और एक सबक!

चार राज्यों में जीत की खुशी से भाजपा और उसके नेता गदगद हो गए हैं। विशेषत: उत्तर प्रदेश में मोदी और योगी की डबल इंजन से बड़ी जीत मिली है और कुछ दिनों तक जीत का उत्सव तथा लड्डू बांटना चलता रहेगा, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। चार राज्यों की जीत से भाजपा ने इतिहास रचा, ऐसा मत प्रधानमंत्री ने व्यक्त किया। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह जीत महत्वपूर्ण है क्योंकि अब वे यूक्रेन युद्ध के नाम पर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने के लिए आजाद हो गए हैं और दर वृद्धि का जनादेश चार राज्यों की जनता द्वारा दिए जाने की बात कहने में भी वे पीछे नहीं रहेंगे। प्रधानमंत्री के नाम पर चारों राज्यों में वोट मांगे गए और उसी तरह से वह पंजाब में भी मांगे गए। पंजाब के मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर क्यों नकार दिया? यह भाजपा के नेतृत्व से समझना दिलचस्प होता। मायावती की ‘बसपा’ चुनाव से भाग खड़ी हुई और उनके वोट भारतीय जनता पार्टी की तरफ घुमा दिए गए। उसका भी लाभ ही हुआ। मायावती किसी दौर में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाघिन की तरह घूमती थीं, परंतु आय से अधिक संपत्ति के मामले में केंद्रीय जांच एजेंसियों का दबाव लाकर मायावती को चुनाव से दूर रहने को मजबूर किया गया। बसपा की चुनाव में मौजूदगी एक औपचारिकता थी। जो पार्टी किसी दौर में उत्तर प्रदेश में अपने दम पर सत्ता में आने का चमत्कार कर चुकी थी उस पार्टी को ४०३ के आंकड़ोंवाली विधानसभा में सिर्फ एक सीट का मिलना यह किसी को स्वीकार होगा क्या? केंद्रीय जांच एजेंसियों का दबाव भी उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा की जीत में प्रमुख कारक सिद्ध हुआ, परंतु विजयी सभा में हमारे प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं, विरोधी केंद्रीय जांच एजेंसियों पर दबाव ला रहे हैं। प्रधानमंत्री की राय से उनके लोग भी सहमत नहीं होंगे। दबाव क्या व वैâसा होता है, इसका मायावती ज्वलंत उदाहरण हैं। वहां पंजाब में नए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने प्रत्येक सरकारी कार्यालय में डॉ. आंबेडकर की तस्वीर लगाना अनिवार्य कर दिया है। उसी समय उत्तर प्रदेश में कांशीराम, डॉ. आंबेडकर के विचारों व प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाने का काम मायावती द्वारा किया जाए, इसका दुख है। भारतीय जनता पार्टी के यश में केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरिए मायावती का ‘रोल’ बड़ा है। अर्थात मायावती ने इस बार अपने साथ-साथ अपनी ‘बसपा’ का अस्तित्व भी खत्म कर दिया। उत्तर प्रदेश की जीत से भारतीय जनता पार्टी ने उत्सव मनाया। निश्चित तौर पर उनकी सत्ता आई, परंतु इस बार अखिलेश यादव की सीटें विधानसभा में तीन गुना बढ़ी हैं। पंजाब की स्थिति व इस तीन गुना बढ़ी सीटों के कारण राष्ट्रपति का चुनाव भाजपा के लिए परेशानी का सबब बनेगा, ऐसा नजर आ रहा है। बहुमत के मैजिक फिगर की तुलना में भाजपा को ६० सीटें अधिक मिलीं व इसके लिए पूरी केंद्रीय सत्ता दांव पर लगा दी गई। परंतु जीत आखिरकार जीत ही होती है। फिर वह किसी भी तरह से और किसी भी मार्ग से क्यों न मिली हो। परंतु उत्तर प्रदेश में जीत मिलते ही महाराष्ट्र के भाजपाई नेता इतने बेहोश हो गए कि वे ‘उत्तर प्रदेश झांकी है, महाराष्ट्र अभी बाकी है’ ऐसी गर्जना करने लगे। पणजी में सच्चाई के लिए लड़नेवाले मनोहर पर्रिकर के पुत्र पराजित हुए इसका दुख उन्हें नहीं है, परंतु एक भयंकर चरित्र वाले शख्स ने उत्पल पर्रिकर को पराजित किया इसका उत्सव मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री पारदर्शक व स्वच्छ राजनीति की बात करते हैं इसलिए ये कहा। अब महत्वपूर्ण सवाल ये है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों का झमेला सिर्फ राजनीतिक विरोधियों के पीछे क्यों लगता है। भारतीय जनता पार्टी के भ्रष्ट खाऊबाज और घोटालेबाज लोगों की जानकारी सार्वजनिक करते ही व उनके बारे में सरकार को बताते ही वह जांच एजेंसियों पर दबाव वैâसे सिद्ध हो सकता है? महाराष्ट्र व प. बंगाल ने दिल्ली की गुलामी को ठुकरा दिया, तुम्हारे टुकड़ों पर जीनेवाली बिल्ली बनकर रहने से इंकार कर दिया इसलिए केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करना। यह वैâसी निष्पक्षता और स्वतंत्र स्वाभिमान है? कांग्रेस के दौर में जांच एजेंसियां दबाव में व राजनीतिक मकसद से कार्रवाई करती हैं, ऐसा आरोप लगानेवालों में आज के प्रधानमंत्री श्री मोदी आगे रहते थे। परंतु अब उन्हीं के प्रधानमंत्री कार्यालय में उससे अलग क्या हो रहा है? उस पर भाजपा से संबंधित लोग न्यायालय में पहुंचे तो उन चुनिंदा लोगों को कार्रवाई अथवा गिरफ्तारी से राहत वैâसे मिलती है? यह भी केंद्रीय जांच एजेंसियों एवं न्यायालय से संबंधित एक गूढ़ है। न्याय सभी के लिए एक जैसा होता है। केंद्रीय जांच एजेंसियों पर दबाव का ही मुद्दा प्रधानमंत्री मोदी ने विजय सभा में उठाया इसलिए कहना पड़ रहा है। महाराष्ट्र में भाजपाई नेता आए दिन केंद्रीय जांच एजेंसियों के नाम पर धमकियां देते हैं और उन धमकियों के अनुसार आदेश की तरह तुरंत कार्रवाई भी होती है। ये एजेंसियों के स्वतंत्र अथवा निष्पक्ष आदि होने के लक्षण नहीं हैं। महाराष्ट्र को रौंदना है, झुकाना है, मराठी स्वाभिमान को नष्ट करके उसे घुटनों के बल लाना है इसके लिए चल रही ये उठा-पटक है। चार राज्यों की जीत से यह प्रवृत्ति बढ़नेवाली ही होगी तो महाराष्ट्र को अन्याय के खिलाफ लड़ना ही होगा। विजय को विनम्रता से स्वीकार किया जाए तो ही वह गौरवशाली सिद्ध होता है। इसी दौर में कांग्रेस पार्टी भी जीत के पीछे जीत हासिल कर रही थी। गल्ली से दिल्ली तक सिर्फ कांग्रेस का ही बोलबाला था। कांग्रेस ने पत्थर भी खड़ा कर दिया तो वह जीत जाता था। आज उनका क्या हुआ? यह राजनीति का सबक है।

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