मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा: सत्ता का तमाशा, बैंक का भरोसा और सोने की चमक!

महाराष्ट्रनामा: सत्ता का तमाशा, बैंक का भरोसा और सोने की चमक!

राजन पारकर

लोकतंत्र के इस रंगमंच पर आज तीन बड़े दृश्य एक साथ दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ सत्ता के गलियारों में भाषा की तलवारें चल रही हैं, दूसरी तरफ बैंकों की दुनिया में साइबर ठगों से लड़ने के लिए नए नियमों की ढाल तैयार हो रही है और तीसरी तरफ बाजार में सोना-चांदी भी जनता को देखकर कह रहे हैं — ‘भाई, अब तो हमें भी थोड़ा नीचे आना पड़ा!’
सवाल पूछे तो गुस्सा क्यों?
राजनीति के मंच पर कभी-कभी ऐसा दृश्य देखने को मिलता है कि नेता जी सवालों से ऐसे परेशान हो जाते हैं जैसे पत्रकार ने प्रश्न नहीं, कोई पुराना हिसाब-किताब मांग लिया हो। जनता ने जिस प्रतिनिधि को अपनी आवाज बनाकर भेजा, वही आवाज सुनकर अगर नाराज हो जाए तो लोकतंत्र की घंटी थोड़ी जोर से बजानी पड़ती है। पत्रकारों के सवालों पर गुस्सा, ऊंची आवाज और धमकी की भाषा यह सब उस लोकतंत्र को शोभा नहीं देता, जहां जवाबदेही सबसे बड़ा गहना माना जाता है। कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति जितना बड़ा होता है, उससे अपेक्षा भी उतनी ही बड़ी होती है। सत्ता की कुर्सी बड़ी अजीब होती है, जिस पर बैठते ही कुछ लोगों को लगता है कि अब जनता नीचे और सवाल अपराध बन गए हैं, लेकिन याद रखना चाहिए कि माइक को दबाने से सच की आवाज नहीं दबती।
ठगी के युग में आरबीआई की ढाल
डिजिटल भारत की दौड़ में मोबाइल जेब में छोटा बैंक बन गया है, लेकिन उसी मोबाइल ने ठगों को भी नया मैदान दे दिया। एक क्लिक में पैसा आता है और एक गलत क्लिक में गायब भी हो जाता है। ऐसे समय में आरबीआई का नया नियम ग्राहकों के लिए राहत की घंटी जैसा है। अब फर्जीवाड़े की शिकायत पर बैंक को ग्राहक के सिर पर चिंता का पहाड़ रखने के बजाय पहले राहत देनी होगी। पहले जमाने में चोर घर में घुसता था, अब वह मोबाइल में घुसने की कोशिश करता है। फर्क इतना है कि अब चौकीदार भी डिजिटल हो गया है। जनता की उम्मीद यही है कि बैंक की दीवारें मजबूत हों और ग्राहक की मेहनत की कमाई सुरक्षित रहे।
सोने की चमक वापस जमीन पर
कुछ समय पहले सोने का भाव ऐसा उड़ रहा था जैसे उसने आसमान में अपना घर बना लिया हो। आम आदमी दुकान के बाहर खड़ा होकर सिर्फ भाव सुनता था और फिर अपनी जेब को समझाकर वापस लौट आता था, लेकिन अब जब सोने और चांदी के दाम नीचे आए हैं तो बाजार में फिर से हलचल है। लोग कह रहे हैं — ‘वाह! अब गहने बनाने का सपना शायद पूरा हो सके। सोना भी राजनीति की तरह है, कभी सिर चढ़कर बोलता है और कभी जनता के पास लौट आता है। चांदी ने भी राहत की सांस ली और बोली इतने दिन आसमान देखने के बाद अब जमीन भी अच्छी लग रही है!
आज के तीनों दृश्य देश की तीन तस्वीरें दिखाते हैं —राजनीति को विनम्रता चाहिए, बैंकिंग व्यवस्था को जिम्मेदारी चाहिए और बाजार को संतुलन चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत न कुर्सी है, न पैसा — सबसे बड़ी ताकत है जनता की जागरूक नजर और सवाल पूछने का अधिकार।

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