विमल मिश्र
मुंबई
देर से आने के बावजूद मानसून के बादल खुल कर नहीं बरस रहे और मुंबई को पानी की आपूर्ति करने वाली सातों झीलों में पानी का स्टाक घटते – घटते आठ प्रतिशत से भी कम बचा है। महानगर में पानी की साधारणत: १० प्रतिशत आम कटौती, जबकि औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठनों पर २० प्रतिशत कटौती जारी है। बोरवेल जैसे भूजल के उपयोग पर बंदिशें हैं और टैंकर माफिया की मनमानियों के बीच लुप्तप्राय जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के प्रयास चल रहे हैं।
अमूमन मानसून मुंबई में ११ जून तक आ जाता है। मानसून पूर्व की वर्षा तो इससे भी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। पर इस साल यह १२ दिन विलंब से आया। १९५१ के बाद यह तीसरा सबसे लेटलतीफ मानसून है। इससे पहले १९८१ में २३ जून और १९७४ में २४ जून को इसका आगमन हुआ था। १९५९, २०१९ और २०२२ – इन तीन वर्षों में इसका पदार्पण इसके भी बाद २५ जून को हुआ। हालांकि लेटलतीफी के बावजूद महानगर में पानी का स्टाक फिर भी २०२४ की तुलना में अभी भी बेहतर है, पर झीलों के जलग्रहण क्षेत्रों में अगर जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो संकट की वैसी ही नौबत आ सकती है, जैसी २००९ में आई थी और उससे पहले १९६६ में।
दंगे जैसे हालात
१९६६ की अनावृष्टि मुंबई के इतिहास के सबसे डरावने दौर में से है, जब पूरे शहर में पानी की कमी को लेकर हाहाकार मच गया था। जून, १८४५ की गर्मियों में भी ऐसी हालत पैदा हुई थी और उसके बाद १८८६ में, जब तानसा नदी का विशाल सरोवर शुरू होने के करीब था। कुछ हजार कुएं शहर के लोगों की प्यास बुझाने में असमर्थ हो गए तो मुंबई की जनता विद्रोह कर सड़कों पर उमड़ पड़ी। १९६६ में तो मानसून में भारी देरी और बारिश न होने से मुंबई को खाली कराने की नौबत आ गई थी। २००९ में मानसून लेट होने पर यह संकट फिर दस्तक देता लगा। ९ जून से १० प्रतिशत कटौती लागू थी, जो बाद में २० प्रतिशत हो गई। बारिश इसके बाद भी मेहरबान नहीं हुई तो नौ जुलाई से कटौती और बढ़ाकर ३० प्रतिशत कर दी गई। मानसून के आगमन के बावजूद यह कटौती एहतियातन १५ प्रतिशत पर कायम रखी गई, जो २०१० की पहली छमाही तक चली।
१९६६ के सूखे के समय मुंबई प्रशासन बेहद कड़े और अप्रत्याशित कदम उठाने को मजबूर हो गया था। लगातार दूसरा साल था, जब मुंबई प्यासी थी। वैतरणा छह फुट, तानसा झील ५.५ फुट और तुलसी दो फुट – शहर को पानी सप्लाई करने वाली मुख्य झीलों का जलस्तर पूरी तरह से खत्म होने के कगार पर पहुंच गया था। शहर की दैनिक पानी की जरूरत १५५७ एमएलडी (मिलियन लीटर) के मुकाबले सप्लाई घटकर सिर्फ ९३० एमएलडी रह गई थी। दो वर्ष की अनावृष्टि से भू-जल का स्तर भी पहले से गिरा हुआ था। हालात इस कदर बिगड़ गए कि महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल पी. वी. चेरियन को ११ जुलाई, १९६६ को एक विशेष अध्यादेश जारी करना पड़ा, जिसने सरकार को घरेलू उपयोग के लिए पानी सुरक्षित रखने के असाधारण अधिकार दे दिए। ४ जुलाई को यह मिकदार जब ९५५ एमएलडी रह गई तो मुंबई महानगरपालिका ने कटौती कर पानी की आपूर्ति सीधे – सीधे आधी कर दी। देश की कारोबारी राजधानी के भारी उद्योगों को पानी की आपूर्ति रोक दी गई, जिससे उन्हें अपने प्लांट और कमर्शियल यूनिट्स बंद करने पड़े। खेती – बाड़ी और बागवानी का काम रुक गया। रेस्त्रां, होटलों, क्लबों, लांड्री, बॉम्बे पोर्ट ट्रस्ट, धीबीघाट और आरे मिल्क कॉलोनी के लिए पानी की भारी राशनिंग कर दी गई। पानी बर्बाद करने वाले नौ बड़े उद्योगों पर पानी टैक्स का २० गुना अधिक जुर्माना लगाया गया।
एक दिन ऐसा भी आया, जब नलों से पानी आना बंद हो गया। ऐसे में बेसब्र नागरिक पानी के हर संभव स्रोत पर टूट पड़े। उन्होंने सड़कों पर लगे फायर हाइड्रेंट्स को भी नहीं छोड़ा। फिर शुरू हुए उपद्रव। महानगरपालिका के कर्मचारियों पर हमले होने लगे। महानगरपालिका को पानी चोरों को पकड़ने के लिए छह विशेष दस्ते बनाने पड़े। इस कार्रवाई के दौरान पुलिस द्वारा ४०० से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया और पानी भरने वाले लगभग ६००० बर्तनों को जब्त कर लिया गाया। हालत यह थी कि शहर की एक पैâक्टरी को लपटों ने घेर लिया तो आग को बुझाने के लिए भी पानी नहीं था।
मुंबई को खाली कराने की नौबत
जुलाई के दूसरे सप्ताह तक तो हालत इतनी पेचीदा हो गई कि महाराष्ट्र मंत्रिमंडल की बैठक में पानी की खपत को कम करने के लिए मुंबई को स्वैच्छिक रूप से खाली कराने के प्रस्ताव पर गंभीरता से चर्चा हुई। विचार किया जाने लगा कि स्थिति नियंत्रण में आने तक शहर के गैर-जरूरी लोगों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को उनके गांवों या दूसरे राज्यों में भेज दिया जाए।
जुलाई का आधा महीने बीतने को आया था, पर इंद्र देवता महानगर पर मेहरबान नहीं हुए थे। इंसानी कोशिशें नाकाम होने पर अब दुआओं का दौर शुरू हुआ। माटुंगा में दक्षिण भारतीय समाज ने चार दिनों तक ‘वरुण जप’ का आयोजन किया। मुंबई आर्चडायसिज के बिशप लांगिनस परेरा के निर्देश पर सभी चर्चों में विशेष प्रार्थना सभाएं और ‘प्रायश्चित जुलूस’ निकाले जाने लगे। बाबुलनाथ मंदिर में विशेष जलाभिषेक जारी ही था कि मूसलधार वृष्टि ने पूरे शहर को भिगोकर आनंद से भर दिया। १५ जुलाई, १९६६ से तो बादलों ने ऐसी झमाझम लगाई कि झीलों के जलग्रहण क्षेत्र पूरी तरह भर गए। सबसे पहले वापस हुआ उद्योगों और शिक्षण संस्थानों को बंद करने का पैâसला। शहर खाली कराने का फैसला लागू करने की नौबत ही नहीं आई।
जलापूर्ति योजनाएं
मुंबई की अपनी कोई नैसर्गिक नदी नहीं है, जो उसकी विशाल आबादी की पानी की जरूरतों को पूरा कर सके। यह काम करती हैं तानसा, मोडक सागर, अपर वैतरणा, मिडिल वैतरणा, भात्सा, विहार और तुलसी – ये सात झीलें, जो अपने अस्तित्व के लिए बारिश पर ही निर्भर हैं। ४३७ वर्ग किलोमीटर में पैâले मुंबई में औसतन २००० एमएम बारिश होती है। इस हिसाब से २३९४ एमएलडी पानी बारिश से मिलता है। इतनी मात्रा में से २० पर्सेंट पानी रेनवॉटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से आसानी से बचाया जा सकता है। मुंबई को प्रतिदिन सप्लाई होने वाले पानी का परिमाण ३३०० एमएलडी है। भातसा और वैतरणा मुंबई को जलापूर्ति करने वाली दो मुख्य प्रणालियां हैं। इनमें भातसा अकेले शहर की ५५ प्रतिशत पानी की जरूरत को पूरा करती है। तानसा और वैतरणा का पानी मुंबई के दक्षिणी हिस्सों को सप्लाई होता है, जबकि बाकी झीलों का पानी उपनगरों के काम में आता है। विहार और तुलसी झीलें पेय जलाआपूर्ति का केवल दो प्रतिशत संभालती हैं।
एक-चौथाई पानी चोरी
पानी की इस समस्या के पीछे आबादी का सघनीकरण बड़ा कारण है। जगह की कमी से हमारी बस्तियां सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर दूर तक पैâल गई हैं। जल सुविधाएं उस हिसाब से हैं नहीं। पुरानी पाइपलाइन बदलकर, लीकेज और चोरी पर काबू पाकर पानी की कमी को काबू में किया जा सकता है। मुंबई में होने वाली पानी सप्लाई का एक-चौथाई या तो चोरी चला जाता है या बेकार हो जाता है और इस्तेमाल का ६० पर्सेंट पानी नालियों के हवाले हुआ जा रहा है। फिजूल हो रहे इस पानी की एक बड़ी मिकदार रीसाइकलिंग करके साफ-सफाई, फ्लशिंग, बागवानी, और वाहन धोने, जैसे कामों में आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है। रेनवॉटर हार्वेस्टिंग पानी की इस बचत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। पर, रीसाइकलिंग और रेनवॉटर हार्वेस्टिंग-इन दोनों ही मोर्चों पर शहर के मौजूदा हालात बहुत आश्वस्त करने वाले नहीं हैं।
