विमल मिश्र
पांडुरंग शास्त्री आठवले ‘दादाजी’ का ‘स्वाध्याय परिवार’ आंदोलन बनकर आज देश के करीब एक लाख गांवों में पहुंच रखता है। विश्व भर में इसके अनुयायियों की संख्या ६० लाख से अधिक है और इसने डेढ़ करोड़ से अधिक लोगों के जीवन पर सार्थक प्रभाव छोड़ा है। ‘स्वाध्याय परिवार’ की नींव है माधवबाग स्थित श्रीमद्भगवद्गीता पाठशाला, जिसने इसी दशहरे के दिन से अपने शताब्दी वर्ष में कदम रखा है।
अनंत खड़पकर भांडुप इंडस्ट्रीयल कॉम्प्लेक्स की एक प्रिंटिंग इकाई में हेड प्रिंटर हैं। हफ्ते में एक खास दिन शाम का एक वक्त उन्होंने सेवा के लिए निर्धारित रखा है। वैâसी भी स्थिति आन पड़े वे ठाणे के तत्वज्ञान विद्यापीठ जरूर जाएंगे, जहां साफ-सफाई और पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी उन्होंने ओढ़ रखी है। खड़पकर ठाणे और अन्य केंद्रों में चलनेवाली भक्ति, आत्मविकास और सामाजिक जागरूकता वाली गतिविधियों के साथ ‘दादाजी’ की मधुर स्मृतियों को आज तक गले लगाकर बैठे हैं गीता के कर्मयोग की जिनकी सरल-सहज सीखें उनकी जिंदगी के आड़े वक्त कई बार काम आई हैं। खड़पकर विश्व भर में पैâले ‘स्वाध्याय परिवार’ के सदस्य हैं।
दार्शनिक, आध्यात्मिक गुरु, समाज सुधारक तथा तत्वचिंतक दादाजी यानी पांडुरंग शास्त्री आठवले इसी स्वाध्याय परिवार के सर्जक थे। १९५४ में मूल वैदिक विचारों और भगवद्गीता से हासिल आत्मज्ञान पर आधारित इस संगठन की शुरुआत करते समय उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन देश के हजारों गांवों में पैâलकर स्वाध्याय आंदोलन बन जाएगा। स्वाध्याय आंदोलन ने जातीय, धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक बाधाओं और धार्मिक विभाजनों से परे आंतरिक ईश्वर और ईश्वर के सार्वभौमिक प्रेम की अपनी अवधारणा से लगभग डेढ़ करोड़ भारतीयों के जीवन को प्रभावित किया है। देश के करीब एक लाख गांवों में इसकी पहुंच है और अनुयायियों की संख्या ६० लाख से अधिक जिनमें एशिया, अमेरिका, यूरोप, कनाडा, पुर्तगाल, मध्य-पूर्व, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अप्रâीका सहित ३५ से अधिक देशों के लोग शामिल हैं।
महानगर में ‘स्वाध्याय’ के दो केंद्र किसी तीर्थस्थल से कम नहीं। सी.पी. टैंक स्थित श्रीमद्भगवद्गीता पाठशाला, जहां आठवले ६१ वर्ष लगातार गीता प्रवचन देते रहे और घोड़बंदर रोड, ठाणे स्थित तत्वज्ञान विद्यापीठ। परिवार के बाल संस्कार केंद्र, त्रिकाल संध्या, बाल, युवा और महिला केंद्र हैं। युवा इकाई ‘युवा शक्ति’ सहित शाखाएं इसकी अलग-अलग जिम्मेदारी संभालतीं हैं। स्वाध्याय कई स्कूल व कॉलेजों का भी संचालन करता है। देश के तमाम गांवों और कस्बों में जिस तरह स्वाध्याय केंद्रों ने दादाजी की स्मृति को अक्षुण्ण रखा है, उसी तरह नेक कामों ने भी।
‘स्वाध्याय’ वैदिक दर्शन पर आधारित प्रक्रिया है और इस परिवार के सदस्य (भाई-बहन) ‘स्वाध्यायी’ कहलाते हैं। ‘स्वाध्याय’ का प्रमुख लक्ष्य है भेदभाव रहित वैश्विक परिवार व समाज और ईश्वर के दिव्य पितृत्व में सार्वभौमिक भाईचारे की स्थापना, आत्मसम्मान कायम रखते और सम्मान की रक्षा करते हुए कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना और धर्मभेद सहित हर तरह का भेद मिटाना।’ दादाजी का मानना था कि यह शरीर, यह घर एक मंदिर है। इसीलिए स्वाध्यायी परिवार प्रेम के साथ रहते हैं और क्रोध, घृणा, भेदभाव और प्रतिशोध की भावना के साथ जातिवाद और सभी दुर्गुण त्यागने का प्रयास करते हुए स्वाभिमान का जीवन जीते हैं।
भक्ति केंद्रित प्रयोग
पांडुरंग शास्त्री आठवले का जन्म १९ अक्टूबर, १९२० को कोकण के रोहा गांव में एक प्रतिष्ठित चितपावन ब्राह्मण कुल में हुआ था। वे संस्कृत शिक्षक बैजनाथ शास्त्री आठवले और उनकी पत्नी पार्वती की पांच संतानों में से एक थे। तपोवन पद्धति से पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ पांडुरंग शास्त्री ने संस्कृत व्याकरण, कानून, वेदांत, साहित्य, हिंदी, मराठी, गुजराती और अंग्रेजी भाषा साहित्य का अध्ययन किया। फोर्ट की एशियाटिक लाइब्रेरी ने उनकी ज्ञान संपदा को और बढ़ाया। १९४२ में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता पाठशाला में प्रवचन देना शुरू किया, जिसकी स्थापना उनके पिता ने ही १६ अक्टूबर, १९२६ को दशहरे के दिन की थी। बैजनाथ जी संस्कृत की शिक्षा के लिए एक विद्यालय कायम करना चाहते थे, जो श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित हो और जहां वेद-वेदांत पर अपने व्याख्यान दे सकें। जब वे भूलेश्वर के माधवबाग में लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास आए तो उन्हें नाचते हुए एक मोर के दर्शन हुए। इसे ईश्वरीय प्रेरणा मानते हुए उन्होंने इसी स्थान पर यह पाठशाला कायम की। इस तरह से यह श्रीमद्भगवद्गीता पाठशाला का शताब्दी वर्ष है। पिता ने रुग्णता के कारण १९४२ में पाठशाला की कमान पुत्र को सौंप दी। यही स्वाध्याय परिवार की नींव का पत्थर बनी। अपने विचारों से इस पाठशाला की देश के १४ से अधिक राज्यों और अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड, यूरोप, अप्रâीका और कई खाड़ी देशों में उपस्थिति है। दादाजी ने पैदल और किराये की साइकिल से हजारों गांवों का दौरा किया। घर-घर जाकर गीता के संदेश को फैलाया। इन गांवों में उन्होंने ईश्वर-केंद्रित भक्ति के माध्यम से सामाजिक कार्य करने के लिए विभिन्न प्रयोग शुरू किए, जिनमें सामूहिक, दिव्य श्रम (भक्ति) की भावना से सहकारी खेत्ाी, मछली पकड़ना और वृक्षारोपण परियोजनाएं शामिल थीं। समुद्र के किनारे बसे मछुआरों की जिंदगी को सुधारने जैसे उनके कामों का तो आज भी कोई सानी ही नहीं है।
विभेद रहित समाज का प्रयास
पांडुरंग शास्त्री आठवले ने गीता के कर्मदर्शन के प्रेरित होकर भक्ति के माध्यम से एक ‘क्रांति’ रची और मनुष्य के मन को बदलकर समाज में समानता लाने का प्रयास किया। इस तरह उन्होंने महात्मा फुले की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गांधीजी की ‘स्वराज’ कल्पना को साकार किया।’ धर्म के क्षेत्र में उन्नति और सामुदायिक नेतृत्व के लिए ‘पद्म विभूषण’, महात्मा गांधी पुरस्कार, लोकमान्य तिलक पुरस्कार सरीखे शीर्ष देशी पुरस्कारों के साथ उन्हें टेम्पल्टन और मैग्सेसे सरीखे शीर्ष अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और रॉयल एशियाटिक सोसायटी, मुंबई की मानद सदस्यता से भी सम्मानित किया गया। २५ अक्टूबर, २००३ को ८३ वर्ष की आयु में मुंबई में दिल का दौरा पड़ने के बाद उन्होंने देह त्याग कर दिया। उनके बाद यह जिम्मेदारी उनकी पत्नी आदरणीय ताई (निर्मला ताई पांडुरंग आठवले) ने संभाली। ३१ जनवरी, २०१७ को ९० वर्ष की आयु में उनके निधन के बाद आज उनकी बेटी जयश्री आठवले तलवलकर – जिन्हें ‘आदरणीय दीदी’ और दामाद रावसाहब (श्रीनिवास तलवलकर) के नाम से जाना जाता है – इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। गुजराती, मराठी, हिंदी और संस्कृत जैसी कई भाषाओं में दादाजी की कई प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। श्याम बेनेगल ने उन पर ‘अंतर्नाद’ फिल्म बनाई है। पूरा देश उनका जन्मदिन ‘मनुष्य गौरव दिन’ के रूप में मनाता है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
