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नैनी के साये में पलता बचपन: सुधांशु पांडे और प्रेमानंद महाराज की चेतावनी

हिमांशु राज

तेज़ रफ्तार शहरी जीवन और व्यस्त दिनचर्या के बीच आधुनिक पालन-पोषण का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। माता-पिता कामकाज, ट्रैफिक और रोज़मर्रा की भागदौड़ में इतने उलझ गए हैं कि बच्चों के साथ बिताया जाने वाला समय लगातार घटता जा रहा है। नतीजतन, बच्चों का अधिकतर समय अब आया या देखभाल करने वालों के साथ बीतने लगा है, जिससे उनका भावनात्मक जुड़ाव माता-पिता की बजाय दूसरों से होने लगा है।हाल ही में सोशल मीडिया पर यह विषय उस समय चर्चा में आया, जब प्रेमानंद महाराज ने एक प्रवचन में माता-पिता को चेतावनी देते हुए कहा कि “आज के बच्चे अपनी आया की गोद में सुकून ढूंढते हैं, माता-पिता की गोद में नहीं।” उन्होंने इसे आधुनिक जीवनशैली की सबसे बड़ी त्रासदी बताते हुए कहा कि भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में माता-पिता अपने बच्चों से भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं।इसी विषय पर अभिनेता सुधांशु पांडे ने भी अपने विचार साझा करते हुए प्रेमानंद महाराज की बात से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि महानगरों में बच्चों को आया या नैनी के साथ अत्यधिक समय बिताते देखना अब सामान्य हो गया है। “जब बच्चे डरते हैं या अस्वस्थ महसूस करते हैं, तो वे अपनी आया की बाहों में भागते हैं, जबकि यह सुकून उन्हें अपने माता-पिता की गोद में मिलना चाहिए,” उन्होंने कहा। सुधांशु ने इसे एक “तनावपूर्ण और पीड़ादायक दृश्य” बताया।सुधांशु ने यह भी चेतावनी दी कि जब बच्चों को परिवार में अपनापन और संवाद नहीं मिलता, तो वे बाहरी दुनिया में मान्यता और स्नेह तलाशने लगते हैं। यह प्रवृत्ति आगे चलकर मानसिक असंतुलन और आत्मविश्वास में कमी का कारण बन सकती है।महाराज और अभिनेता दोनों का संदेश एक ही दिशा में इशारा करता है—बचपन को भौतिक सुखों में नहीं, माता-पिता के स्नेह और उपस्थिति में सुरक्षित रखना ही सच्ची परवरिश है।

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