मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : एफआईआर में नाम नहीं तो इस्तीफा क्यों?

दिल्ली लाइव : एफआईआर में नाम नहीं तो इस्तीफा क्यों?

अरुण कुमार गुप्ता

इस समय अयोध्या के श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले की चर्चा पूरे देश में हो रही है। करीब डेढ़-डेढ़ हजार के चोरी मामले में नकदी के अलावा भगवान श्रीराम के सोने, चांदी के आभूषण, चांदी की इंटें, हीरे-जवाहरात शामिल है। यहां बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मोदी सरकार ने श्रीराम मंदिर तीर्थ क्षेत्र नाम से ट्रस्ट का गठन किया। देश-विदेश के लोगों ने भर-भरकर चंदा दिया। श्रद्धालुओं ने चढ़ावा चढाया, लेकिन हजारों करोड़ों की लूट हो गई। ट्रस्ट के दो टॉप सदस्यों में मोदी के बेहद करीबी चंपत राय महासचिव बने, वहीं दूसरे टॉप सदस्य में अनिल मिश्रा शामिल रहे। चोरी मामले में ट्रस्ट पर जब सवाल उठे तो, ट्रस्ट ने सरकार से एसआईटी जांच की मांग रखी। इस ट्रस्ट के दूसरे सदस्य ने चोरी की एफआईआर लिखवाई। ध्यान देने वाली बात यह है कि जांच रिपोर्ट पहले आई और फिर बाद में एफआईआर लिखवाई गई। एफआईआर में न ही चंपत राय का नाम है और न ही अनिल मिश्रा का। किसी भी ट्रस्ट के मेंबर का नाम एफआईआर में नहीं है। नाम तो छोड़ो मंदिर ट्रस्ट का नाम भी नहीं है। इस एफआईआर में आठ लोगों के नाम हैं, जिनमें चंपत राय के ड्राइवर या असिस्टेंट टीनू यादव, दान की गिनती करने वाले अनुकल्प मिश्रा जो मामूली सेवादार है। तीसरा लवकुश मिश्रा जो अनुकल्प मिश्रा का साला है, जिसके घर से १० लाख रुपए वैâश मिले। चौथा मनीष यादव जो टीनू यादव का भतीजा है। पांचवा सुभाष श्रीवास्तव, छठा अभिनेश शुक्ला सातवां करुणेश पांडे, आठवां रमाशंकर मिश्रा यानी बड़ी मछली बाहर और छोटी मछली अंदर। दूसरी बात यदि एफआईआर में महासचिव चंपत राय और अनिल मिश्रा का नाम नहीं है तो उन्होंने इस्तीफा क्यों दिया। यह सोचने वाली बात है। भविष्य की बात करें तो छोटी मछलियों के ऊपर ठीकरा फोड़कर इस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जाए तो कोई ताज्जुब नहीं होगा। क्योंकि देश में मोदी सरकार चल रही है और कहते हैं कि मोदी हैं तो मुमकिन है।
ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा…खा कौन रहा है?
वर्ष २०१४ में देशवासियों को अच्छे दिन का सपना दिखाकर मोदी सरकार सत्ता में आई। सत्ता में आने के बाद लोगों के अच्छे दिन तो नहीं आए, पर हर दिन मोदी सरकार के कारनामे लोगों के सामने आ रहे हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के साथ मोदी जी का नया स्टार्टअप मॉडल चल रहा है। वह है स्वैâमिंग.कॉम। २०२६ तक मोदी के करीबी हर नेता, दोस्त, उद्योगपति, ठेकेदारों के अच्छे दिन आ गए, लेकिन जनता के नहीं आए। इलेक्टोरल बॉन्ड में पहले डोनेशन सीक्रेट, दान दाता सीक्रेट। जब सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा तो तरीका बदला। चंदा दो, धंधा लो। पीएम केयर फंड में पैसा पब्लिक का दिया हुआ है। मगर पैसे के बारे में पूछ नहीं सकते। कोविड प्रोक्योरमेंट कंट्रोवर्सी की बात करें तो जब देश कोविड से लड़ रहा था तो मोदी के करीबी मजे ले रहे थे। जनता ऑक्सीजन के लिए तरस रही थी। पीएम केयर फंड हो या स्मार्ट सिटी मिशन। नाम स्मार्ट सिटी, प्रेजेंटेशन भी स्मार्ट, पर रिजल्ट ढूंढ़ने के लिए स्मार्ट मैग्नीफाई ग्लास चाहिए। नमामि गंगे में पैसा पानी की तरह बहा, लेकिन सफाई आज तक नहीं हुई। यानी इस प्रोजेक्ट को भी मोक्ष मिल गया। राजेश एक्सपोर्ट पर घोटाले के आरोप लगे। अडानी पर हर दिन सवाल उठ रहे हैं, लेकिन जवाब नेटवर्क एरर…प्लीज ट्राई अगेन। ताजा मामले में अयोध्या के श्रीराम मंदिर चढ़ावा में हजारों करोड़ों की लूट। वहीं महाकाल की नगरी उज्जैन में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सरकारी प्रोजेक्ट की जानकारी के माध्यम से जमीन खरीदी, वह भी १६८ एकड़। यानी आम लोगों को गूगल मैप और मोदी के करीबी को फ्यूचर मैप। मोदी सरकार में फायदा उन्हीं को मिल रहा है जो सत्ता के करीब है। न खाऊंगा, न खाने दूंगा, लेकिन सवाल है खा कौन रहा है? इसका गणित आप लगाते रहिए।

अन्य समाचार