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संपादकीय : State Capture

विपक्ष अगर भ्रष्टाचार और लूटपाट पर आलोचना करे, तो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ‘छाती पीटने’ का कार्यक्रम शुरू कर देते हैं कि महाराष्ट्र की बदनामी हो रही है। यह उनका शालीन पाखंड है। श्रीमान फडणवीस के कहने का लुब्ब-ए-लुबाब यह है कि सरकार की चोरी भले ही सबूतों के साथ पकड़ी जाए, फिर भी किसी को मुंह नहीं खोलना चाहिए। लेकिन इस सरकार की ‘लाडली बहन’ योजना कितनी भ्रष्ट और जनता के पैसे को लूटनेवाली थी, इसका भंडाफोड़ ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने किया है। वैसे, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार द्वारा उज्जैन तीर्थक्षेत्र के महाकाल मंदिर परिसर में किए गए हजारों करोड़ रुपए के जमीन घोटाले का पर्दाफाश भी ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने ही किया था, फिर भी मोहन यादव मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कायम हैं। इसलिए महाराष्ट्र की ‘लाडली बहन’ योजना का घोटाला उजागर होने के बाद भी किसका क्या बिगड़ने वाला है? यह एक बड़ा सवाल है। विधानसभा चुनाव से पहले इन लोगों ने हर महीने १,५०० रुपए गिनकर ‘महिला’ओं के वोट खरीदने के लिए ‘लाडली बहन’ योजना शुरू की थी। २.४३ करोड़ रुपए महिला लाभार्थियों को १४ हजार करोड़ रुपए का सरकारी फंड बांटा गया। इसका फायदा फडणवीस-मिंधे सरकार को चुनाव में मिला और ये लोग सत्ता में आ गए। अब जब ‘वैâग’ ने ऑडिट किया, तो यह साफ हो गया कि ९२ लाख लाभार्थी फर्जी और बोगस थे। इनमें से ६२ लाख लाभार्थियों ने तो ‘ई-केवाईसी’ तक पूरी नहीं की थी। यानी सीधे-सीधे तौर पर लगभग ३,५४१ करोड़ रुपए अवैध रूप से गलत लाभार्थियों में बांट दिए गए। यह सरासर धांधली है, सरकारी पैसे का गबन है। चौंकानेवाली बात तो यह है कि २९ हजार पुरुषों और ८ हजार सरकारी कर्मचारियों ने भी इस ‘लाडली’ योजना में अपने हाथ धो लिए। अब भले ही सरकार ने योजना के नियमों में न बैठनेवाले ९२ लाख लाभार्थियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया हो, लेकिन चुनाव का फायदा उठाने के लिए सरकार ने इन ९२ लाख लोगों को ३,५४१ करोड़ रुपए बांटे, बदले में उनके वोट लिए और जैसे ही ‘वैâग’ ने इस आर्थिक अनुशासनहीनता पर कोड़े बरसाए, वैसे ही इन ९२ लाख लोगों को अपात्र घोषित कर बाहर कर दिया। चुनाव जीतने के लिए फडणवीस-मिंधे ने इस भ्रष्ट रास्ते का इस्तेमाल किया। आचार संहिता लागू होने से पहले इन सभी के खातों में पैसे ट्रांसफर कर दिए गए और अब मामला
गले पड़ता देख ‘हाथ’ खड़े
कर दिए। सरकारी खजाने के ३,५४१ करोड़ रुपए पर खुलेआम डाका डाला गया। यह जनता के टैक्स का पैसा है। इसलिए, यह रकम सरकारी खजाने में वापस लौटनी ही चाहिए। ९२ लाख फर्जी लाभार्थियों से यह रकम वसूल करना अब नामुमकिन सा दिखता है इसीलिए सरकारी खजाने पर पड़े इस डाके को हमें खुली आंखों से बर्दाश्त करना पड़ेगा। हमारी तो साफ मांग है कि तत्कालीन मुख्य सचिव, वित्त सचिव, महिला एवं बाल कल्याण विभाग के सचिव और अपात्र लाभार्थियों तक पैसा पहुंचने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के साथ-साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और पूरे मंत्रिमंडल से यह रकम वसूल की जानी चाहिए। इन सभी की चल-अचल संपत्ति को ‘कुर्क’ कर, उसे नीलामी में बेचकर सरकारी खजाने की इस लूट की भरपाई की जानी चाहिए। सरकार अब केवल फर्जी लाभार्थियों के नाम हटाकर अपनी जिम्मेदारी खत्म हुई, ऐसा न समझे। सरकारी खजाना जनता की जेब काटकर भरा जाता है। यह तिजोरी किसी राजनीतिक दल की निजी जागीर नहीं है। इसमें जमा एक-एक पाई जनता के टैक्स के पैसे से आई है। ऐसी धोखाधड़ी से जनकल्याणकारी योजनाओं पर से जनता का विश्वास डगमगा जाएगा। किसानों की कर्जमाफी के लिए तारीख पर तारीख पड़ रही है। बेरोजगारों के लिए उद्योग नहीं हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा की योजनाओं के लिए पैसा नहीं है, लेकिन ९२ लाख फर्जी लाभार्थियों को ३,५४१ करोड़ रुपए बांट दिए गए। बैंकों का कर्ज न चुकाने के कारण विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोक्सी और ललित मोदी जैसों को देश छोड़कर भागना पड़ा। किसान अगर कर्ज की किस्त न चुकाए तो उसके घर की कुर्की हो जाती है। बिजली का बिल बकाया हो तो खेत का बिजली कनेक्शन काट दिया जाता है, क्योंकि इसे सरकारी पैसे का गबन माना जाता है। लेकिन ३,५४१ करोड़ रुपए की हेराफेरी करनेवाली सरकार आज भी सत्ता का सुख भोग रही है। ‘वैâग’ द्वारा इस आर्थिक घपले पर सख्त टिप्पणी करने के बावजूद, ‘वैâग’ को कोई अहमियत न देने का सरकार का यह रवैया बेहद चौंकानेवाला है। मनमोहन सरकार के समय जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (वैâग) विनोद राय ने उंगली उठाई थी, तब विपक्ष में बैठी भाजपा ने आसमान सिर पर उठा लिया था। संसद सिर पर उठा लिया था। भ्रष्टाचार और घपले के नाम पर खूब स्यापा मचाया था। आज उसी ‘कैग’ ने जब महाराष्ट्र की हजारों करोड़ रुपए की
आर्थिक बदइंतजामी को चौराहे पर
लाकर खड़ा कर दिया है, तब भी सरकार मौज उड़ा रही है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने भी महाराष्ट्र की गिरती अर्थव्यवस्था की तरफ इशारा किया है। महाराष्ट्र की प्रति व्यक्ति आय अन्य राज्यों की तुलना में घट गई है। लेकिन हमारे शासकों को यह चिंता का विषय नहीं लगता। महाराष्ट्र पर राज करनेवाले लोग लुटेरे हैं, यह इसी का लक्षण कहा जाएगा। महाराष्ट्र के पास न तो पूर्णकालिक वित्त मंत्री है और न ही पूर्णकालिक गृह मंत्री, जिसका खामियाजा जनता भुगत रही है। अर्थशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है और इस विज्ञान के कुछ नियम होते हैं। इंसान का जीवन स्तर इसी शास्त्र से जुड़ा है। अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च करनेवाला मुखिया आखिरकार भीख मांगने के कगार पर आ जाता है। यही बात देश और राज्य के संदर्भ में भी सच साबित हो रही है। महाराष्ट्र पर साढ़े चार लाख करोड़ रुपए का कर्ज है और स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि भविष्य में महाराष्ट्र को कोई कर्ज नहीं देगा। सरकारी खजाने के ३,५४१ करोड़ रुपए अवैध रूप से उड़ा देना अर्थशास्त्र नहीं है। पांच हजार करोड़ रुपए के ‘मिसिंग लिंक’ प्रोजेक्ट की लागत को ७,५०० करोड़ रुपए तक ले जाना और बीच के ढाई हजार करोड़ रुपए अपनी जेब में ठूंस लेना, यह तो एक बड़ा आर्थिक अपराध है। महाराष्ट्र का अर्थशास्त्र आज पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। लाडली बहन योजना में सरकारी खजाने के ३,५४१ करोड़ रुपए खुद सत्ताधीशों द्वारा अवैध रूप से लूट लिए जाने के कारण आज किसान, छात्र, विधवा, असहाय महिलाएं, दिव्यांग और आपदा पीड़ित सरकारी मदद से वंचित रह गए हैं। राज्य को लूटने का यह तरीका आम भ्रष्टाचार से बिल्कुल अलग है। पूर्वी यूरोप के सोवियत संघ के विघटन के बाद राजनीतिक नेताओं और उद्योगपतियों की सांठगांठ से खुद सरकारी संस्थाओं को ही खरीद लेने का खेल शुरू हुआ था। नीतियां सिर्फ अपने फायदे के लिए बदली गर्इं। इसे हासिल करने के लिए शासक वर्ग द्वारा न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया जाता है। कानून, नीतियां, सरकारी नियुक्तियां, निविदाएं सब कुछ खुद के फायदे के लिए तय किया जाता है। सरकारी खजाने से ३,५४१ करोड़ रुपए खर्च करके ३०-३५ लाख वोट खरीदना, यह सीधे तौर पर ‘स्टेट कैप्चर’ (एूaूा ण्aज्ूल्rा) यानी पूरे राज्य को ही खरीद लेने जैसा मामला है। ऐसा करनेवाले अपराधियों की निजी संपत्ति को सबसे पहले जब्त किया जाना चाहिए और उन पर मुकदमे दर्ज होने चाहिए। लेकिन क्या आज की अदालतों में इतनी हिम्मत बची है?

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