मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष : संविधान और लोकतंत्र पर हावी तानाशाही

विशेष : संविधान और लोकतंत्र पर हावी तानाशाही

पं. प्रेम बरेलवी

भारत में जातीयता और धर्मों के आधार पर भेदभाव, ईर्ष्या और हमला करने की प्रवृत्ति पूरे देश को बर्बाद कर रही है। अपनी स्नातकोत्तर की शिक्षा के दौरान एक बार जब मैंने अपने बड़े गुरुजी डॉ. उमाकांत शर्मा जी से प्रश्न किया कि क्या जातिवाद सही है? तो उन्होंने दो टूक कहा कि जातिवाद मानसिक दिवालियापन के सिवाय कुछ नहीं है। यह वो विष है, जो लोगों के दिमाग में भरा हुआ है। आत्म-स्वाध्याय से यह कहना उचित प्रतीत होता है कि जातिवाद लोगों के दिमाग का कैंसर है, जो भारतीयों के उत्थान की राह में सबसे खतरनाक रोड़े की तरह है। इसी तरह धर्मवाद भी मन का कोढ़ है, जो भारतीयों को एक-दूसरे से वैमनस्य करने के लिए प्रेरित करता है। क्षेत्रवाद और भाषावाद भी खतरनाक बीमारियां ही हैं। यह अच्छा है कि कुछ भारतीय इन खतरनाक बीमारियों की चपेट से बचे हुए हैं। लेकिन पिछले एक दशक से जिस तेजी से इन दोनों खतरनाक बीमारियों ने लोगों के दिल-ओ-दिमाग में पैâलना शुरू किया है, उसका असर हत्या, बलात्कार, लूट, अराजकता, कट्टरता और आरोप-प्रत्यारोप के रूप में दिख रहा है। जातीय और धार्मिक हिंसा के मामले बढ़ते जा रहे हैं।
दिवास्वप्न!
यह भारतीयों के आपसी भेदभाव का ही नतीजा रहा है कि लगभग २,००० वर्ष तक भारत लुटा है और आज भी लुट रहा है। इतिहास गवाह है कि पूरे संसार में भारत जैसी संसाधनों से भरपूर पुण्य-भूमि और कहीं नहीं है। लेकिन भारतीयों ने आपसी भेदभाव और ईर्ष्या के चलते अपनी ही तरक्की के सारे रास्ते बंद कर रखे हैं। भारतीयों को पड़ोसी से ईर्ष्या और परदेशियों की आवभगत करने की आदत पड़ी हुई है। अपना ही कोई भाई आगे न निकल जाए, यह सोच बड़ी बेशर्मी से ज्यादातर भारतीयों को एक-दूसरे की टांग खींचने के लिए प्रेरित करती है। इस देश की यह पीड़ा भी है और विडंबना भी। मौर्य-काल तक सोने की चिड़िया रहा यह भारत आज कर्ज और भूख की चिड़िया बनता जा रहा है। हालात ये हैं कि आज एक कुपोषित बच्चे की तरह भारतीय मुद्रा लगातार कमजोर होती जा रही है। अच्छे दिन, अमृत-काल का दिवास्वप्न सिर्फ दिल बहलाने के लिए अच्छा है। पूरे देश में लगभग ४२,०० जातियां और इससे लगभग १० गुनी उपजातियां देश को जंगल बनाए हुए हैं, जहां चंद तथाकथित मजबूत जातियां खूंखार जानवरों की तरह अपने से कमजोर तथाकथित जातियों का खून पीने के लिए उतावली रहती हैं। आज समझ में आता है कि भारत आसानी से बार-बार ग़ुलाम क्यों होता रहा है।
हालांकि इसमें कोई दो-राय नहीं कि इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार सत्ता के मद में डूबी आज की विषैली राजनीति है, जो सिर्फ और सिर्फ धन, ताकत और मानव-लाशों की भूखी दिखाई देती है। चंद चालाक और धूर्त लोग खुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए ही जातिवाद और धर्मवाद में अलगाव और झगड़ा पैदा करने के लिए पहले से ही जल रही भेदभाव के तिनकों से बनी बस्तियों में चिंगारी फेंकते रहते हैं। अपने स्वार्थ साधने के लिए किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार ये तथाकथित राजनीतिक लोग अपनी जनता और देश, दोनों के लिए परमाणु बम की तरह घातक नजर आते हैं। अपराध करके भी सुरक्षा घेरे में रहने वाले ये पापी किसी के सगे नहीं हैं। हालात ये हैं कि महत्वपूर्ण पदों पर आसीन नेता कुछ भी अनर्गल बोल देते हैं। कुछ नेता तो गाली-गलौज करने और अपमान करने से लेकर हाथापाई करने तक से नहीं चूकते। अब तो संसद में ही अभद्रता का प्रदर्शन होने लगा है। हैरानी की बात यह है कि जो जनप्रतिनिधि पद और भाषा की गरिमा को आए दिन तार-तार करते रहते हैं, वे जनता से अपेक्षा करते हैं कि जनता उन्हें बिना चूं-चां किए हर बार चुनकर अपना अगुवा बनाए और उनका सम्मान करे।
तानाशाही
आज देश में कहीं पुलिस किसी को पीटती दिख जाती है, तो कहीं कुछ अपराधी खुलेआम अपराध करते दिख जाते हैं। ज्यादातर न्यायाधीश कानों में तेल डालकर बैठे हैं। जो न्याय दंड उठाते हैं, उनकी तरफ सरकारी आंखें तरेरी जाती हैं। आंदोलनों का कोई मूल्य नहीं है, उन्हें कुचलने के लिए अनैतिक रूप से पुलिस का डंडा बरस पड़ता है। कभी-कभी लगता है कि अपनी ही जन्मभूमि पर दूसरों का अधिकार हो गया है। सत्तारूढ़ लोग देश के नागरिकों का विरोध सहने के लिए कतई तैयार नहीं हैं। दबे-कुचलों और पीड़ितों की बात सुनने को तैयार नहीं हैं। जो रास्ते में आता है, उसे रास्ते के कांटे की तरह बाहर फेंक दिया जाता है या नष्ट कर दिया जाता है। राजनीतिक स्वार्थ की चक्की में हर वह आदमी पीसा जा रहा है, जो अपने अधिकारों और न्याय की बात कर रहा है। बड़े-बड़े अधिकारियों की मौत आत्महत्या का एक नाटक बन गई है, जिसमें जांच रिपोर्ट कभी सीधे और न्यायिक तौर पर सामने नहीं आती।
उन्माद
अगर भारतीयों को भारत से तनिक भी प्यार है और देश के साथ-साथ अपनी तरक्की की लालसा है, तो सभी तरह के जातिगत और धर्मगत भेदभाव छोड़कर आपस में एकजुट होना होगा। सदियों की घृणा और ईर्ष्या का नतीजा यह है कि आम भारतीय राजनीतिक इस्तेमाल की वस्तु बनकर रह गए हैं। अफसोस की बात यह है कि अपने दंभ के नतीजे भुगत रहे इस देश के लोग आज भी अपने उन्माद में डूबे हुए पड़ोसी या विजातीय व्यक्ति की हानि होने पर खुश होते हैं। पीड़ितों के लिए आवाज भी लोग जाति और धर्म देखकर उठाते हैं। यही वजह है कि किसी को भी न्याय नहीं मिलता।
हरियाणा में दो अधिकारियों की कथित आत्महत्या में भी अब जातिवाद आड़े आ गया है और इन अधिकारियों की कथित आत्महत्या के लिए जिम्मेदार लोगों के चेहरे सामने नहीं आ सके हैं। सत्तारूढ़ ताकतवरों के लिए यह बहुत आसान है कि मरे हुए लोगों को ही दोषी ठहरा दो। न न्यायालय में मुकदमा चलेगा और न किसी दोषी को सजा हो सकेगी। कुछ दिन बाद अपराधी सत्ता की किसी संरक्षण वाली कुर्सी पर आसीन हो जाएगा। अगर ऐसा नहीं हो सका, तो सत्ता के संरक्षण में कोई बड़ा पद अवश्य पा लेगा। लेकिन लोगों को आज भी इतनी-सी बात किसी को समझ नहीं आती कि आखिर आपसी भेदभाव की तुच्छ मानसिकता से उन्हें क्या मिलता है? वे आज भी जाति और धर्म के नाम पर लड़ने को तैयार हैं। वसुधैव कुटुम्बकम की सर्वश्रेष्ठ अवधारणा वाले भारत का मान घटा रहे हैं और अपने ही देश में एक रहने को तैयार नहीं हैं। भेदभाव की कुत्सित मानसिकता की विष-बेल को लगातार सींच रहे हैं। क्या ऐसे लोग किसी और गृह से आए हैं?

(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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