विमल मिश्र
तिल का तेल, उड़द की दाल और सिंदूर के साथ बेसन के लड्डू। हनुमान जयंती के बाद हनुमान मंदिरों में नरक चतुर्दशी (काली चौदस) विषद् पूजा के साथ विशेष दिन है। भक्तजनों की लंबी कतारें इस बार भी मुंबई और आस-पास के हनुमान मंदिरों में उमड़ेंगी। महानगर के हनुमान मंदिरों में कई विशेष महिमावान माने जाते हैं।
अलबेला, रोकड़िया, घंटेश्वर और पिकेट रोड के हनुमान मंदिर स्वयंभू हनुमानजी की मूर्ति वाले मंदिरों में वडाला के श्री राम मंदिर के सामने वाले अलबेला हनुमान मंदिर का विशिष्ट स्थान है। सदियों पहले जब सारा इलाका जंगल था, यहां से गुजरते एक राजा को हनुमानजी की यह मूर्ति प्राप्त हुई। इसे लाते हुए एक स्थान पर हनुमानजी अड़ गए। अब पवनसुत बहुत कोशिशों के बावजूद एक सूत भी आगे बढ़ने को तैयार नहीं। लाचार राजा ने इसे ही प्रभु की इच्छा मान वहीं उनका मंदिर बना दिया। इस मंदिर का इतिहास १५वीं शताब्दी जितना या उससे भी प्राचीन माना जाता है। इस लिहाज से यह सामने के श्रीराम मंदिर से भी अधिक पुराना है, जो मुंबई का सबसे प्रसिद्ध राम मंदिर है। आपाद मस्तक सिंदूर से लदे, मूंछधारी प्रतिमा का मुख भाग श्याम है। भगवान श्रीराम, जानकी, लक्ष्मण और गणेशजी सहित अन्य देवी-देवताओं की भी प्रतिमाएं हैं और दीवारों पर भगवान की विभिन्न लीलाओं के चित्र सुशोभित हैं। इसी नाम का एक मंदिर परेल शिवड़ी में भी है।
कालबादेवी के पास पिकेट रोड का १५६ वर्ष से अधिक प्राचीन श्री हनुमान मंदिर दक्षिण मुंबई का सबसे प्रसिद्ध हनुमान मंदिर है। मथुराजी से आए पिकेट रोड के हुनमानजी दक्षिणाभिमुख हैं और सामान्य धारणा के विपरीत स्वयंभू नहीं हैं। प्रतिमा की उम्र करीब ३०० वर्ष बताई जाती है। हर हनुमान मंदिर की तरह पिकेट रोड के हनुमान मंदिर में भी भक्तों की लाइन मंगलवार और शनिवार को सबसे लंबी होती है। इन विशेष दिनों और पूर्णिमा पर यहां सिंदूर, चांदी के वर्क और हिना के इत्र आदि का विशेष शृंगार होता है।
१९३५ में कड़िया समाज के लोगों द्वारा स्थापित विलेपार्ले के रोकड़िया हनुमान ‘रोकड़िया’ क्यों कहलाए, इसके पीछे एक रोचक कहानी है। यहां आनेवाले कई भक्त आर्थिक समस्याओं से पीड़ित थे। यहां पुजारी की भूमिका निभाने वाले संत जयनारायण गिरी ने उन्हें सलाह दी कि ११ सप्ताह नियमपूर्वक पवनसुत की पूजा करो तो तुम्हें रोकड़े की समस्या नहीं रहेगी। ऐसा ही हुआ और भक्त उन्हें ‘रोकड़िया हनुमान’ कहकर पुकारने लगे। आज यहां हनुमानजी के साथ कई और भगवान विराजे हैं।
खार (प.) में स्टेशन से मुश्किल से दस मिनट की दूरी पर मधु पार्क के पास केवल ७० फुट क्षेत्र में सिमटा करीब ८० वर्ष पुराना श्री घंटेश्वर हनुमान मंदिर घंटे और घंटियों से भरा पड़ा है, जिनमें कुछ तो सौ किलो से अधिक वजनी हैं। यहां कितने घंटे हैं उनकी गिनती नहीं, पर कुछ लोग इनकी तादाद ढाई लाख से अधिक बताते हैं – यहां पूरी हुई मनौतियों के बराबर या उनसे ज्यादा भी। पुजारी तुकाराम राहाटे बताते हैं, ‘हर सप्ताह ३०० से अधिक घंटे-घंटियां जुड़ जाती हैं।’ १९४५ में हनुमानजी की यह प्रतिमा पीपल के एक पेड़ के नीचे होती थी। तुकाराम के पिता सखाराम तब सामने की इमारत में माली का काम करते हुए इस छोटे से मंदिर की साफ-सफाई और पूजा-पाठ कर देते थे। एक दिन मनोकामना पूर्ण होने पर एक भक्त यहां घंटी बांधकर चला गया। बस, यह सिलसिला तभी से चला आ रहा है। १९६० से इसकी देखभाल एक ट्रस्ट के जिम्मे है।
अन्य महिमावान मंदिर
शहर में ऐसे कई और महिमावान हनुमान मंदिर हैं। कबूतरखाना स्थित हनुमान मंदिर दादर ही नहीं, मुंबई के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से है, जिसके परिसर में स्थित मस्जिद और चर्च मुंबई के सर्वधर्म सद््भाव की अनुपम मिसाल हैं। स्टेशन के बाहर वाला मंदिर और बाल हनुमान मंदिर दादर के अन्य प्रमुख हनुमान मंदिर हैं। भायखला में स्वयंभू श्री हनुमान मंदिर, मोती मस्जिद और ग्लोरिया चर्च एक-दूसरे के बिलकुल पास और सामने हैं। (पूर्व) महामार्ग स्थित अत्यंत प्राचीन हनुमान टेकड़ी मंदिर सिद्ध मठ माना जाता है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसमें बर्बरीक सहित महाभारत युग के कई योद्धाओं ने उपासना की थी। यह मंदिर कभी १२ एकड़ क्षेत्र में पैâला हुआ था। १९६५ में इसका बड़ा हिस्सा पश्चिमी महामार्ग की भेंट चढ़ गया।
लिंक रोड, मालाड में सौ वर्ष से अधिक प्राचीन श्री सोन्या हनुमान मंदिर, हाइवे हनुमान मंदिर और गोरेगांव स्पोर्ट्स क्लब और इनआर्बिट मॉल के पास श्री इच्छापूर्ति हनुमान मंदिर की भी अच्छी प्रतिष्ठा है। अन्य मंदिरों में मुलुंड (प.) स्टेशन के बाहर का हनुमान मंदिर, सीप्झ, अंधेरी स्थित पंच देव इच्छापूर्ति हनुमान मंदिर, कांदिवली का जय बजरंगबली मंदिर और साने गुरुजी रोड, काजूपाडा (साकीनाका) का हनुमान मंदिर, सात रास्ता (भायखला) का संकट मोचन हनुमान मंदिर प्रमुख हैं। विलेपार्ले (पूर्व) और वीरा देसाई इंडस्ट्रीयल इस्टेट स्थित की तो सड़कों के नाम ही यहां के हनुमान मंदिर के नाम पर हैं।
‘रामायण’ के सुरसा प्रकरण की याद दिलाता नेरूल के एसआईईएस परिसर में (नई मुंबई) ३३ फुट ऊंचा ‘विश्वरूप आंजनेय’ भारत के इस इलाके में अपनी तरह का अपना मंदिर है। छह फुट ऊंचे कमल आसन पर विराजमान इस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा कांची मठ के शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वती ने ९ फरवरी, २००० को की थी। एक ही प्रस्तर खंड से बनी यह देश में सबसे ऊंची हनुमानजी की प्रतिमा बताई जाती है। नेरूल का दंड मारुति जागृत हनुमान मंदिर, तुर्भे का श्री दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर और पनवेल का पंचमुखी हनुमान मंदिर भी नई मुंबई के प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में से है। भिवंडी के वरालादेवी मंदिर के पास स्थापित हनुमानजी की मूर्ति तो ५४ फुट ऊंची है। यहां हनुमान दीक्षा पीठ है, जहां हुनमान जयंती से पहले भक्तों को हनुमान दीक्षा की जाती है, जिसके लिए उन्हें यहां नियमपूर्वक ४० दिन रहना पड़ता है।
इगतपुरी में स्टेशन के बिलकुल बाहर दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर (अन्य नाम संकटमोचन हनुमान) को लेकर भी कई किंवदंतियां हैं। दक्षिणमुखी हनुमान- जो विशेष महिमावान माने गए हैं चेंबूर, बांद्रा, खेरवाड़ी, घाटकोपर, आदि स्थानों पर विराजे हैं। कांदिवली के ‘काला हनुमान’ भी दक्षिणाभिमुख हैं।
सभी प्रमुख मंदिरों में विराजे हैं पवनसुत
हनुमानजी इतने प्रतापी देवता हैं कि ज्यादातर मंदिरों में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के साथ पवनसुत की उपस्थिति मिलती है। शहर के सबसे प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर को ही लें। यहां मौजूद हनुमान मंदिर की प्रतिमा १९५२ में एलफिंस्टन रोड के निकट सयानी रोड के विस्तार के दौरान खुदाई में पाई गई थी। सड़क बनाने में लगे मुंबई महानगरपालिका के कर्मचारियों ने उसे पास ही रख दिया और काम में लग गए। जब यह बात सिद्धिविनायक मंदिर के मुख्य पुजारी गोविंद पाठक को पता चली तो वे प्रतिमा को मंदिर में ले आए, अलग से एक मंदिर बनवाया और उसे मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया। मुंबादेवी के मुख्य परिसर में भी हनुमान विराजमान हैं। श्री स्वयंभू पाताली हनुमानजी मंदिर छोटा सही, पर महिमावान है। महालक्ष्मी मंदिर जाते समय उन्हें सिर नवाकर ही जाना पड़ता है। जुहू के हरे राम हरे कृष्ण मंदिर में श्री श्री गौरा-निताई और श्री श्री राधा रासबिहारी के साथ श्री श्री सीता राम-लक्ष्मण हनुमान की प्रतिमाएं भी शोभायमान हैं।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
