विजयशंकर चतुर्वेदी
राहुल गांधी तीन हफ्तों के लिए देश से गैरहाजिर रहे, और भाजपा के प्रवक्ता फिर से हाजिरी रजिस्टर लेकर बैठ गए। अब राहुल को पंजाब कांग्रेस में मची कलह, यूपी में सपा के साथ खींचतान और गोवा में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर उठे द्वंद्व से तुरंत निपटना है। लेकिन कांग्रेस को इसलिए ज्यादा असहज होना चाहिए कि राहुल की विदेश यात्रा के चक्कर में पेपर लीक के खिलाफ जारी छात्रों की मुहिम से जुड़े प्रयागराज, पटना और दिल्ली के कांग्रेसी कार्यक्रम टल गए। जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन अनशन को तुड़वाने का काम भी अधूरा रह गया। ऐसे में सवाल है कि क्या सही समय पर विपक्ष के नेता का मैदान में मौजूद रहना जरूरी है या विदेश यात्रा?
राहुल की यात्रा ही रहस्य क्यों?
वैसे राहुल गांधी भूमिगत नहीं हुए थे। वह कहां गए थे, यह पता लगाना मोदी सरकार के लिए कौन-सी पहेली है? भाजपा का हर बार यह पूछना कि वे कहां जाते हैं और किससे मिलते हैं। दरअसल, देश की चिंता कम और संदेह पैदा करने की राजनीति अधिक लगता है।
प्रधानमंत्री मोदी का एक पैर विदेश में ही रहता है। उनके मंत्री, अधिकारी और सांसद भी दुनियाभर में उड़ते फिरते हैं। मगर जनता को शायद ही कभी पता चलता है कि कौन मंत्री किसके पैसे से, किस देश में क्यों गया है। लेकिन भाजपा राहुल की यात्रा को देवकीनंदन खत्री का तिलिस्मी उपन्यास ‘चंद्रकांता संतति’ बना देती है। संबित पात्रा ने तो इस बार और गहरा तड़का लगाया- बंद कमरे, संदिग्ध मुलाकातें और भारत के खिलाफ कथित साजिश। यक्कु!
भाजपा ने राहुल की ‘पार्ट टाइम नेता’ और ‘पप्पू’ वाली छवि बनाने में भारी राजनीतिक ऊर्जा, समय और करदाताओं का अकूत पैसा ख़र्च किया है। लेकिन राहुल की कन्याकुमारी से कश्मीर तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और फिर ६,७०० किलोमीटर से अधिक की भारत जोड़ो ‘न्याय यात्रा’ ने भाजपा की पूरी ‘मेहनत’ पर पानी फेर दिया।
मगर भाजपा का शोर कोई ढाल नहीं
यहां भाजपा की अतिरंजना राहुल गांधी की राजनीतिक चूक का बचाव नहीं हो सकती। कांग्रेस ने बेरोजगारी और परीक्षाओं की गड़बड़ियों पर छात्रों के बीच कोटा में १७ जून को पहला बड़ा कार्यक्रम किया। फिर राहुल की विदेश यात्रा का कार्यक्रम बन गया। यहीं भाजपा को तथ्य का एक छोटा-सा सिरा मिलता है और उसका विराट प्रचारतंत्र उससे पूरी रस्सी बुन देता है।
भारतीय राजनीति में ‘टेम्पो’ बनाए रखना खाने का काम नहीं है। राहुल की छवि बदली ही इसलिए थी कि लोग उन्हें बिना सूट-बूट के सड़क पर चलते, धूप, बर्फबारी और तूफानी बारिश झेलते पहली बार देख रहे थे। इसलिए जब वह अचानक दृश्य से हट जाते हैं तो भाजपा को अपना वही पुराना पोस्टर फिर चिपकाने का मौका मिल जाता है।
वांगचुक के पास विपक्ष!
सोनम वांगचुक का चिंताजनक अनशन पखवाड़ा पार कर चुका है। शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने मौके की नजाकत को समझते हुए उनके समर्थन की बात कही और कांग्रेस से भी आगे आने की अपील की। अगर राहुल गांधी वहां पहुंच जाते तो क्या होता? सरकार गिर जाती? लेकिन राजनीति केवल सरकार गिराने का नाम नहीं है। देश को यह संदेश जाता कि गांधीवादी तरीके से अपनी बात कहनेवाले के पास विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा खड़ा है। राजनीति में प्रतीकों की ताकत कौन नहीं जानता? राहुल खुद मोहब्बत की दुकान व अहिंसक राजनीति की बात करते हैं और यदि राहुल का विदेश जाना अपरिहार्य था तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे अनशन स्थल पर जा सकते थे। प्रियंका गांधी जा सकती थीं। अखिलेश यादव या गठबंधन का कोई वरिष्ठ नेता पहुंच सकता था। मगर ऐन वक्त पर विपक्ष गायब है।
विकल्प बनने की कीमत
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति चौबीस घंटे चलती है। उनके पास सत्ता, संगठन, संसाधन और आक्रामक प्रचारतंत्र की शक्ति है। खाली जगह छोड़कर उनसे मुकाबला नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी ने देश के एक बड़े हिस्से में राजनीतिक बदलाव की उम्मीद पैदा की है। इसलिए उन्हें राष्ट्रीय विकल्प की तरह व्यवहार भी करना होगा।
माना कि राहुल गांधी की हर विदेश यात्रा में साजिश खोजना भाजपा की राजनीति है। लेकिन कांग्रेस यदि अपने ही बनाए आंदोलन का ताप बार-बार ठंडा होने देगी तो केवल भाजपा को दोष देकर नहीं बचा जा सकता। समझदार विपक्ष खुद सत्ता के हाथ में हथियार नहीं सौंपता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
