मुख्यपृष्ठस्तंभअंदर की बात : बाबा नहीं, नोटों का व्यापारी!

अंदर की बात : बाबा नहीं, नोटों का व्यापारी!

राजन पारकर

जब भगवान का नाम कारोबार बन जाए, तब मंदिर नहीं, तिजोरी सबसे बड़ा तीर्थ बन जाती है। सूत्रों के अनुसार, तीन हजार पन्नों का आरोपपत्र केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस अंधविश्वास पर आरोपपत्र है, जिसने विवेक को गिरवी रख दिया। चर्चा है कि श्रद्धा की दुकान में आस्था कम और नोटों की गिनती अधिक होती रही। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में कानाफूसी है कि यदि जांच की यही गति पहले दिखाई जाती, तो कथित रूप से करोड़ों रुपये और सैकड़ों बैंक खातों का जाल इतना विशाल ही नहीं बन पाता। सवाल केवल एक स्वयंभू बाबा का नहीं है, बल्कि उन व्यवस्थाओं का भी है जिनकी आंखों के सामने कथित साम्राज्य खड़ा होता रहा। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि समाज की नैतिक चेतना पर भी गहरा प्रहार माना जाएगा।
सत्ता, साधु, सियासत और सड़क …जवाबदेही आखिर किसकी?
राजनीतिक गलियारों में सत्ता, प्रशासन और लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर करोड़ों की कथित मनी लॉन्ड्रिंग और महिलाओं के शोषण के आरोपों में घिरे स्वयंभू बाबा का मामला है, दूसरी ओर राष्ट्रवादी कांग्रेस के संभावित विलय को लेकर बंद कमरों में चल रही राजनीतिक शतरंज, और तीसरी ओर लोकतांत्रिक विरोध की आवाजों पर प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर उठता असंतोष। सूत्रों के अनुसार, इन तीनों घटनाओं का संदेश एक ही है कि सत्ता चाहे धार्मिक हो, राजनीतिक हो या प्रशासनिक, जब जवाबदेही कमजोर पड़ती है तो लोकतंत्र सवाल पूछना शुरू कर देता है।
विलय नहीं, विरासत की लड़ाई!
राजनीति में सिद्धांत अक्सर मंच पर दिखाई देते हैं और असली समीकरण बंद कमरों में तय होते हैं। सूत्रों के अनुसार, दोनों राष्ट्रवादी दलों के संभावित विलय को लेकर जितनी चर्चा बाहर है, उससे कहीं अधिक बेचैनी भीतर बताई जा रही है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि असली लड़ाई विचारधारा की नहीं बल्कि नेतृत्व और नियंत्रण की है। कहा जा रहा है कि सत्ता के समीकरण बदलते हैं तो रिश्तों की परिभाषा भी बदल जाती है। कल तक जो प्रतिद्वंद्वी थे, वे आज संभावित सहयोगी बताए जा रहे हैं। लेकिन चर्चा यह भी है कि परिवार के भीतर की असहमति किसी भी राजनीतिक गणित को उलट सकती है। राजनीति का पुराना नियम आज भी कायम है, दल का विलय आसान है, लेकिन महत्वाकांक्षाओं का विलय सबसे कठिन होता है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह कब से हो गया?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत विरोध की आवाज होती है। यदि वही आवाज प्रशासनिक शक्ति के सामने कमजोर पड़ने लगे, तो चिंता स्वाभाविक है। सूत्रों के अनुसार, जंतर-मंतर की घटनाओं ने केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन की कार्यशैली पर भी बहस छेड़ दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विरोध को नियंत्रित करने और विरोध को सुनने, इन दोनों के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। यदि किसी आंदोलनकारी के साथ हुई कार्रवाई पर न्यायालय, विपक्ष और नागरिक समाज एक साथ प्रश्न उठा रहे हों, तो सरकार के लिए केवल कानूनी जवाब पर्याप्त नहीं होता; लोकतांत्रिक संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक होती है। लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं होती, बल्कि वही उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। इन तीनों घटनाओं का निष्कर्ष अलग-अलग नहीं है। कहीं आस्था के नाम पर कथित आर्थिक साम्राज्य पर सवाल हैं, कहीं सत्ता के गलियारों में राजनीतिक विरासत की खींचतान है और कहीं लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार पर बहस है। सत्ता का रंग चाहे भगवा हो, हरा हो, नीला हो या सफेद, लेकिन लोकतंत्र की स्याही हमेशा काली होती है और इतिहास उसी स्याही से लिखा जाता है जो सत्ता और सच से डरती नहीं।

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