पंकज तिवारी
फगुना दरवाजे के पीछे खड़ी होकर सब कुछ सुन रही होती थी कि वैâसे मेरे लिए एक सुंदर, सुशील और बुद्धिमान वर न मिल पाने के बाद घर पर निराश लौटे बाबू को माई सांत्वना दे रही हैं और बाबू बस मुस्कुराकर रह जा रहे हैं। अपने करेजा पर पाथर रख लिए हों जैसे। माई की आंखों में गम का सागर तो अनायास ही दिख जाता था, पर माई भी कम थोड़े ही थी। जिस पटल पर बाबू अपने हिस्से का और फगुना अपने हिस्से का अभिनय करने में लगे हुए थे तो वहां माई भला वैâसे पीछे रह सकती थी। उसकी आंखों में छिपे सागर से नजरें मिला पाना सबके बस में नहीं था। अपने दुख को बाहर तो नहियइ प्रकट होने देती थी मां। शादी हेतु वर खोज पाना इतना आसान तो होता नहीं।
फगुना बाबू के सामने बाल्टी, लोटा लाकर रख देती थी। बाबू जी बिना कुछ कहे बस उठ जाते और सीधे इनारा पर चले जाते थे। हाथ-पैर बढ़िया से धुल-धुला कर नहाने के बाद सीधे खाने पर बैठ जाते थे। दो-तीन दिन लगता था उनको सामान्य होने में, पर चिंता तो हमेशा ही रहती थी कि ‘बिटिया जोगऽ बर कब मिले?’ समय के साथ अब माई और बाबू दोनों ही चिंतित रहने लगे थे, जबकि बबा अब भी मौका पाते ही लड़ जाते थे, पर कुछ भी हो अपने छोटकी बहिन फगुना को मानते खूब थे। फगुना अब घर के भीतर का सारा काम-काज खुद ही संभालने लगी थी, माई-बाबू के दुख को शांत करने का उसके हिसाब से ये सबसे अच्छा साधन था। संझा होने से पहले ही मोहारे तर दीया का बर जाना और समय से पूर्व ही आंगन में से धुएं का आसमान की तरफ बह जाना बता देता था कि फगुना अपने काम में लग गई है। फगुना अपनी सखी-सहेलियन के साथे मिलकर ओरन, बोरन, तोरन सब बनाना सीख ली थी। कुस की डोल्ची, ऊन से स्वेटर और कन्टोपा भी बनाने आने लगा था, जबकि माई पुआल से गोनरा, बीड़ा आदि बनाती थी। कोयेर-कांटा का काम भी माई ही संभाल रखी थी। बाबू तो खटिया बीनने के लिए दो-चार गांवों तक जाने जाते थे। देखुआरी का समय तो चल ही रहा था पर फिलहाल बाबू को कहीं नहीं जाना था। बाबू भी अब घर और खेती के कामों में भिड़ा गए थे। अक्टूबर का महीना लगभग आधा बीत ही गया था दीवाली की तैयारियां भी जोर-शोर पर थीं। सवेरे-सवेरे सुनहरे और ललछहूं सूर्य की रोशनी के बीच सीत से नहाई धरती पर उगे पेड़-पौधों के फूल-पत्तियों को देखकर मन सुकून से भर उठता था, हरी-भरी घासें मोतियों सी चमक रही थीं। खाली पैर चलना भारी होता था, बावजूद इसके माई हंसिया, खुरपी और झौआ लिए खेत में घास काटने निकल जाती थीं, जबकि बाबू भेनसारे से ही आलू वाले खेत में गोबर वाली खाद फेंकने में लग जाते थे। थोड़ा-थोड़ा करके रोज फेंकते थे और उसके बाद ही फिर दूसरे कामों में लगते थे। कोइरहिया मशीने में जब माई घास लगाती और बाबू बालते थे तो ठंढ वाले समय में भी पसीने से नहा उठते थे। एक झउआ घास होते ही बाबू पहले भूसा मिलाकर सभी गोरुओं को कोयर डाल आते थे उसके बाद फिर बालते थे। धान कटाई का समय भी इसी बीच था तो बखरी में लिपनी-पोतनी भी अभी ही करनी थी। बाबू पोखरी से थोर-थोर करके माटी भी ला दिए थे। खाना बनाने का झमेला तो था नहीं फिर बाहर का ही सही सोचकर माई और बाबू बाहर के कामों में ही भिड़े रहते थे। एक दो दिन और बीता होगा कि सबेरे से माई माटी सानने में भिड़ा गई थीं। आज से ही गोबरी भी लगाना है। बाबू भगौती चचा के इहां से सीढ़ी मांगकर ला दिए थे और अब खरौंचा लिए दुआर की सफाई में लग गए थे। भैंस जोर-जोर से चिल्लाए जा रही थी। हउदा खाली हो गया था उसका या फिर पीने के लिए पानी की आवश्यकता थी। बाबू अपने काम में इतना भिड़ा गए थे कि भैंस को भूल ही गए थे, जैसे ही आवाज सुनाई पड़ी भागते हुए गोरुआरे में गए और खूब बढ़िया से हउदा भर-भरा कर वापस लौटे। भैंस अब आराम से खाने में लग गई थी। गले में बंधी घंटी एक विशेष लय में बजी जा रही थी। क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
