मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव: चुनाव मुद्दों से नहीं, मार्केटिंग से जीते जाते हैं?

राजधानी लाइव: चुनाव मुद्दों से नहीं, मार्केटिंग से जीते जाते हैं?

ड़ॉ. रमेश ठाकुर। एक वक्त था, जब एक आम मतदाता चुनाव में राजनीतिक दलों को कई पैमानों पर तौलता था। लेकिन अब वैसी प्रथा विलुप्त हो गई है। वोटर जो व्यक्ति सापेक्ष भी हो सकते हैं और समाज सापेक्ष भी। भाजपा जीत तो गई लेकिन संदेहात्मकरूपी कई सवाल खड़े हो गए हैं। लखीमपुर हिंसा और हाथरस जैसी घटनाओं को शायद कोई कभी भुला पाए, उन जगहों से उम्मीदवारों का जीतना किसी को हजम नहीं हो रहा। कोई वैâसे ये सभी मुद्दे भूल सकता है? क्या कोरोना में हुकूमतों की अनदेखी को भी वोटरों ने माफ कर दिया। चुनावों का इतिहास अब पहले के मुकाबले बदल गया है। चुनाव पूरी तरह से मार्केटिंग पर निर्भर हो गए हैं। कहने को तो सियासत जनसेवा है लेकिन अब पार्टियां और राजनेता नफा-नुकसान का धंधा समझते हैं। राजनीति में अब मुद्दों की जरूरत नहीं, आपकी मार्वेâटिंग जितनी तेज और जबरदस्त होगी, आपके जीतने के चांस उतने ही ज्यादा होंगे। नैतिकता, समाज सेवा, भाईचारे आदि की अगर दुहाई देंगे, तो देते रह जाएंगे। अगर विश्वास नहीं है तो मौजूदा चुनाव रिजल्ट उसके उदाहरण हैं।

देश में कठिनाइयों की कमी नहीं है, भरमार है। बेरोजगारी है, महंगाई है, अच्छी शिक्षा का सुलभ न होना है, सस्ते और कारगर इलाज की कमी है, असुरक्षा का प्रश्न तो खड़ा ही है। पर लगता है कि ये सभी मुद्दे जनता के लिए बेकार हो गए हैं, इनमें दम नहीं रहा? ये रोजमर्रा के मुद्दे हो गए हैं। तभी तो ये चुनावी जश्न की आरती नहीं बन पाते। पर ऐसा क्यों? लोगों ने क्यों परेशानियों में रहना सीख लिया। परेशानियों को क्यों अपनी किस्मत मान लिया। इसका बुनियादी कारण तलाशना भी बहुत कठिन हो गया है। एक वक्त था, जब एक आम मतदाता चुनाव में राजनीतिक दलों को कई पैमानों पर तौलता था। लेकिन अब वैसी प्रथा विलुप्त हो गई है। वोटर जो व्यक्ति सापेक्ष भी हो सकते हैं और समाज सापेक्ष भी। भाजपा जीत तो गई लेकिन संदेहात्मकरूपी कई सवाल खड़े हो गए हैं। लखीमपुर हिंसा और हाथरस जैसी घटनाओं को शायद कोई कभी भुला पाए, उन जगहों से उम्मीदवारों का जीतना किसी को हजम नहीं हो रहा। कोई वैâसे ये सभी मुद्दे भूल सकता है? क्या कोरोना में हुकूमतों की अनदेखी को भी वोटरों ने माफ कर दिया।
चुनावों का इतिहास अब पहले के मुकाबले बदल गया है। चुनाव पूरी तरह से मार्वेâटिंग पर निर्भर हो गए हैं। कहने को तो सियासत जनसेवा है लेकिन अब पार्टियां और राजनेता नफा-नुकसान का धंधा समझते हैं। राजनीति में अब मुद्दों की जरूरत नहीं, आपकी मार्वेâटिंग जितनी तेज और जबरदस्त होगी, आपके जीतने के चांस उतने ही ज्यादा होंगे। नैतिकता, समाज सेवा, भाईचारे आदि की अगर दुहाई देंगे, तो देते रह जाएंगे। अगर विश्वास नहीं है तो मौजूदा चुनाव रिजल्ट उसके उदाहरण हैं। उम्मीद नहीं थी भाजपा ऐसा कर पाएगी। उनके कार्यकर्ताओं को भी ऐसी उम्मीद नहीं थीं। भारतीय जनता पार्टी की तमाम एंटी इनकंबेंसी के बावजूद भी सत्ता में वापसी हुई। विपक्षी पार्टियों ने माहौल उनके खिलाफ जरूर बनाया लेकिन उनकी पीआर एजेंसियों ने अंत तक हार नहीं मानी, डटे रहे। ऐसी मार्केटिंग की जिससे अच्छे-अच्छे हार मान गए। जबकि, बुनियादी मुद्दे ऐसे थे, जिससे साफ था कि भाजपा तो इस बार निपट जाएगी।
गौरतलब है, पिछले डेढ़ साल से एक बड़ा मुद्दा यूपी, पंजाब और उत्तराखंड में किसान आंदोलन का रहा। तीन कृषि कानूनों को लेकर भाजपा के प्रति जनमानस की भंयकर नाराजगी थी। इसे लेकर देश की राजधानी दिल्ली की सरहदों पर साल भर से ज्यादा समय तक आंदोलन चलाया गया। माहौल यूं बनाया गया कि अगले चुनावों में यही एक निर्णायक मुद्दा साबित होगा। भाजपा उत्तर प्रदेश से साफ हो जाएगी। तरह-तरह के अनुमान चुनावी पंडित लगा रहे थे, लेकिन जब ईवीएम का पिटारा खुला तो सब उल्टा हुआ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट किसानों की नाराजगी को ‘भाजपा का काल’ बताया जा रहा था, वैसा भी कुछ देखने को नहीं मिला। नतीजों के बाद बड़बोले किसान नेता नरेश टिवैâत कहीं नजर नहीं आए।
कहा जा सकता है कि भाजपा के हिंदुत्व के आग्रह ने पश्चिमी यूपी में वैसा मुस्लिम-जाट समीकरण नहीं बनने दिया, जैसा कि बताया जा रहा था। भाजपा ने इस मुद्दे की गहराई को शायद पहले ही भांप लिया था। इसलिए चुनाव के तीन माह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेकर मुद्दे की सियासी हवा निकाल दी। अगर पंजाब की बात करें तो जिन कृषि कानूनों के विरोध और बरसों राज्य में सत्ता में रहा अकाली दल एनडीए से अलग हुआ, उसे भी किसानों ने चुनाव में वोट नहीं दिए। उसके तो सभी सेनापति भी धराशायी हो गए। यही नहीं वहां सत्तारूढ़ कांग्रेस ने किसान आंदोलन को खुलकर समर्थन दिया था, परंतु न तो किसानों और न ही किसानों का आंदोलन चलाने वालों ने कांग्रेस को वोट दिया। उन्होंने कांग्रेस की जगह उस आम आदमी पार्टी को बंपर समर्थन दिया, जो किसान आंदोलन का समर्थन तो कर रही थी लेकिन बहुत खुलकर सामने भी नहीं आ रही थी।
पंजाब में आप और यूपी-उत्तराखंड में किसानों द्वारा भाजपा को बड़े पैमाने पर वोट करने का अर्थ क्या निकाला जाए? किसान नासमझ हैं या फिर जिस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभारा गया, उसमें वैसा चुनावी दम था ही नहीं? जैसा पेंट किया जा रहा था? इसका अर्थ यह कतई नहीं कि किसानों की समस्या को नजर अंदाज किया जाए या उसके प्रति असंवेदनशील हुआ जाए, लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि खुद किसान और आम आदमी किन मुद्दों को लेकर ज्यादा संवेदनशील है, जो उसे सत्ता परिवर्तन के लिए विवश कर दे। कहीं ऐसा तो नहीं वोटरों ने जो किया है, कुछ समय बाद उन्हें अपनी करनी पर पछतावा हो।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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