प्रो. दयानंद तिवारी
‘साहित्य समाज का दर्पण है’ यह उक्ति वर्षों से कही जाती रही है, किंतु आज के व्यापक परिप्रेक्ष्य में कहना अधिक समीचीन होगा कि साहित्य राष्ट्र का दर्पण है। समाज राष्ट्र का एक अंग है, जबकि साहित्य उस राष्ट्र की आत्मा, उसकी संस्कृति, उसकी स्मृतियों, उसके संघर्ष, उसके स्वप्न और उसके भविष्य का जीवंत दस्तावेज होता है। किसी देश की वास्तविक पहचान उसके भवनों, उद्योगों या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके साहित्य से होती है। साहित्य ही बताता है कि उस राष्ट्र के लोग क्या सोचते हैं, क्या महसूस करते हैं और किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
आज का युग कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल संचार, वैश्वीकरण और तीव्र उपभोक्तावाद का युग है। सूचना का प्रवाह इतना तेज है कि विचारों की गहराई अक्सर सतही प्रतिक्रियाओं में बदल जाती है। ऐसे समय में साहित्य का दायित्व और भी बढ़ जाता है। साहित्य केवल घटनाओं का विवरण नहीं देता, बल्कि उन घटनाओं के पीछे छिपे मानवीय सत्य को उजागर करता है। वह मनुष्य को सोचने, प्रश्न करने और स्वयं से संवाद करने की प्रेरणा देता है।
भारतीय साहित्य की परंपरा सदैव राष्ट्रनिर्माण की परंपरा रही है। संत कवियों ने सामाजिक समरसता का संदेश दिया, भक्तिकाल ने आध्यात्मिक चेतना को जन-जन तक पहुंचाया, आधुनिक साहित्य ने स्वतंत्रता, समानता और राष्ट्रीय स्वाभिमान को स्वर प्रदान किया। प्रत्येक युग में साहित्य ने समाज को केवल प्रतिबिंबित नहीं किया, बल्कि उसका मार्गदर्शन भी किया। यही साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
किंतु आज यह प्रश्न गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि क्या समकालीन साहित्य अपनी इस भूमिका का पूरी निष्ठा से निर्वाह कर रहा है? उत्तर मिश्रित है। आज भी अनेक साहित्यकार समाज की पीड़ा, पर्यावरण, शिक्षा, परिवार, ग्रामीण जीवन, स्त्री-अस्मिता, युवाओं की चुनौतियों और मानवीय मूल्यों पर गंभीर लेखन कर रहे हैं। परंतु दूसरी ओर साहित्य का एक वर्ग तात्कालिक प्रसिद्धि, वैचारिक कट्टरता, पुरस्कार-केंद्रित मानसिकता अथवा सोशल मीडिया की क्षणभंगुर लोकप्रियता तक सीमित होता दिखाई देता है। जब साहित्य का उद्देश्य केवल चर्चा में बने रहना हो जाए, तब उसकी आत्मा कहीं न कहीं कमजोर पड़ने लगती है।
वर्तमान समय में साहित्य की सबसे बड़ी भूमिका मनुष्य के भीतर संवेदना को जीवित रखना है। आज संवाद कम हो रहे हैं, परिवारों में दूरियां बढ़ रही हैं, संबंध औपचारिक होते जा रहे हैं और सफलता की दौड़ में मनुष्य स्वयं से ही दूर होता जा रहा है। ऐसे समय में साहित्य केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि वह मनुष्य के भीतर करुणा, नैतिकता, सहिष्णुता और उत्तरदायित्व का पुनर्जागरण करता है। यही उसकी वास्तविक सामाजिक और राष्ट्रीय भूमिका है।
साहित्यकार का दायित्व किसी दल, वर्ग या विचारधारा का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि सत्य और मानवता का प्रतिनिधि बनना है। उसकी लेखनी में साहस भी हो, संवेदना भी; आलोचना भी हो, समाधान भी; यथार्थ भी हो और भविष्य का आलोक भी। साहित्य यदि केवल अंधकार का चित्रण करेगा, तो निराशा बढ़ेगी; यदि केवल कल्पना में रहेगा, तो यथार्थ से कट जाएगा। श्रेष्ठ साहित्य वही है जो यथार्थ को स्वीकार करते हुए आशा की किरण भी दिखाए।
मेरा विश्वास है कि यदि साहित्य अपनी मूल चेतना सत्य, संस्कृति, संवेदना और राष्ट्रहित से जुड़ा रहेगा, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल दर्पण ही नहीं, बल्कि दिशा-सूचक दीप भी बनेगा। राष्ट्र का भविष्य संसदों में जितना बनता है, उतना ही साहित्यकारों की लेखनी में भी निर्मित होता है। इसलिए साहित्य का दायित्व केवल समय का इतिहास लिखना नहीं, बल्कि समय का चरित्र गढ़ना भी है। यही साहित्य की शाश्वत साधना है और यही उसकी सबसे बड़ी राष्ट्रीय भूमिका।
इस कविता के माध्यम से मैं कहूंगा कि –
शब्द यदि जागें तो युग का भाग्य बदल जाता है,
साहित्य से ही राष्ट्र का विश्वास सँभल जाता है।
कलम सदा सच, संस्कार और मानवता लिखे,
तभी हर भारतवासी का भविष्य उज्ज्वल बन जाता है।
अस्तु
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
