मुख्यपृष्ठनए समाचारआस्था के मंच से सियासी सुर...संत वाणी में बढ़ती कटुता पर सवाल?

आस्था के मंच से सियासी सुर…संत वाणी में बढ़ती कटुता पर सवाल?

राजेश सरकार / प्रयागराज

बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री इन दिनों प्रयागराज में चल रही हनुमंत कथा को लेकर चर्चा में हैं, लेकिन कथा के प्रारंभ में ही इस बार उनकी धार्मिक वाणी से अधिक उनके तीखे और राजनीतिक संकेतों वाले बयान सुर्खियों में आ गए हैं। कथा से पहले आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने ज्ञानवापी और काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर भविष्य में रुद्राभिषेक और भगवा लहराने जैसी बातें कहीं। धार्मिक मंच से दिए गए इन बयानों ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या संतों और धर्मगुरुओं को आस्था तक सीमित रहना चाहिए या राजनीतिक टिप्पणी करना उचित है। आलोचकों का मानना है कि जब आध्यात्मिक मंचों से कटु और विभाजनकारी भाषा सामने आती है, तो सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है और वैमनस्य को बढ़ावा मिलता है। प्रेस वार्ता के दौरान एक सवाल के जवाब में शास्त्री ने विरोध करने वालों पर भी तीखी टिप्पणी की, जिससे उनकी भाषा को लेकर और सवाल खड़े हुए। धार्मिक आयोजन में उमड़ी भीड़ और जयकारों के बीच यह सवाल अब भी कायम है कि क्या प्रभु के नाम पर एकजुट करने वाले मंचों से ऐसी बयानबाजी समाज को जोड़ती है या फिर अनजाने में विभाजन की रेखाएं और गहरी कर देती है?

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