मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: अंधभक्ति के शोर में दब गई विदेश नीति की समझ!

रुख-ए-सियासत: अंधभक्ति के शोर में दब गई विदेश नीति की समझ!

तौसीफ कुरैशी

-इतिहास हमेशा उन देशों को दंडित करता है जो बदलती दुनिया को समय रहते पहचान नहीं पाते। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही है।

दोस्तों, आपसे आज कुछ ऐसे अनछुए विषय पर चर्चा करेंगे, जिन विषयों पर अधिकतर चर्चा नहीं की जाती है। बात है सच की। सच्चाई से भागना, हमने अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया, जिसका फायदा मक्कारों के काम आ रहा है। दुनिया की राजनीति में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो पहली नजर में मामूली लगती हैं, लेकिन उनके भीतर इतिहास का पहिया घूम रहा होता है। जर्मनी से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का फैसला भी ऐसी ही घटना है। खबर यह है कि अमेरिका ने जर्मनी से लगभग ५,००० सैनिक वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह संख्या भले ही कुल अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का एक हिस्सा हो, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश कहीं बड़ा है। नाटो की कहानी हमेशा केवल सैन्य गठबंधन की कहानी नहीं रही। यह अमेरिका के नेतृत्व वाली उस विश्व व्यवस्था का प्रतीक था, जिसमें यूरोप सुरक्षा के लिए वॉशिंगटन की ओर देखता था और वॉशिंगटन बदले में पश्चिमी दुनिया का नेतृत्व करता था। लेकिन समय बदल रहा है। अमेरिका में यह सवाल अब खुलकर पूछा जा रहा है कि आखिर यूरोप की सुरक्षा का बोझ अमेरिकी करदाता कब तक उठाएगा। यूरोपीय देशों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग वर्षों से की जा रही है और इस मुद्दे पर तनाव लगातार बढ़ा है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि नाटो टूट गया है या नहीं टूटेगा, लेकिन हालात इसी ओर इशारा कर रहे हैं। नाटो अभी भी अस्तित्व में तो है, लेकिन अंतिम सांसे गिनने जैसी स्थिति नजर आ रही है। कहने को उसके सदस्य देश साथ हैं और उसकी संस्थाएं काम कर रही हैं, लेकिन अंदर ही अंदर सब दरक रहा है। क्योंकि गठबंधन के भीतर भरोसे की पुरानी चमक फीकी पड़ रही है। उसके कई इशारे हैं, जो यह संकेत दे रहे हैं। अमेरिका और यूरोप के बीच जो वैचारिक तथा रणनीतिक दूरी बढ़ रही है, वह आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगी।
यहीं से भारत की चिंता शुरू होती है। दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है। पुराने गठबंधन ढीले पड़ रहे हैं और नए समीकरण बन रहे हैं। पश्चिम एशिया से लेकर हिंद महासागर तक नए सुरक्षा ढांचों की चर्चा है। ऐसे समय में भारत को भावनाओं पर नहीं, तथ्यों के आधार पर अपनी विदेश नीति बनानी होगी। किसी भी महाशक्ति के प्रति अंधभक्ति या अंधविरोध दोनों नुकसानदेह हैं। दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहां जब से संघ का हस्तक्षेप बढ़ा है, तब से हमारी विदेश नीति का मटियामेट हुआ है। यह बात समझने के बाद भी नहीं जाग रहे हैं और इसका खामियाजा देश भुगत रहा है। भू-राजनीति का गंभीर विमर्श अक्सर नारेबाजी में बदल जाता है या बदल दिया जाता है। सोशल मीडिया और व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी ने जटिल अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं को भी समर्थक और विरोधी खेमों की बहस में बदल दिया है। परिणाम यह है कि हम घटनाओं को समझने के बजाय उनका प्रचार करने लगते हैं। राष्ट्रों का भविष्य नारों से नहीं, यथार्थ की समझ से बनता है। दुनिया बदल रही है। गठबंधन बदल रहे हैं। शक्ति के केंद्र बदल रहे हैं। सवाल यह नहीं कि अमेरिका और नाटो के रिश्तों में दरार है या नहीं। सवाल यह है कि इस बदलती दुनिया को समझने के लिए क्या हम अपनी आंखें खोलना चाहते हैं या फिर अपने-अपने वैचारिक चश्मों से ही सब कुछ देखते रहेंगे।

-लोकतंत्र में मंत्री का पद कोई निजी संपत्ति नहीं होता। वह जनता के विश्वास पर टिका हुआ दायित्व है। जब उस विश्वास पर सवाल उठते हैं, तब इस्तीफा दंड नहीं बल्कि लोकतांत्रिक शुचिता का साधन माना जाता है।

-इस्तीफा कभी मर्यादा था, आज मजाक बन गया है?

राजनीति में नैतिकता का कोई कानून नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी वही होती है। अदालतें बाद में पैâसला सुनाती हैं, जनता पहले सुनती है। इसलिए कभी भारतीय राजनीति में एक परंपरा थी। आरोप लगते ही नेता सफाई देने से पहले पद छोड़ता था। यह स्वीकारोक्ति नहीं होती थी, बल्कि जवाबदेही का संकेत होती थी। याद कीजिए, यूपीए के दौर में विदेश मंत्री रहे नटवर सिंह पर सीधे आरोप नहीं थे, लेकिन उनके बेटे का नाम विवाद में आया तो उन्हें पद छोड़ना पड़ा। रेल मंत्री पवन बंसल के मामले में भी यही हुआ। कानून मंत्री अश्विनी कुमार पर जांच को प्रभावित करने का आरोप लगा तो सत्ता ने उन्हें ढाल नहीं बनाया। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पर आदर्श सोसायटी प्रकरण में सवाल उठे तो उनसे इस्तीफा लिया गया और जांच भी हुई।
इन घटनाओं पर बहस हो सकती है कि आरोप कितने सही थे या गलत, लेकिन एक बात साफ थी कि राजनीतिक नैतिकता का दबाव मौजूद था। आज तस्वीर बदली हुई दिखाई देती है। आरोपों का जवाब इस्तीफे से नहीं, प्रेस कॉन्प्रâेंस से दिया जाता है। जांच की मांग को राजनीतिक साजिश कहा जाता है और नैतिक जिम्मेदारी को विपक्ष का एजेंडा बताकर टाल दिया जाता है। ऐसा लगता है कि सत्ता में बने रहना ही सबसे बड़ा प्रमाणपत्र है। लोकतंत्र में मंत्री का पद कोई निजी संपत्ति नहीं होता। वह जनता के विश्वास पर टिका हुआ दायित्व है। जब उस विश्वास पर सवाल उठते हैं, तब इस्तीफा दंड नहीं बल्कि लोकतांत्रिक शुचिता का साधन माना जाता है। इससे न केवल जांच निष्पक्ष दिखती है बल्कि जनता को भी यह संदेश जाता है कि व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी है। प्रश्न यह नहीं है कि किस दल के समय कितने घोटाले हुए। प्रश्न यह है कि आरोप लगने पर राजनीतिक व्यवस्था की प्रतिक्रिया क्या रही। क्या सत्ता ने अपने लोगों पर भी वही कसौटी लागू की जो विरोधियों पर करती है? लोकतंत्र की असली परीक्षा यहीं होती है। राजनाथ सिंह का यह कथन कि ‘भाजपा में इस्तीफे नहीं होते’ यदि राजनीतिक आत्मविश्वास का बयान है तो ठीक, लेकिन यदि यह जवाबदेही से मुक्ति का संकेत बन जाए तो चिंता की बात है। लोकतंत्र में इस्तीफा कमजोरी नहीं, नैतिक शक्ति का परिचय माना जाता है। राजनीति अंतत: चरित्र की परीक्षा है। चुनाव जीतने से सरकार बनती है, लेकिन नैतिकता से ही लोकतंत्र बचता है। जब इस्तीफे असंभव हो जाएं, तब सवाल सिर्फ नेताओं पर नहीं, पूरी राजनीतिक संस्कृति पर खड़ा होता है।

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