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कोमा में महाराष्ट्र में ‘दवा सुरक्षा’ …१३ करोड़ की आबादी, सिर्फ ४५ ड्रग इंस्पेक्टर!

-२०० में से १५५ पद खाली
-३० लाख लोगों पर एक निरीक्षक
धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
महाराष्ट्र में दवा सुरक्षा की स्थिति चिंताजनक रूप से नाजुक हो गई है। १३ करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस राज्य में मात्र ४५ ड्रग इंस्पेक्टर ही दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा की निगरानी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। हैरान करने वाला सच यह है कि कुल २०० मंजूर पदों में से १५५ पद वर्षों से खाली पड़े हैं, जिसके चलते प्रत्येक ड्रग इंस्पेक्टर पर लगभग ३० लाख लोगों की दवा सुरक्षा सुनिश्चित करने का दबाव है। इस बीच कफ सिरप से नौनिहालों की हो रही मौतों के मामले ने पहले से तनावग्रस्त इस व्यवस्था पर और अधिक दबाव डाला है, जिससे आम जनता की सेहत खतरे में पड़ गई है।
बता दें कि ड्रग इंस्पेक्टरों के खाली पदों पर भर्ती प्रक्रिया लंबे समय से अटकी हुई है, जबकि राज्य में फार्मास्यूटिकल उद्योग का दायरा लगातार बढ़ रहा है। इस विषमता का सीधा असर जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बता दें कि राज्य में दवा निरीक्षक के कुल २०० पद स्वीकृत हैं, लेकिन उनमें से १५५ पद रिक्त हैं। इस तरह से पूरे महाराष्ट्र में दवा निरीक्षण का जिम्मा केवल ४५ अधिकारियों पर टिका हुआ है। इन चंद अफसरों को न केवल दवा दुकानों की जांच करनी होती है, बल्कि उत्पादन इकाइयों, मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर, ऑनलाइन सेल और मिलावटी दवाओं के खिलाफ कार्रवाई भी करनी होती है।
‘स्लीप मोड’ में सिस्टम
एफडीए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मौजूदा बुनियादी ढांचा और संसाधन भी पूरी तरह से अपर्याप्त हैं। कई ड्रग इंस्पेक्टरों के पास जरूरी टेस्टिंग किट, पर्याप्त वाहन या त्वरित नमूना परीक्षण की सुविधा तक नहीं है। ऐसे में निरीक्षण महज एक फाइल-खानापूर्ति बनकर रह गया है। जब तक कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आता, तब तक व्यवस्था की ‘स्लीप मोड’ में चलने की प्रवृत्ति जनस्वास्थ्य के साथ खतरनाक खिलवाड़ कर रही है।

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