कहता है पहले यूपीआई पर धकेला, अब उसी पर शुल्क। जीएसटी, फिर यूपीआई, फिर आयकर तीनों तरफ से गला घोंटा।
जनता की आंखों में धूल झोंकने का जश्न?
देशभर मतदाता सूची से गायब। सर्वोच्च न्यायालय को मामला प्राथमिकता पर सुनना पड़ा। रेलवे में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने पाया ५१२ में से ४९१ स्टेशनों पर जैव-शौचालय विफल, ९६ प्रतिशत पर पानी-शौचालय नहीं। लोक लेखा समिति ने लताड़ा। वोट गायब, शौचालय गायब, रोजगार गायब पर दिया जल रहा है। पीएम के मित्र की जमीन तक हड़प डाली, इथेनाल डालकर गाड़ियां खराब कर डाली, सड़कों को गड्ढों में तब्दील कर दिया, सोना-चांदी आम आदमी की पहुंच से बाहर कर दिया, पेट्रोल डीजल में आग लगा दी, फिर कि बात का जश्न?
पूरी सरकार लगी है एक आदमी को भगवान बनाने में। मंत्रिमंडल दिया जला रहा है। जनता पूछ रही है किस बात का जश्न मना रहे हो? रोटी छीनने का, रोजी छीनने का, यूपीआई लूटने का, जमीन हथियाने का, जीएसटी से गर्दन काटने का, अदानी को देश बेचने का?
दियों में तेल फूंकने से अच्छे दिन नहीं आते। अच्छे दिन आते हैं जब पंचायत में काम चले, दुकानदार पर लूट न हो, किसान की जमीन न छिने।
१७ सितंबर। देश के प्रधानमंत्री का जन्मदिन। खबर आनी चाहिए थी कि गरीब को क्या मिला, किसान को क्या मिला। खबर आई कि दिये जल रहे हैं, केक कट रहा है, सेवा पखवाड़े के नाम पर सरकारी पोस्टर लग रहे हैं। सवाल सीधा है दियों में तेल फूंकने से क्या गरीब की रसोई में तेल आएगा?
एनडीटीवी पर एक लेख आया था ‘सुधार के साथ निरंतरता’। लिखा था, मोदी ने तोड़ा नहीं, सुधारा है। लेखक कौन? सरकार के ही सलाहकार। खुद ही लिखते हैं- ‘व्यक्तिगत विचार’। यानी अपनी ही पीठ थपथपाना। निरंतरता है तो किसकी? महंगाई की निरंतरता, बेरोजगारी की निरंतरता, भुगतान में देरी की निरंतरता। सुधार किसका? नाम बदलने का सुधार, पोस्टर बदलने का सुधार, दिये जलाने का सुधार। इसीलिए जनता कहती है तमाशेबाजी रास नहीं आई। दिया जलाने से उजाला तब होता है, जब घर में खाने को हो। तेल फूंकने से फोटो खिंचती है, पेट नहीं भरता।

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