मुख्यपृष्ठस्तंभसाहित्य शलाका : हिंदी और मराठी रंगमंच, दिल की आवाज!

साहित्य शलाका : हिंदी और मराठी रंगमंच, दिल की आवाज!

प्रो. दयानंद तिवारी

भारत का रंगमंच बहुरंगी है-लोकनाट्य की धूलभरी पगडंडियों से लेकर महानगरों के ब्लैक-बॉक्स थिएटर तक। इस परिदृश्य में हिंदी और मराठी रंगमंच दो ऐसे सशक्त स्तंभ हैं, जिन्होंने न केवल सौंदर्यबोध और संवेदना को दिशा दी, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक विमर्शों को भी जनभाषा में रूपायित किया। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इन दोनों परंपराओं की श्रेष्ठता इस बात में है कि वे परंपरा की जड़ों से ऊर्जा लेते हुए निरंतर नवीन प्रयोग करते हैं-पाठ, प्रस्तुति, संगीत, देहभाषा, प्रकाश, और दर्शक-संवाद-सब कुछ एक समवेत रचना में बदल जाता है।
मराठी रंगमंच का आधुनिक स्वर १९वीं शताब्दी के संगीत-नाटक से प्रारंभ होकर २०वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में नाट्य-आंदोलनों और ‘समकालीनतावादी’ पाठों तक आता है। संगीत-नाटक ने कथ्य और सुर का अद्भुत समन्वय किया; बाद में यह परंपरा यथार्थवादी, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक नाटकों में रूपांतरित हुई। विजय तेंदुलकर, महेश एलकुंचवार, सतीश आलेकर जैसे नाटककारों ने भाषा को तीखे सामाजिक प्रश्नों का औजार बनाया-सत्ता, हिंसा, लैंगिक असमानता, नैतिक दुविधाएं, मध्यमवर्गीय आडंबर-सब कुछ मंच पर उजागर हुआ। शहरी महाराष्ट्र में रहीं विशिष्ट सांस्कृतिक संस्थाएं, रंगायन और शोधपरक समूह-कार्य, तथा नाटक-उत्सवों का सघन नेटवर्क-इन सबने मराठी रंगमंच को एक जीवंत पारिस्थितिकी दी। आज भी पुणे-मुंबई के प्रेक्षागृहों से लेकर छोटे शहरों के प्रयोगशील मंचों तक, युवा निर्देशक दृश्य-भाषा, प्रकाश-रचना और न्यूनतावादी सेट-डिजाइन के साथ विमर्शी, तीक्ष्ण प्रस्तुतियां ला रहे हैं। मराठी की एक विशिष्ट देन है-पठनीय नाटक पर उतना ही जोर जितना प्रस्तुति पर; इसीलिए मराठी नाटक ‘पुस्तक’ रूप में भी व्यापक रूप से पढ़े जाते हैं और विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनते हैं।
हिंदी रंगमंच ने अपनी समकालीन गरिमा को अनेक धाराओं से अर्जित किया-शास्त्रीय काव्य-अनुवाद, लोकनाट्य, आईपीटीए की सामाजिक-प्रतिबद्धता तथा शहरी रंग-समूहों की सौंदर्यपरक खोजें। मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, असगर वजाहत, उषा गांगुली, दया प्रसाद गुप्त जैसे नामों ने पाठ में संवादशीलता और मंच पर मितव्ययी किंतु अर्थगर्भित दृश्य-विधान की परंपरा रची। हिंदी के ‘सड़क-नाटक’ ने जनतंत्र के प्रांगण में रंगमंच की भूमिकाओं को नए सिरे से परिभाषित किया-थिएटर केवल रसोपभोग नहीं, बल्कि नागरिक चेतना का शिल्प है। दिल्ली, भोपाल, जयपुर, लखनऊ, पटना, बनारस-इन शहरों के संस्थान और समूह आज भी नए लेखन, अनुवाद, रूपांतरण और अंतर-भारतीय आदान-प्रदान का केंद्र हैं। हिंदी में एक बड़ी शक्ति है-इसके दर्शकों का विशाल, बहुभाषिक स्वरूप, जो नाटक को भारत के विविध सामाजिक यथार्थों से जोड़ता है।
दोनों धाराओं की श्रेष्ठता उनके ‘संवाद’ में है-एक दूसरे से और समय से। मुंबई-पुणे-ठाणे की त्रिभुजीय सांस्कृतिक भूमि हिंदी-मराठी के परस्पर संक्रमण का जीवंत उदाहरण है। अनेक कलाकारों ने दोनों भाषाओं में काम किया; अनुवाद-रूपांतरण और द्विभाषिक प्रस्तुतियां सामान्य हैं। यह पुल केवल भाषा का नहीं, अभिनय-पद्धतियों, मंचीय-शिल्प और प्रशिक्षण की परंपराओं का भी है। मराठी का तीखा सामाजिक व्यंग्य और मनोवैज्ञानिक परतें, हिंदी का व्यापक जन-विमर्श और लोक-संवेदना-ये तत्व मिलकर एक ऐसी समकालीन शैली गढ़ते हैं जिसमें नाट्य-कला और नागरिकता साथ-साथ चलती हैं। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ‘मंच’ का अर्थ भी विस्तृत हुआ है। पारंपरिक प्रेक्षागृह के साथ-साथ ब्लैक-बॉक्स, स्टूडियो-थिएटर, साइट-स्पेसिफिक प्रदर्शन, और डिजिटल-स्ट्रीमिंग ने रंगमंच की पहुंच बढ़ाई। पोस्ट-पैंडेमिक काल में रिकॉर्डेड/लाइव-स्ट्रीम प्रस्तुतियों, रीडिंग-सेशन्स और हाइब्रिड वर्कशॉप्स ने नए दर्शक रचे हैं। हिंदी और मराठी, दोनों में इस डिजिटल मुहावरे का रचनात्मक उपयोग दिखता है-संक्षिप्त अवधि के ‘रीड प्ले’, पॉडकास्ट-नाटक, तथा ‘स्क्रिप्ट-क्लब’ संस्कृति, जिसने लेखन को केंद्र में लाकर समूह-चिंतन को बल दिया। ओटीटी के युग में भी थिएटर की विशिष्टता–दर्शक-अभिनेता का सीधा, सांस-सांस का रिश्ता-अबाध ही नहीं बनी हुई है; बल्कि डिजिटल दृश्यता ने मंच के लिए उत्सुक दर्शकों का नया तल बनाकर प्रत्यक्ष प्रस्तुति की मांग को और बढ़ाया है। प्रशिक्षण और संस्थागत संरचना की दृष्टि से मराठी रंगमंच ने नाट्य-शिक्षा, बाल-रंगमंच और अर्ध-पेशेवर समूहों के सहयोगी मॉडल विकसित किए हैं। हिंदी ने विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय रंग-संस्थानों और स्वतंत्र समूहों के माध्यम से देशव्यापी नेटवर्क विकसित किया, जहां क्षेत्रीय बोलियों और लोक शैलियों के साथ आधुनिक नाटक का संगम होता है। दोनों परंपराओं में महिला-केंद्रित लेखन और निर्देशन की उपस्थिति तेजी से बढ़ रही है-स्त्री-अनुभव, देह-राजनीति, घरेलू श्रम, और सार्वजनिक जीवन में स्त्री की भागीदारी जैसे विषय मंच के केंद्र में आए हैं। दलित और बहुजन विमर्श ने तो रंगमंच की नैतिक दिशा को ही पुनर्स्थापित किया है-हिंदी-मराठी दोनों में यह ऊर्जा नई संवेदनशीलता और भाषा की नवीन संरचनाएं रच रही है। वर्तमान चुनौतियां भी कम नहीं-आर्थिक संसाधन, प्रायोजन, प्रेक्षागृहों की उपलब्धता, टिकटिंग-इन्प्रâास्ट्रक्चर, कलाकारों के लिए सतत जीवन-निर्वाह-ये प्रश्न हर समूह के सामने हैं। फिर भी, दोनों भाषाई रंग-समुदायों ने सहयोगात्मक उत्पादन, क्राउड-फंडिंग-सामुदायिक प्रदर्शन और शैक्षिक साझेदारियों के माध्यम से व्यवहार्य मॉडल निर्मित किए हैं। नाटक-उत्सव-छोटे हों या बड़े-केवल प्रदर्शन नहीं, प्रशिक्षण, स्क्रिप्ट-डॉक्टिंग, और नेटवर्विंâग के मंच बन रहे हैं। अनुवाद-प्रयासों ने सीमाएं मिटाईं-मराठी के महत्त्वपूर्ण नाटक हिंदी में और हिंदी के पाठ मराठी में, साथ ही अंग्रेजी/अन्य भारतीय भाषाओं में भी, जिससे विचार और सौंदर्य, दोनों का प्रसार हुआ। सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से आज का सर्वश्रेष्ठ वही है, जो कथ्य-कला और तकनीक का संतुलित संगम करे: गद्य और काव्य का मिश्रित संवाद, देह-भाषा के सूक्ष्म प्रयोग, न्यूनतम किंतु प्रतीकात्मक सेट, जीवित / रिकॉर्डेड संगीत के सधे हुए प्रयोग और प्रकाश-डिजाइन जो पाठ का सहचर बने, प्रतिस्पर्धी नहीं। हिंदी-मराठी रंग-समूहों में यह समझ विकसित हुई है कि मंचीय ‘रिक्तता’ भी अर्थपूर्ण होती है-अतिरिक्त सज्जा से अधिक मुखर वह खालीपन है, जिसमें दर्शक अपनी स्मृतियां, अपने प्रश्न भरता है। यही तो थिएटर की नैतिकता है-उत्तर देने से पहले प्रश्नों को जगह देना।
भविष्य का रास्ता स्पष्ट है: (१) नए लेखन पर निवेश-राइटर्स-रूम, स्क्रिप्ट-लैब, मेंटरशिप; (२) अभिनय-प्रशिक्षण में देह-कार्य और स्वर-संस्कार के साथ अंत: विषयी अध्ययन—समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, इतिहास; (३) तकनीकी-कला (लाइट/साउंड/मल्टीमीडिया) को समान रचनाकार का दर्जा; (४) बाल-और किशोर-रंगमंच को मुख्यधारा के वैâलेंडर में जगह; (५) ग्रामीण-अर्धशहरी परिदृश्य में भ्रमणशील प्रस्तुतियां (६) अनुदान और प्रायोजन के पारदर्शी तंत्र; और (७) मंच-दर्शक संवाद के लिए बाद-प्रदर्शन चर्चाओं को नियम बनाना। इन कदमों से हिंदी और मराठी रंगमंच न केवल जीवति रहेंगे, बल्कि नए शिखर रचेंगे।
अंतत: हिंदी और मराठी रंगमंच की ‘सर्वश्रेष्ठता’ कोई स्थिर पदक नहीं, बल्कि एक सतत साधना है-समय से जूझने की, समाज को परखने की, सौंदर्य को मानवीय संवेदना से जोड़ने की। यही साधना उन्हें आधुनिक भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर अनिवार्य बनाती है। जब एक अभिनेता मंच पर सांस लेता है, तो दर्शक-दीर्घा में बैठा मनुष्य अपनी ही कहानी सुनता है-कभी मराठी में, कभी हिंदी में-पर आवाज दिल की होती है। यही आवाज इन दोनों रंग-धाराओं की सच्ची उपलब्धि और उनका साझा भविष्य है।

(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)

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