यूपी से सटे नेपाल बॉर्डर पर इंसानियत को शर्मसार करने वाला एक नया ट्रेंड सामने आया है। एक अखबार के स्टिंग ऑपरेशन के मुताबिक, नि:संतान दंपतियों को गोरा और स्वस्थ बच्चा दिलाने के नाम पर नेपाली युवतियों की सरेआम खरीद-फरोख्त हो रही है।
खुलासे के अनुसार, दलालों का संगठित नेटवर्क नेपाल के गरीब परिवारों की लड़कियों को भारत ला रहा है। जरूरतमंद दंपति के रिश्तेदार बनकर जब रिपोर्टर इस गिरोह तक पहुंचे, तो सौदे की परतें खुलीं। बताया जा रहा है कि इसके एवज में दलालों को लाखों-करोड़ों रुपए तक दिए जा रहे हैं, जिसमें से एक छोटा हिस्सा पीड़ित लड़की को दिया जाता है। उसे भारत में एक साल से अधिक समय तक रखा जाता है और फिर बच्चा होने के बाद वापस भेज दिया जाता है। इस अवैध धंधे के पीछे दलील दी जा रही है कि आईवीएफ में खर्च अधिक है, केस बिगड़ने का डर है और बच्चा कमजोर होने की आशंका रहती है। खासकर, ऐसे मामलों में जहां महिला गर्भधारण में सक्षम नहीं है, दंपति इस शॉर्टकट को अपना रहे हैं। गोरे रंग की चाहत भी इस रैकेट को हवा दे रही है।
कानूनी और नैतिक सवाल
यह पूरा सौदा भारतीय कानून में सीधे तौर पर अपराध है। भारत का सरोगेसी विनियमन अधिनियम, २०२१ कमर्शियल सरोगेसी पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाता है। केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति है, वह भी करीबी रिश्तेदार से। यह मानव तस्करी और यौन शोषण है। किसी महिला को बच्चे पैदा करने के लिए खरीदना, रखना और फिर भेज देना आईपीसी, मानव तस्करी विरोधी कानूनों और नेपाल के कानूनों के तहत गंभीर अपराध है। बच्चे का भविष्य अंधकारमय है। न उसकी कानूनी पहचान है, न मां का अधिकार, न नागरिकता स्पष्ट है। यह ट्रेंड बताता है कि संतान की चाहत वैâसे बाजार में बदल गई है, जहां गरीब नेपाली लड़की का गर्भ किराए की कोख बन गया है। यह केवल दलालों का अपराध नहीं, बल्कि समाज की गहरी सोच-गोरा बच्चा, स्वस्थ बच्चा, अपना खून-की विकृति भी है। यूपी पुलिस, एसएसबी और नेपाल पुलिस को इस बॉर्डर रैकेट पर संयुक्त कार्रवाई करनी होगी। अखबार का खुलासा जांच एजेंसियों के लिए अलार्म है।
