शीतल अवस्थी
नवरात्रि में हम जितनी पवित्रता बरतते हैं देवी उतनी ही प्रसन्न होती हैं। कई घरों में बड़े ही नियम से पूजा-पाठ होता है। कुछ लोग बहुत कठोर नियम करते हैं। इन परंपराओं में ही तो हमारे संस्कार बसे हैं। नवरात्रि के नौ दिनों तक संकल्प लेकर यह कार्य अवश्य करें:- नंगे पैर रहना, नौ दिनों तक व्रत रखना, प्रतिदिन मंदिर जाना, देवी को जल अर्पित करना, कन्या भोजन कराना, बिना लहसुन-प्याज का भोजन बनना, जवारे रखना, नौ दिनों तक देवी का विशेष श्रृंगार करना, अष्टमी-नवमीं पर विशेष पूजा, अखंड ज्योति जलाना, आदि…. ।
दुर्गा सप्तसती में है मां की असीम अनुकंपा
भगवान श्रीराम ने भी आदि शक्ति जगदंबा की आराधना नवरात्रि के विशेष पर्व में कर भगवती की अद्वितीय कृपा प्राप्त कर अत्याचारी रावण का वध किया था। मां ‘दुर्गा’ की पूजा व साधना नवरात्रि में अनेक विद्वानों एवं साधकों ने बताई है। किन्तु सबसे प्रामाणिक व श्रेष्ठ आधार ‘दुर्गा सप्तशती’ है। जिसमें सात सौ श्लोकों के द्वारा भगवती दुर्गा की अर्चना व वंदना की गई है। नवरात्रि में श्रद्धा एवं विश्वास के साथ दुर्गा सप्तशती के श्लोकों द्वारा मां-दुर्गा देवी की पूजा नियमित शुद्वता व पवित्रता से की जाए तो निश्चित रूप से मां प्रसन्न हो इष्ट फल प्रदान करती हैं। समयाभाव व व्यस्तता को ध्यान में रख दुर्गा-सप्तशती के कुछ सूक्ष्म पाठों को कम समय में कर अभीष्ट फल को प्राप्त किया जा सकता है। दुर्गा सप्तशती में कम समय में इच्छित फल पाने हेतु सात सौ श्लोकों के स्थान पर ‘सप्तश्लोकी दुर्गा’ पाठ का विधान है जिसे अत्यंत कम समय में करके भी मनवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। इसी तरह दुर्गा कवच, अर्गला, कीलक, रात्रिसूक्त, देवी सूक्त, अपराध क्षमा-प्रार्थना, अपराध क्षमा-स्त्रोत ऐसे हैं। जिन्हें किसी भी स्थान, देशकाल व परिस्थिति में करके भी मनोवांछित फल अधिक शीघ्रता से प्राप्त किया जा सकता है। अतः नवरात्रि में भगवती जगदम्बा जो विश्व की प्राण आत्मा व रक्षा शक्ति हैं, उनकी स्थापना एवं पूजा विधि-विधान के साथ प्रत्येक व्यक्ति को करनी चाहिए। इस पूजा में पवित्रता, नियम व संयम तथा ब्रह्मचर्य का विशिष्ट महत्व है। इस पूजा के समय घर व देवालय को तोरण व विविध प्रकार के मांगलिक पत्र, पुष्पों से सजा सुन्दर सर्वतोभद्र मण्डल, स्वास्तिक, नवग्रहादि, ओंकार आदि की स्थापना विधवत शास्त्रोक्त विधि से करने या कराने तथा स्थापित समस्त देवी-देवताओं का आवाह्न उनके ‘नाम मंत्रो’ द्वारा कर षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए जो विशेष फलदायिनी है।
मां दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है। मां चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं। मां चंद्रघंटा तीन नेत्रों तथा दस हाथोंवाली हैं। इनके दस हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं। यह साधकों को चिरायु, स्वास्थ्य और सुखी-संपन्न होने का आशीर्वाद देती हैं। मां का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।
मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सद्यः फलदायी है। मां भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है। मां का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। मां चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहां भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं। मां के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया असाधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भांति करते रहते हैं। हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि-विधान के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके मां चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर हों। उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं। हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में तृतीय दिन इसका जाप करना चाहिए।
या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे मां! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अंबे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे मां, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।
इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएं। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।
उपासना मंत्र-
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रवैâर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्दघण्टेति विश्रुता।।
महत्वपूर्ण रंग- श्वेत
नैवेद्य-दूध
