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संपादकीय :  वैश्विक ‘हफ्ताखोरी’ का षड्यंत्र!

प्रधानमंत्री मोदी बार-बार देश विरोधी निर्णय लेते हैं, अमेरिका जैसे देशों के सामने दंडवत करते हैं, अमेरिका की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए भारत के मध्यमवर्गीय लोगों की जेब काटते हैं, यह अब छिपा नहीं है। ‘यूपीआई’ (unified payments interface) जैसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था के कारण भारतीय जनता में नाराजगी का ‘धमाका’ हो गया है। ‘यूपीआई’ का इस्तेमाल करनेवालों पर दो हजार रुपए से अधिक के लेन-देन पर शुल्क लगाया गया है। भारतीय नागरिकों के पैसों के लेन-देन के लिए आवश्यक डिजिटल बुनियादी ढांचे पर अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण है और भारत के आर्थिक लेन-देन से होनेवाला लाभ सौ प्रतिशत अमेरिका को मिलनेवाला है। एक तरफ रूस या ईरान से ‘तेल’ खरीदने को लेकर अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाए, सौ प्रतिशत टैरिफ शुल्क लगाए और उसी अमेरिका को ‘यूपीआई’ के माध्यम से ‘हफ्ता’ भी देना पड़े, यह किस तरह की व्यवस्था है? अमेरिकी कंपनियों को दिए जानेवाला हफ्ता हिंदुत्व के कार्य के लिए दिया गया दान है और उस महान कार्य के स्वागत के रूप में प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर देशभर में दीप जलाकर जबरदस्ती आशीर्वाद लेने का सरकारी कार्यक्रम आयोजित किया गया। मोदी का प्रधानमंत्री पद भारत की राष्ट्रनीति के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका जैसे देशों के आर्थिक उद्धार के लिए है, यह ‘यूपीआई’ मामले से स्पष्ट दिखाई देता है। इस पर न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग बोलते हैं और न ही अंधभक्तों के ‘मम्मी-पप्पा’ मुंह खोलते हैं। यूपीआई के लेन-देन पर ‘०.४ प्रतिशत’ शुल्क लगाने का निर्णय अमेरिकी ‘फिनटेक’ कंपनियों की खुशामद करने के लिए ही लिया गया है और इन कंपनियों में भारतीय नेताओं तथा उनके बेटे-बेटियों को रोज कितने ‘हजार करोड़ रुपए’ की दलाली मिलनेवाली है, इसकी जांच करनी होगी। यानी अमेरिका को मिलने वाले हफ्ताखोरी में
भारतीय दलालों की हिस्सेदारी
होनी ही चाहिए। यही देश सेवा का नया स्वरूप है! इसके लिए देश की सामान्य जनता और छोटे व्यापारियों की बलि दी गई है। मोदी स्वयं को १४० करोड़ जनता का प्रधान सेवक कहते हैं। लेकिन उसी जनता पर वे कभी नोटबंदी, कभी जीएसटी, कभी कर वृद्धि का तो कभी महंगाई का बुलडोजर चलाते हैं। फिर वे पक्के व्यापारी भी हैं, इसलिए पहले जनता की भावनाओं को छूते हैं और उसके बाद उसी की जेब पर डाका डालते हैं! यूपीआई पर शुल्क वृद्धि को लेकर सरकार का वही पुराना खेल नए सिरे से शुरू हो गया है। सरकार यह कहकर बहका रही है कि यह कर नहीं, बल्कि ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (एमडीआर) है। यह शुल्क ग्राहक पर नहीं, बल्कि व्यापारियों पर लगेगा। ग्राहकों के लिए यूपीआई का इस्तेमाल पहले की तरह ही मुफ्त रहेगा। लेकिन क्या आप जनता को मूर्ख समझते हैं? कारोबार करनेवाला कोई भी व्यापारी अपनी जेब पर बोझ नहीं पड़ने देता। वह उसकी वसूली ग्राहक से ही करता है। सरकार द्वारा लगाए गए कर हों या जीएसटी, अंतत: उनकी वसूली ग्राहक से ही की जाती है। पेट्रोल-डीजल पर लगाए जानेवाले उत्पाद शुल्क को लेकर सरकार बड़े गर्व से कहती है कि यह शुल्क तेल कंपनियों पर लगाया जाता है। लेकिन तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाकर यह बोझ आम जनता से ही वसूलती हैं। अब यूपीआई लेन-देन पर लगाए जानेवाले एमडीआर के मामले में भी यही होनेवाला है। यह शुल्क आम जनता की जेब पर डाका साबित होगा। २०१४ से इस देश में अलग-अलग माध्यमों से जनता को लूटा जा रहा है। यह लूट अब बेहद लोकप्रिय और लोगों की आदत बन चुके यूपीआई लेन-देन तक पहुंच गई है। एक तरफ यूपीआई की अपार सफलता का श्रेय लेना है, उसका ढोल पीटना है और मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को किस तरह ‘कैशलेस’ और ‘डिजिटल’ बनाया, इसका प्रचार भी करना है।
यूपीआई का बोलबाला
भारत के बाहर सिंगापुर, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका आदि देशों में वैâसे हो रहा है, इसकी आरतियां उतारनी हैं और दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियों के सामने झुककर ‘एमडीआर’ के नाम पर भारतीयों को लूटना है। पहले ही महंगाई ने आम लोगों का बजट बिगाड़ दिया है। उसमें यूपीआई लेन-देन पर शुल्क लगाकर यह सरकार जनता की जेब में बचा-खुचा पैसा भी निकाल लेने वाली है। सरकार भले ही इस शुल्क को मामूली बता रही हो, लेकिन इससे सालाना सरकारी खजाने में हजारों करोड़ रुपए की लूट जमा होगी। यह शुल्क वीजा और मास्टरकार्ड जैसी दो अमेरिकी वैश्विक एकाधिकार वाली वित्तीय कंपनियों को खुश करने के लिए ही लगाया गया है, यह एक ‘नंगा’ सच है। राष्ट्रपति ट्रंप आंखें दिखाते हैं और प्रधानमंत्री मोदी उनके सामने दंडवत करने लगते है, यही सिलसिला चल रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप के इशारा करते ही मोदी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को आनन-फानन में समेट लिया और पाकिस्तान पर निर्णायक प्रहार करने का अवसर गवां दिया। ट्रंप की धमकी के बाद मोदी सरकार ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। रूस से भारत को तेल खरीदना है या नहीं, यह भी अमेरिका ही तय करता है। अब इसी मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन भारत पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने का दबाव बना रहा है। अमेरिकी कृषि उत्पाद, डेयरी उत्पाद और अन्य वस्तुएं भारतीयों के सिर थोपने वाला व्यापार समझौता करने के लिए ट्रंप दबाव बढ़ा रहे हैं।
ब्रिक्स सम्मेलन का हवाला देकर ‘विश्वगुरु’ मोदी ने अमेरिका को कैसे धोबी पछाड़ दी, इसकी आरतियां भक्त मंडली उतार रही है। लेकिन सम्मेलन के चार दिन बाद ही मोदी ने यूपीआई लेन-देन पर शुल्क वृद्धि लाद दी और राष्ट्रपति ट्रंप के सामने एक बार फिर शरणागत हो गए। खोखली ‘विश्वगुरु’ की छवि बनाए रखने और एपस्टीन के रहस्यों को दबाए रखने के लिए मोदी सरकार अमेरिका को ‘हफ्ता’ दे रही है। यह मामला बेहद गंभीर है।

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