संजय राऊत
‘‘न्यायालय को खेल समझ लिया है क्या?’’ यह सवाल जब सुप्रीम कोर्ट ने देश के तीन हास्य कलाकारों से पूछा, तो न्याय से वंचित कई लोगों के चेहरे पर हंसी आ गई। पिछले १२ वर्षों में भारत के हर स्तर के न्यायालयों ने खुद का मजाक बनवा लिया है। देश के मुख्य न्यायाधीश अपने लगभग पचास सहयोगी न्यायाधीशों के साथ जब ‘इंग्लैंड’ का दौरा करके आए और कानून मंत्री किरेन रिजिजू के साथ ‘बैडमिंटन’ खेलते हुए उनकी तस्वीरें सामने आर्इं, तब जनता को यकीन हो गया कि भारतीय न्याय व्यवस्था का सत्यानाश हो चुका है। इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट चाहे जितनी भी छाती पीटे, चाहे जितनी हाय-तौबा मचाए, गई हुई प्रतिष्ठा वापस नहीं मिलेगी। पिछले आठ दिनों में देश के सुप्रीम कोर्ट में तीन महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। एक महिला को देश ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के सामने चीखते-चिल्लाते देखा। वह कह रही थी, ‘‘साहब, मेरे पारिवारिक मुकदमे का पैâसला कर दें। सुप्रीम कोर्ट के चक्कर काटते-काटते मैं मरने के कगार पर पहुंच गई हूं। अब मुझमें ताकत नहीं बची। आज ही सुनवाई करें। मेरे घर में खाने को अन्न नहीं है। बच्चों का बुरा हाल है।’’ लेकिन मुख्य न्यायाधीश का दिल नहीं पसीजा। उन्होंने उस महिला के आक्रोश को अगली तारीख दे दी। न्यायालय में अब आंसू और मानवता की कोई जगह नहीं बची। उससे पहले शुक्रवार को एक याचिकाकर्ता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को गाली देकर कोर्ट में कागज फेंके और कामकाज में बाधा डाली। फिर भी न्यायाधीशों ने उस याचिकाकर्ता के प्रति सहानुभूति दिखाई। न्यायालय ने कहा, ‘‘वे बहुत व्यथित हैं। यह उनका उद्वेग है। हमें उनके प्रति केवल सहानुभूति है।’’ न्यायालय का यह व्यवहार दोहरा है। एक महिला आक्रोश करती हुई मुख्य न्यायाधीश से मुकदमा जल्दी चलाने की विनती करती रही, उसे कोई सहानुभूति नहीं मिली। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में खड़े होकर न्यायाधीशों पर कागज फेंकने वाले और मुख्य न्यायाधीश को गाली देने वाले व्यक्ति को सहानुभूति मिली!
क्या हम यह समझें कि हमारे न्यायालय अब गाली खाने लायक ही रह गए हैं, यह सत्य न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है?
पेड़ गिर गया
भारत का न्याय बिक चुका है। न्याय सिर्फ कानून का विषय नहीं है। वह इंसानियत, लोकतंत्र और सत्य की आत्मा है। न्यायालय के साथ खड़ा होना मतलब भविष्य के साथ खड़ा होना यह विचार अब खत्म हो चुका है। भारत में नैतिकता का पेड़ पूरी तरह गिर चुका है। उस पेड़ के नीचे लोकतंत्र के सभी स्तंभ कुचल गए हैं। ऐसा न होता तो महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री शिंदे चोरी का माल लेकर दिल्ली की सड़कों पर खुलेआम न घूमते और उसी चोरी के माल की भेंट गृहमंत्री अमित शाह को न देते। सोमवार रात को शिवसेना से तोड़े गए ६ सांसदों का चोरी का माल लेकर शिंदे अमित शाह के दरबार में हाजिर हुए और चोरी का वह माल अमित शाह को पेश कर दिया। चोरी करने वाले और चोरी का माल खरीदने वालों की सांठगांठ राजनीति में हो गई है और देश की अदालतें इस पर चुप हैं। इन दो विषयों पर ‘सुओ मोटो’ से संज्ञान लेना चाहिए, यह बात सुप्रीम कोर्ट को नहीं सूझ रही।
पहला यानी Neet परीक्षा पेपर लीक मामले में सोनम वांगचुक द्वारा शुरू किया गया अनशन। यह स्तंभ जब प्रकाशित होगा तब उनके अनशन का २१वां दिन होगा और उनकी तबीयत पहले ही बहुत खराब हो चुकी है। सोनम वांगचुक के अनशन का संज्ञान लेना चाहिए, ऐसा दिल्ली में बैठे सर्वोच्च न्यायालय को नहीं लगता, इस पर आश्चर्य होता है। वांगचुक का अनशन देश के लाखों छात्रों के भविष्य के लिए है। न्यायाधीशों के बच्चे भी जज या सरकारी वकील बन जाते हैं। वे किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठते ही नहीं। इसलिए सोनम वांगचुक के अनशन की आंच न्यायालय के परिवारों तक नहीं पहुंचती। न्यायालय को वांगचुक के अनशन का संज्ञान लेना चाहिए और सरकार को आदेश देना चाहिए, कम से कम इतना तो करें। दूसरा महत्वपूर्ण विषय जिस पर सुप्रीम कोर्ट को ध्यान देना चाहिए वह है अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान की चोरी। श्रीराम की आंखों के सामने दानपेटियां चोरी हुईं यह देश के करोड़ों श्रद्धालुओं के साथ विश्वासघात है। पिछले १५ वर्षों में श्रीराम के नाम पर हजारों करोड़ रुपए इकट्ठे किए गए। उसका कोई हिसाब नहीं। संघ परिवार की चंपत राय गैंग ने अयोध्या के कई मंदिरों पर कब्जा किया और उसमें करोड़ों का लेन-देन किया। ‘फकीरे राम मंदिर’ कैसे बेचा गया, यह संतोष दुबे से सुनना चाहिए। जिस सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राम मंदिर बना, बाधाएं दूर हुईं, उसी राम मंदिर में हुई डवैâती का संज्ञान ‘सुओ मोटो’ से लिया जाए, ऐसा कोर्ट को सोचना चाहिए। श्रीराम की कृपा से आज जैसे सरकार चल रही है, वैसे ही राम भरोसे न्यायालय भी चल रहा है। कानून, संविधान से तो कुछ चल ही नहीं रहा। गैरकानूनी काम करने वालों को संरक्षण देना ही अब न्यायालयों का काम रह गया है। ऐसा न होता तो शिंदे चोरी का माल लेकर दिल्ली न उतरते और देश के गृहमंत्री से मिलने की हिम्मत न करते। मनमोहन सिंह मौनी बाबा हैं, ऐसा मजाक उड़ाकर प्रधानमंत्री मोदी और उनकी भाजपा सत्ता में आई। लेकिन जब देश की स्वतंत्रता, संप्रभुता, स्वाभिमान और संविधान संकट में आए, तब डॉ. मनमोहन सिंह बोले थे। इसका एक उदाहरण भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी ने दिया। कुरैशी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के २०१२ के विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने मुस्लिम आरक्षण को लेकर एक घोषणा की थी। सत्ता में आने पर नौकरियों में मुस्लिमों का आरक्षण ४.५ प्रतिशत से बढ़ाकर ९ प्रतिशत किया जाएगा, ऐसा खुर्शीद ने एक प्रचार सभा में कहा। भाजपा ने इसके खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत की। यह आचार संहिता का उल्लंघन है, ऐसा भाजपा ने कहा। आयोग ने इस शिकायत पर चार दिन सुनवाई की और आखिर में सलमान खुर्शीद को फटकार लगाई। आयोग की इस भूमिका से नाराज कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग की आलोचना की। (खुर्शीद ने मुस्लिम हित की बात रखी, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी ने खुद मुसलमान होते हुए भी उन्होंने खुर्शीद को फटकारा।)
जैसे ही चुनाव आयोग की आलोचना शुरू हुई, मनमोहन सिंह ने कुरैशी को मिलने बुलाया और कहा, ‘‘आप पर हो रही आलोचना से मैं व्यथित हूं। चुनाव आयोग हमारी लोकतंत्र की आत्मा है। अगर हमने उसी को खो दिया तो सब कुछ खो जाएगा।’’ मनमोहन सिंह संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करते थे। आज का चुनाव आयोग बहरा हो चुका है। मोदी का अंधभक्त बनकर बैठा है। बिहार, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सरकारी पैसे का इस्तेमाल कर महिलाओं के वोट खरीदे गए। मतदान के दिन तक महिलाओं के खातों में पैसे जा रहे थे। न चुनाव आयोग ने इसकी शिकायत ली, न सुप्रीम कोर्ट ने। इसीलिए शिंदे जैसे लोग चोरी का माल लेकर गृहमंत्री के घर जा रहे हैं।
किसी को क्या?
प्रेस की स्वतंत्रता, पर्यावरण, भ्रष्टाचार के मामले में भारत का ‘इंडेक्स’ वैश्विक स्तर पर गिर गया है। अर्थव्यवस्था मर चुकी है, लेकिन भारत का न्याय भी गिरता जा रहा है। सोनम वांगचुक के रूप में सत्य और ईमानदारी दिल्ली के ‘जंतर मंतर’ पर कमजोर होकर पड़ी है। अयोध्या में तो श्रीराम की पादुकाएं और सीता मैया के आभूषण भी चोरी हो गए। श्रीराम ने व्यक्तिगत भावनाओं से ज्यादा प्रजा के न्याय और लोकभावना को महत्व दिया। श्रीराम ने व्यक्तिगत संपत्ति नहीं बनाई। वह रामराज्य जनता का था। आज अयोध्या में चोर हैं। दिल्ली में शिंदे चोरी का माल लेकर घूम रहे हैं। कानून कहां है? कोर्ट में महिला न्याय के लिए चीख रही है और मुख्य न्यायाधीश अगली तारीख देकर चले गए।
शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना चोरी हो गई। श्रीराम का सत्व चोरी हो गया…
इसकी किसको परवाह है?
