-चीन की ‘स्मार्ट’ जासूसी उड़े अमेरिका के होश!
मनमोहन सिंह
सोचिए, आपने सालों मेहनत की, अरबों रुपए पानी की तरह बहाए, रात-दिन एक करके दुनिया का सबसे धांसू आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल तैयार किया। और अचानक बगल से ‘ड्रैगन’ मुस्कुराते हुए निकले और कहे, ‘थैंक यू भाई, अब ये मेरा हुआ!’
कुछ ऐसा ही तगड़ा झटका इस वक्त अमेरिका को लग रहा है। वॉशिंगटन के गलियारों में आजकल खलबली मची है क्योंकि अमेरिकी सीनेटरों की नींद चीन की ‘स्मार्ट’ जासूसी ने उड़ा रखी है। मामला सिर्फ नॉर्मल तांक-झांक का नहीं है, बल्कि अमेरिका के सबसे लाडले ‘एआई सीक्रेट्स’ को उड़ाने का है।
डिस्टिलेशन अटैक: बिना मेहनत, सब कुछ सेट!
हाउस सेलेक्ट कमेटी की सुनवाई में जो खुलासे हुए, वो किसी हॉलीवुड सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं हैं। पता चला है कि चीनी टेक दिग्गज, जैसे अलीबाबा, ने अमेरिकी एआई कंपनी ‘एंथ्रोपिक’ पर ‘डिस्टिलेशन अटैक’ बोल दिया।
अब आप सोचेंगे ये क्या बला है? आसान भाषा में कहें तो यह तकनीक की दुनिया का ‘शॉर्टकट’ है।
अमेरिका की मेहनत: सालों की रिसर्च, महंगे सर्वर्स और अरबों डॉलर का निवेश।
चीन का जुगाड़: डिस्टिलेशन अटैक के जरिए उस महंगे एआई मॉडल के डेटा को निचोड़ो, आसान बनाओ और बहुत कम लागत में उसका ‘क्लोन’ तैयार कर लो!
इसे कहते हैं बिना परीक्षा दिए सीधे टॉपर की मार्कशीट पर अपना नाम लिख लेना। इस ‘लीपफ्रॉग’ यानी लंबी छलांग स्टाइल से चीन सालों की मेहनत को मिनटों में ‘बायपास’ कर रहा है।
कॉर्पोरेट से लेकर कॉलेज तक… सब रडार पर!
डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी के पूर्व कार्यवाहक निदेशक डेविड शेड की मानें, तो बीजिंग ने इसके लिए पूरा एक ‘सिस्टम’ सेट कर रखा है। इसमें सिर्फ हैकर्स ही नहीं हैं, बल्कि साइबर ऑपरेशन (कंप्यूटर में सेंधमारी), ह्यूमन इंटेलिजेंस (जासूस), एकेडमिक पार्टनरशिप (यूनिवर्सिटी के जरिए एंट्री) और कमर्शियल इन्वेस्टमेंट (पैसा लगाओ, राज पाओ) भी शामिल हैं।
यानी अमेरिकी प्रोफेसर हों, टेक कंपनियां हों या फिर क्वांटम कंप्यूटिंग और बायोटेक्नोलॉजी के रिसर्चर, ड्रैगन की नजरों से कोई नहीं बच पा रहा है। अमेरिका जिसे अपनी तकनीक का ‘क्राउन ज्वेल’ यानी राजमुकुट समझता है, चीन उसे ही उड़ाने के चक्कर में है।
अमेरिकी एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर इस चोरी को रोकना है, तो तुरंत ‘टिकटॉक’ जैसे प्लेटफॉर्म्स पर शिकंजा कसना होगा ताकि डेटा का फ्लो रुके। कुल मिलाकर, सुपरपावर बनने की इस रेस में अब असली लड़ाई मिसाइलों की नहीं, बल्कि एआई और कोडिंग की है। अब देखना यह है कि अमेरिका अपने इस ‘डिजिटल खजाने’ पर कितना मजबूत ताला लगा पाता है!
